Thursday, November 12, 2020
Sunday, November 1, 2020
Saturday, October 31, 2020
Thursday, October 29, 2020
Wednesday, October 28, 2020
Tuesday, October 27, 2020
Monday, October 26, 2020
Saturday, October 24, 2020
Thursday, October 22, 2020
अभी परमात्मा बाप आ करके बताय रहे हैं कि बच्चे, जो भी देवताएँ हैं, उन सबको पुनर्जन्म लेना है। पुनर्जन्म लेते-2 जब नीचे गिर जाते हैं फिर हम शूद्र सो ब्राह्मण बनते हैं, ब्राह्मण सो सुधर करके फिर देवता बनते हैं, बनेंगे। अभी परमपिता परमात्मा ने ब्रह्मा को एडाॅप्ट करके ब्राह्मण बनाया है। भक्तिमार्ग में शास्त्रों की पढ़ाई पढ़ाने वाले मनुष्य गुरु तो ये समझते हैं कि ब्रह्मा ने मुँह से कोई आवाज़ निकाली होगी, ‘हुआ’ किया होगा और मुख से ब्राह्मण निकल पड़े। इसलिए शास्त्रों में लिख दिया कि ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण निकले। सृष्टि का (जो) विराट पुरुष है उसके मुख से ब्राह्मण निकले, भुजाओं से क्षत्रिय निकले, जंघाओं से वैश्य निकले और पाँव से शूद्र निकले। अब यह तो अंधश्रद्धा की बात हो गई। वास्तव में इसका गुह्यार्थ है। मनुष्य सृष्टि या मनुष्य रूपी जो विराट स्वरूप है, वो चार भागों में बँटा हुआ है- जिसको सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग कहते हैं।
Vcd- 148
वार्तालाप प्वाइंट वार्ता न. 334
स्टूडेन्ट- जब सूर्यग्रहण लगता है तब तो खाना भी भक्तिमार्ग में नहीं खाते हैं।
बाबा:- चन्द्रग्रहण में खाते हैं क्या?
स्टूडेन्ट- दोनों में क्यों नहीं खाते हैं? हजम नहीं होता है या क्यों?
बाबा:- वो खाने की बात नहीं है। जब वो लास्ट पेपर होता है, फाइनल पेपर तो उस फाइनल पेपर के समय, जैसे दुनिया में जो फाइनल पेपर होता है उस समय खाना, पीना सारा भूल जाते हैं। ऐसे ही यहाँ भी जब फाइनल पेपर होगा तो जो भी पुरूषार्थी है वो खाना भी भूल जाएँगे। जो योग का भोजन है, जो याद का भोजन है वो उनको भूलेगा।
समय 20.50
मैं आता हूँ तो मुकर्रर रथ में आ करके आदि से लेकर अंत तक तुमको ज्ञान सुनाता हूँ। जब तक जीना है देह-अभिमान में, तब तक पीना है। तो एक का ही, एक को ही कहना है पतित-पावन। ऐसे नहीं कि ब्रह्मा बाबा भी पतित-पावन, कुमारिका दादी भी पतित-पावन, सरस्वती भी पतित-पावन ऐसे कहेंगे? नहीं। और गंगा? गंगा पतित-पावन? नहीं। तो ज़रूर वो एक आवे तब तो पतित से पावन बनावे ना! तो दुनिया वालों से पूछो, उन दुनिया वालों, भक्तिमार्ग वालों की शूटिंग करने वाली उन ब्रह्माकुमार-कुमारियों से पूछो कि वो एक पावन तुमको मिला? जो एक बार सुनाना-समझाना शुरू करता है तो बंद करता ही नहीं, भले गवर्नमेंट उसका नॉन-वैल्यूएबल वारंट निकाल दे तो बंद कर देगा? नहीं, वो बंद ही नहीं करता है। तो बताया- और वो आवेगा तुम्हारे पास, आवेगा ना! आवेगा तो कोई एक को पतित से पावन बनावेगा या सारी दुनिया को पतित से पावन बनावेगा? सारी दुनिया को पतित-से-पावन बनावेगा।
