Monday, October 26, 2020

शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2813, दिनांक 08.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
VCD-2813-Hindi-Part-1
समय- 00.01-25.42
 
प्रातः क्लास चल रहा था - 14.11.1967. मंगलवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी सोमनाथ मंदिर की। जो सोमनाथ मंदिर की यादगार है वो कोई इतना अभी नहीं है क्योंकि वो तो टूट-फूट गया ना सोमनाथ का मंदिर क्योंकि वो जो काशी का मंदिर है ना काशी विश्वनाथ तो वो अभी यादगार शिव का मंदिर है। क्यों? क्या यादगार? विश्व के मालिकपने की यादगार है। तो वो सोमनाथ इतना नहीं है जितना काशी को रखा है। जो वो धाम होते हैं ना उसमें भी काशी धाम रख दिया हुआ है। वो जो उज्जैन, वहाँ, वहाँ तो सोमनाथ का मंदिर था। उसको धोम नहीं रखते हैं। अरे? उज्जैन में महाकाल का मंदिर है या सोमनाथ का मंदिर है? हँ? अरे, सोमनाथ का मंदिर तो प्रभास क्षेत्र में गुजरात में है ना। सागर के किनारे है। उज्जैन कोई सागर के किनारे है क्या? नहीं। बाबा को याद नहीं रहा। तो बोला, हँ, कि उज्जैन वहाँ जो सोमनाथ का मंदिर था उसको धाम नहीं रखते हैं। काशी को धाम रखते हैं। क्योंकि काशी किनारे पर भी है गंगा के। और बच्चे वहाँ बहुत बैठे हुए हैं। हँ? कौनसे बच्चे? हँ? कौनसे बच्चे बैठे हुए हैं? हँ? बनारस में तो गई होगी तुम। कि नहीं गई हो? अरे, बनारस में भी नहीं गई हो क्या? तो किसी ने कहा – अभी नहीं। काशी में नहीं। अभी-3 की यात्रा। किसी ने कहा – अभी की लाइन में गई है।
 
हाँ, तो बनारस भी बहुत अच्छी है। उसमें बहुत साधु-संत, महात्मा रहते हैं। नंबरवन है काशी। और पीछे है हरिद्वार वास्तव में। क्योंकि काशी में तो काशी करवट खाते हैं ना। कहते हैं शिवकाशी-3. और वहाँ तो हरिद्वार कहते हैं। कहाँ? पहाड़ से गंगा उतरती है ना। तो हरिद्वार कहते हैं। हरि के द्वार में उतरी। और यहाँ तो शिव की काशी का नाम। यहाँ शिव की याद आती है। इसलिए जो भी साधु-संत बैठे रहते हैं वो जपते रहते हैं शिवकाशी-3. ये शिवकाशी वो काशी को बनारस भी कहते हैं। क्यों? जो कहते हैं, जो भी नाम दिये हुए हैं किस नाम के आधार पर? हँ? काशी नाम है काश्य के आधार पर। काश्य माने तेज। हँ? और बनारस किसलिए नाम दिया? हाँ, जब तेज आएगा याद का तो वो मंथन ज्यादा चलेगा ना। मनन-चिंतन-मंथन चलता है तो फिर ज्ञान का बना-बनाया रस निकलता है। बाकि असुल नाम तो इसका काशी था। पीछे बनारस रखा गया है। अंग्रेजों ने बनारस रखा। अंग्रेजों ने बनारस क्यों रखा? हँ? क्योंकि तुमको बादशाही कहाँ से लेनी है? अंग्रेजों से ही तो लेनी है ना। तो उनकी  बुद्धि में सारा ज्ञान ठहरता है। बाकि याद की बात तो।
 