Vcd- 2900
वार्तालाप प्वाइंट वार्ता न. 331
स्टूडेन्ट- बाबा, हमको कोर्स कराने को नहीं आता है।
बाबा - कोर्स कराने नहीं आता है।
स्टूडेन्ट- दिल्ली में एक माता को बोला।
बाबा - लेकिन फोर्स भर दिया कोई में कि नहीं? भट्ठी कराने के लिए कोई में फोर्स भर दिया कि नहीं? भरा ना। तो बस, फोर्स भरना माना कोर्स करना। कोई को ऐसी - ऐसी बातें सुना दी की उसके अंदर फोर्स भर गया कि हम तो अब नया जन्म लेंगे जाके। भट्ठी जरूर करेंगे।
समय - 44.25
Monday, October 19, 2020
Sunday, October 18, 2020
Saturday, October 17, 2020
Thursday, October 15, 2020
Sunday, October 11, 2020
शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2807, दिनांक 02.03.2019
रात्रि क्लास 13.11.1967
VCD-2807-extracts-Hindi
समय- 00.01-20.17
रात्रि क्लास चल रहा था – 13.11.1967. पहले पेज के अंतिम चौथी लाइन में बात चल रही थी वो दुनियावी वैष्णवपंथियों की और तुम बच्चे जो कहते हो कि हम भी वैष्णवपंथी हैं, परंतु विष्णु तो चाहिए ना। विष्णु माने संपन्न स्टेज। संपन्न स्टेज माना? हँ? स्त्री और पुरुष, मेल, फीमेल, दोनों के संस्कार-स्वभाव मिलकरके एक हो जाएं। वो तो नई सृष्टि में सतयुग के आदि में ही थे। इस सृष्टि का जब अंत होने का होता है तब तो कोई के संस्कार आपस में मिलते ही नहीं। तो बताया - अपने पास वो दुनियावी वैष्णवों का वैष्णवपना बुद्धि में नहीं है। अपने पास तो बिल्कुल ही एकदम आत्मा को पक्का वैष्णव बनना है, ये बुद्धि में है। विष्णुवंशी बनना है। जैसे विष्णु की स्टेज कम्बाइंड ऐसे हमारी भी स्थिति बने। बुद्धि में पक्का बैठ जाए कि 21 जन्म का साथी हमारा नई दुनिया में कौन बनेगा? उसके साथ हमारे स्वभाव-संस्कार मिलकरके कम से कम 21 जन्म के लिए तो, हाँ, एक हो जाएं। फिर नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार। तो बनना तो है विष्णुवंशी। परन्तु उसमें फिर वो सभी चल नहीं सकते हैं। वो सभी कौन? हँ? वो सभी जो दूसरे धर्म की आत्माएं हैं, या उन दूसरे धर्मों के प्रभाव में आकरके कन्वर्ट होने वाली देवी-देवता सनातन धर्म की आत्माएं हैं, हँ, नई दुनिया में जाने वाली, वो भी सभी एक जैसा पुरुषार्थ तो कर ही नहीं सकती। तो सभी चल भी नहीं सकते हैं।
अगर कहें वो चमड़ा; तो चमड़ा तो वो गाय का है, हँ, शरीर का है। एक तो शरीर मनुष्यों का भी होता है, देवताओं का भी होता है और फिर जानवरों का भी। हाँ। और बताया गाय। कृष्ण को गऊएं दिखाई हैं। तो वो भी तो चमड़ा ही है ना। भले गाय सीधी-सादी पशु है। ये चमड़ा कहते हैं ना इनको। हँ? किसको? इनको माने? देह अभिमान को चमड़ा कहते हैं। तो वास्तव में ये कोई ज़रूरत नहीं है। हँ? किस बात की जरूरत नहीं है? हँ? क्या ज़रूरत नहीं है? देह भान में रहने की ज़रूरत नहीं है? हँ? अच्छा? देह में आत्मा रहेगी तभी तो पुरुषार्थ करेंगे। हाँ, पुरुषार्थ करें, लेकिन देह के अर्थ, देह के अर्थ न करें।