तो अभी ये नाम रख दिया है बनारस दूसरा। तो कोई ने कहा – बाबा, वाणारसी। हाँ, वाणारसी। नाम इसका असुल सच्चा नाम है काशी। पिर ये जो शूद्र संप्रदाय हैं उन्होंने बैठकरके देखो नाम फिराय दिया है काशी का वाणारसी या बनारस। अब बनारस, वाणारसी है थोड़ा सा ही फर्क। परन्तु जैसा राजा होता है ना तो वो शहरों का नाम भी बदलते जाते हैं। गलियों का भी नाम बदल देते हैं। अरे, बहुत चीज़ों के नाम बदलते जाते हैं। ये दिल्ली इसका भी नाम बदला हुआ है। हँ? आगे असल कोई दिल्ली नहीं कहते थे। हँ? आगे क्या कहते थे? हँ? इंद्रप्रस्थ। इंद्रप्रस्थ कहते थे। कि इंद्र की बसाई हुई, स्थिर की हुई, प्रकष्ट रूप में स्थिर की हुई इंद्रप्रस्थ नगरी। तो पहले हिलती होगी। हँ? इंद्र ने आकरके उसको स्थिर किया। किसी ने कहा – हस्तिनापुर कहते थे। हँ? हस्तिनापुर? किसी ने कहा – जी, हाँ। ये इंद्रप्रस्थ नाम ठीक है। क्यों? हाथियों का पुर; हस्ति माने हाथी। अरे; हाथियों का पुर नाम क्यों रखना? हँ? हाथियों में तो कितना देह भान होता है। हँ? हस्तिनापुर? किसी ने कहा – जी, हाँ। ये इंद्रप्रस्थ नाम ठीक है। क्यों? हाथियों का पुर हस्तिनापुर माने हाथी। अरे? हाथियों का पुर नाम क्यों रखना? हँ? हाथियों में तो कितना देहभान होता है! है। अरे, यहाँ तो परियां रहती थी ना। हँ? ज्ञान योग के पंखों से उड़ने वाली परियां। इंद्र के दरबार में अप्सराएं, परियां दिखाते हैं ना। तो हैं ना वो नाम – पुखराज परी, नीलम परी। तो वो परियां हैं। तो ये परियां किसको कहते हैं? इंद्र की परियां हैं।
 
तो इंद्र तो कोई बरसात नहीं बरसाते हैं। इंद्र बरसात बरसाते हैं क्या? हँ? वो तो कहते हैं वरुण देवता, वो बरसात बरसाते हैं। हँ। गाया जाता है कि इंद्र सभा में कोई परी, हँ, कोई परी थी जो छी-छी को ले आई। तो उनको श्राप मिल गया, हँ, कि तुम जाकरके पत्थर बन जाओ। अब कोई पत्थर बनने की बात थोड़ेही है। पत्थरबुद्धि बन गई। 14.11.1967, मंगलवार का प्रातः क्लास, छठा पेज। तो पत्थर बन जाओ। या वो परियां नीचे की तो बात नहीं है। ये तो बाप यहीं बताय दिया है कि जो जानबूझ करके छी-छी को ले आते हैं ना, साथ में ही ले आते हैं, यहाँ पतित को ले आते हैं तो गोया उनको जैसे श्राप मिल जाता है कि तुम जाकरके फिर भी पत्थरबुद्धि बन जाओ। हँ? बुद्धि पत्थर बन जाएगी तो क्या होगा? हँ? क्या अंतर पड़ेगा? आत्मिक स्थिति ठहरेगी? नहीं ठहरेगी। क्योंकि हैं तो सभी पत्थरबुद्धि ना। तो उनको बोला जाकरके तुम फिर भी पत्थरबुद्धि बन जाओगी। कहाँ जाकरके? हँ? सतयुग, त्रेता में कोई पत्थरबुद्धि होते हैं? वहाँ तो आत्मिक स्थिति रहती है ना, याद रहती है ना। लगातार याद रहती है। तो हैं सब बातें यहाँ की। क्या सब बातें? यहाँ सब बातों की शूटिंग होती है।
 