13.11.1967 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। बाकि उनकी भावना शुद्ध है अच्छी। वो करके मंगाकरके देवें; क्या? क्या मंगाय के देवें? अरे, चप्पल की बात हो रही थी ना। तो भी चप्पल बिगर रह नहीं सकते। क्या मंगाय कर देवें? वो ही लांग बूट वाली बात। याद आई? हाँ। वो उनकी बुद्धि में बैठाएंगी तो भी क्या होगा? वो दूसरे धर्म में कन्वर्ट होने वाली या जो भी दूसरे धर्म वाले हैं अपने धर्म के पक्के वो फिर चप्पल के बिगर रह नहीं सकते। और फिर उनको चाखरी में थोड़ा डर भी है। क्या? क्या डर है? तुम बच्चों को तो पता है। हँ? वो जो चाखरी बताई; कैसी चाखरी बताई? चाखरी कहो; वस्त्र भी बताया। खादी का वस्त्र। कैसी चाखरी है? खादी का कपड़ा है। खादी का कपड़ा? आजकल वो जूते मिलते हैं वो भी तो मजबूत कपड़े के मिलते हैं कि नहीं? हँ? मिलते हैं। तो बताया वो चाखरी में भी थोड़ा डर है। क्या? कि सर्दियों में तो ठंडक देता है, वो सर्दियों में तो गर्मी देता है और गर्मियों में ठंडक देता है लेकिन बरसात में? बरसात में सबके लिए बहुत भारी पड़ जाता है। हँ? हाँ। तो भारी पड़ जाता है तो गिरने का डर है। हँ? उथलने का डर है।
तो वो चमड़ा भी पहना हुआ हो। तो बुद्धि रूपी पांव में तो पहना हुआ है। हँ? पर अंदर में अगर बाप को याद करते हो; अंदर माने मन-बुद्धि में। तो फिर तो कोई हर्जा नहीं है। उस बाप की पहचान लिया, जान लिया, मान लिया और फिर याद करके, हँ, हाँ, वो पहना हुआ भी है तो कोई हर्जा नहीं है। क्यों? क्योंकि वो चमड़ा भी कोई पाप नहीं चढ़ाते। कौनसा चमड़ा? लांग बूट का? क्यों? हँ? चमड़ा माने देह भान। वो पाप क्यों नहीं चढ़ाते? क्यों नहीं पाप चढ़ाते? क्योंकि वो जो शरीर रूपी वस्त्र है वो सदाकाल इस सृष्टि पर अविनाशी है या और आत्माओं की तरह उनका, जैसे और आत्माओं का शरीर रूपी वस्त्र विनाशी है, ऐसे विनाश हो जाता है? हँ? नहीं। तो जब विनाशी नहीं है, तो अविनाशी को याद करेंगे तो कैसे बनेंगे? अविनाशी बनेंगे। और विनाशी को याद करेंगे तो विनाशी बनेंगे।
तो पाप जो चीज़ चढ़ाती है, हँ, वो कौनसी चीज़ चढ़ाती है? पाप चढ़ाती है वो काम महाशत्रु। काम महाशत्रु माने? कामना, इच्छाएं। देह है तो इच्छा है। और देह भी तामसी, राजसी है तो इच्छाएं हैं। अगर सात्विक शरीर हो जाए, हँ, देवात्माओं जैसा, तो इच्छा रहती है? हँ? सब इच्छाएं प्रकृति पूरी करती रहती है। तो इच्छा मात्रम अविद्य़ा रहते हैं। तो वो काम महाशत्रु कहाँ से आता है? जबसे ये द्वैतवादी द्वापरयुग के धरमपिताएं आते हैं तबसे ये काम महाशत्रु बहुत शत्रुता करने के लिए, हँ, हाँ, हमारे कनेक्शन में आ जाता है। तो हम, हम उससे बच नहीं सकते? कैसे बचेंगे? आठ कलाएं तो रहती हैं नई दुनिया में। और जब पुरानी दुनिया में आते हैं द्वैतवादी द्वापरयुग में तो कलाएं कम हो जाती हैं। तो कमज़ोरी आ जाती है। किनको? जो नई दुनिया की आत्माएं हैं उनको या जो नई-नई आत्माएं उतर रही हैं उनको? जो द्वापरयुग में नई आत्माएं उतरती हैं उनको कमजोरी होती है, वो पावरफुल होती हैं कि कमज़ोर होती हैं? वो तो पावरफुल होती हैं। जो देवात्माएं हैं वो नीचे उतरते कमज़ोर हो जाती हैं सुख भोगते-भोगते ज्ञानेन्द्रियों से। तो उनके प्रभाव में आने से वो काम महाशत्रु हमको भी घेर लेता है।
बाकि ऐसे है कि थोड़ा-थोड़ा पाप चढ़ते हैं। हँ? हमारे में बहुत ज्यादा एकदम पाप नहीं चढ़ते हैं। हाँ, जो आत्माएं उनके ज्यादा कनेक्शन में आती हैं विधर्मियों के उनके ऊपर ज्यादा चढ़ेंगे। और हम? हँ? हम तो अपने धरम में पक्के रहते हैं देवी-देवता सनातन धर्म के जो ऊँचा जाने वाला, ऊँचाई पे जाने वाला, एक सीध में जाने वाला तना है दायीं ओर, बाईं ओर झुकता ही नहीं है। तो, तो हमपे धीरे-धीरे असर होगा कि जल्दी असर होगा? हँ? धीरे-धीरे असर पड़ता है। क्योंकि ऐसा दूसरे मनुष्य बहुत थोड़े होंगे। तुम्हारे अलावा दूसरे जो ये पाप न करते होंगे। हँ? कौनसा पाप? पाप किसे कहा जाता है? दुख देने को पाप कहा जाता है। तो बाप तो कहते हैं कि इस पुरानी दुनिया में भी, हँ, पतित तो सब होते हैं। हँ? वो तो इस पतित दुनिया का कायदा है। परन्तु हाँ एक के साथ मन-बुद्धि का लगाव-झुकाव पक्का रहना चाहिए। अनेकों के साथ अगर मन-बुद्धि का लगाव-झुकाव रहा, हँ, और पक्षपात आ गया तो फिर क्या होगा? हँ? तो फिर हाँ, ऊपर नीचे होते रहेंगे। फिर पाप करते रहेंगे। क्या पाप? एक होता है धर्मानुकूल। क्या? काम भोगना। और एक होता है धर्म के विपरीत। धर्म क्या कहता है? दुख देना? धर्म क्या कहता है? दुख नहीं देना। लेकिन जो द्वैतवादी द्वापरयुग में जो विधर्मियों के द्वारा भ्रष्ट इन्द्रियों का जो सुख लेने की परंपरा चलाई जाती है वो तो वो उनको तो पक्का है। क्या? क्या? उनके धरम में क्या पक्का है? वो तो तोड़-फोड़ करेंगे, हिंसा करेंगे। लेकिन तुमको तो हिंसा? हिंसा नहीं करनी है। एक होता है कोई को प्यार से थप्पड़ मार दो। और एक होता है गुस्से में आके जोर से थप्पड़ मार दो। तो अंतर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा? अंतर पड़ेगा।
तो ये जो तुम बच्चे हो थोड़े वो पाप नहीं करते होंगे। जो छोटेपन से ब्रह्मचारी होकरके रहते हैं, फिर भी कोई न कोई पाप तो हो ही जाते हैं ना किसम-किसम के। क्योंकि; क्या बताया? हँ? काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाए, एक लीक काजर की लागि है पे लागि है। तो ऐसे-ऐसे पाप क्यों हो ही जाते हैं? कारण क्या है? क्योंकि ये राज्य किसका आ जाता है? हँ? राज्य रुलाने वालों का आ जाता है या देवात्माओं का राज्य होता है? हाँ। द्वैतवादी दैत्यों का राज्य होता है। हिंसक लोगों का राज्य होता है। हिंसक कर्मेन्द्रियों से हिंसा करने वाले हैं। वो अपनी आदत से मजबूर हैं। वो तो छोड़ नहीं सकते। तो कोई न कोई पाप तुम बच्चों से भी कुछ न कुछ नंबरवार हो जाता है। किसम-किसम के हैं ना पाप। हाँ। रावण राज्य है। यथा राजा? राज्य है तो यथा राजा तथा प्रजा। तो वो पाप छोड़ता तो नहीं है। उसके राज्य में पाप बिगर तो कोई रह ही नहीं सकता। किसके राज्य में? उस रावण के राज्य में। उसमें क्या अंतर है? राम राज्य में क्या अंतर है? अरे, राम को; राम लीला देखी ना। एक मुख दिखाया जाता है। और रावण को? रावण को अनेक मुख दिखाए जाते हैं। वो सब मिलकरके बस एक जैसे, हँ, एक जैसे स्वभाव संस्कार, एक जैसी वाचा।
तो उनके राज्य में पाप बिगर तो कोई रह ही नहीं सकता। और उसमें भी जनम तो पाप से ही होता है ना। द्वैतवादी द्वापरयुग से, जबसे ही ये विधर्मी धरमपिताएं आते हैं, भ्रष्ट इन्द्रियों से कर्म करना सिखाते हैं, तो जन्म तो कौनसी इन्द्रियों से होता है? हँ? भ्रष्ट इन्द्रियों के भ्रष्ट कर्मों से, पाप कर्मों से होता है या वहाँ श्रेष्ठ इन्द्रियां ही काम करती हैं? हँ? श्रेष्ठ इन्द्रियां तो तब काम करें जब श्रेष्ठ ज्ञान बुद्धि में बैठा हो। क्या? कि हम ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं। वो आत्मा की स्मृति तो 21 जन्म देवताओं को रहती है। उसके बाद वो आत्मिक स्मृति तो खतम हो जाती है। तो जनम तो ज़रूर सबका द्वैतवादी द्वापरयुग से ढ़ाई हज़ार साल के बाद नई दुनिया जब पूरी होती है तो सबका जन्म पाप से ही होना है।
तो ये छोटी-मोटी जो बातें होती रहती हैं ना वो इस ज्ञानमार्ग में, हँ, इतनी जरूरत नहीं है। हाँ। ज्ञान मार्ग में जहाँ भी मेहनत रहती है बच्चों के ऊपर; क्या मेहनत विशेष रहती है? मेहनत रहती है अपन को, हँ, देह भूल करके आत्मा समझ और बाप को पहचानने की, पहचान करके याद करने की मेहनत रहती है। हँ? तो देखो सिर्फ ये कि अपन को आत्मा समझना और बाप को नित्य याद करना। हाँ। परन्तु ये भूल बहुत होती है। अरे? क्या? क्या भूल होती है? आत्मा को भी भूलते हैं और बाप सुप्रीम सोल, जब तक ये बुद्धि फैसला न करे कि वो सुप्रीम सोल ज्योति बिन्दु निराकार; जैसे हमारी आत्मा निराकार, लेकिन हमारी आत्मा तो हमारे शरीर में है। वो निराकार कौनसे मुकर्रर रथ में सदाकाल इस सृष्टि पर पार्ट बजाता है, सौ साल के लिए, तो वो भूल जाते हैं। घड़ी-घड़ी माया अनिश्चय में; निश्चय में लाती है कि अनिश्चय में लाती है? घड़ी-घड़ी माया अनिश्चय में ले आती है। भूल कराय देती है। तो ये घड़ी-घड़ी भुलाय देती है, भूल जाते हैं। क्योंकि यहाँ ये नई शिक्षा मिलती है बच्चों को। क्या? दुनिया में ऐसी शिक्षा कहीं भी नहीं मिलती कि अपन को ज्योति बिन्दु स्टार भृकुटि के मध्य में आत्मा समझो और उस निराकार आत्मा के बाप ज्योतिबिन्दु निराकार हैविनली गॉड फादर, जो हैविन बनाने का रास्ता बताता है, उसको प्रैक्टिकल में किस शरीर में पार्ट बजाय रहा है, परमानेन्टली पार्ट बजाय रहा है, उसे पहचान करके याद करो। ये शिक्षा कहीं दुनिया में मिलती है? नहीं मिलती है। बिल्कुल ही नई शिक्षा है।
----------------------------------------
नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।