 इंद्रप्रस्थ नाम बिल्कुल ठीक है। क्या? बिल्कुल ठीक कैसे? कि इंद्र ने प्रकष्ट रूप से दिल्ली को स्थिर किया। हँ? पहले दिल्ली, पहले दिल्ली में हाहाकार होता है; तो हिलती है या स्थिर होती है? हिलती है। हाँ। तो हो सकता है ना। बाकि वो तो इंद्र तो है नहीं ना। माना अभी नहीं है। इंद्र माने? राजा। और यहाँ परियां-वरियां तो कुछ नहीं हैं ना जिनको वो पंख हों, उड़ती हों। ये तो ज्ञान-योग के पंखों की बात है। हँ? ज्ञान का पंख और योग का पंख। तो परियां तो अभी तुम बन रही हो सच्ची-सच्ची। हँ? दैवी गुणों को धारण करने वाली परियां। तो जब तुम दैवी गुण धारण करती हो तो बरोबर बस इनसे ऊँची तो कोई परी होती नहीं है। इसको ही स्वरग की परियां भी कहते हैं। तो वो तुम हो यहाँ पढ़ रही हो अच्छी तरह से। कहाँ जाने के लिए? अरे, परिस्तान में चलने के लिए। कौनसा परिस्तान? जो इंद्र ने क्या बनाया? कब्रिस्तान दिल्ली बन गई थी; मरा पड़ा था ना। तो जब ज्यादा मरते हैं तो कब्रिस्तान में ज्यादा कब्रें बन जाती हैं। हाँ। कब्रिस्तान बन गई माने देह अभिमान की मिट्टी में सब गल गए। पहले तो बेहद की बात। फिर हद में।
 
तो बताया – परिस्तान में चलने के लिए तुम अब तैयार हो रही हो क्योंकि जानती हो अभी परिस्तान भी तो यहीं बनने का है ना। क्यों? पहले दिल्ली क्या बनती है? पहले कब्रिस्तान, फिर परिस्तान बनती है। तो ये वो ही तो दिल्ली है ना। दूसरी जगह तो कोई नहीं है ना। तो बच्चे तो समझ गए हैं कि हम अपने घर जाकरके फिर वापस आएंगे। कौन बच्चे? आत्मा रूपी जो तुम बच्चे हो बिन्दु-बिन्दु आत्माएं, देह तो नहीं हो ना। आत्मा, आत्मा आत्मा के घर में रहेगी। आत्माओं का घर कौनसा? आत्मलोक। हाँ। तो वहाँ जाकरके फिर वापस आएंगे। कहाँ आएंगे? हँ? इसी इंद्रप्रस्थ में वापस आएंगे क्योंकि पहले घर तो ज़रूर जाना है। क्यों? क्योंकि अभी पार्ट बजाते-बजाते आत्मा थक गई है। तो कहाँ जाना है? थक जाते हैं तो रात में सोने जाते हैं ना। हँ? हाँ, तो ये आत्मा थक गई तो कहाँ चली जाएगी? सुषुप्ति में चली जाएगी। वहाँ संकल्प-विकल्प चलेंगे? इंद्रियां काम-धंधा करेंगी? वहाँ इन्द्रियां होती ही नहीं। जैसे सुषुप्ति में इन्द्रियों की याद रहती है? नहीं।
 
तो घर तो जाना ही है। और जाना भी नंगा ही है। माना ये शरीर रूपी चोला उतार करके जाना है। हँ। पवित्र बनके जाना है। ये तो चोला अपवित्र हुआ ना। हँ? अगर अपवित्र चोले को पवित्र नहीं बनाया तो क्या होगा? तो सज़ाएं खानी पड़ेंगी। सज़ाएं खा-खाकरके जाना है। तो फिर प्योर होकरके जावेंगे। घर जाएंगे। फिर वहाँ से यहाँ आना है। फिर भी वहाँ से नंगा ही आवेंगे ना कि घर में से कपड़े-वपड़े पहनके आवेंगे? हाँ। तो ये तो बिल्कुल समझ की बात हो गई कि नंगा जाना है, नंगा आना है। कहते भी हैं नंगे गए, नंगे आते हैं, नंगे जाते हैं। हँ? तो अंत में नंगा जाना है। जब वो पुरानी दुनिया खत्म होती है, हँ, फिर हम आते हैं नई दुनिया में। तो ये तो तुम बच्चे समझाते हैं कि ऊपर से आते ही रहते हैं। हँ? आना शुरू करते हैं तो पहले अच्छे-अच्छे आएंगे या जो आत्माओं ने अच्छे से पुरुषार्थ नहीं किया वो आएंगे पहले? नहीं। आते ही रहते हैं। तो आते रहते हैं नंबरवार। किस नंबर से? हँ? इस समय के पुरुषार्थ के अनुसार नंबरवार आते हैं।
 
तो अभी परिस्तान तो तुम्हारी बुद्धि में घूमता रहता है। हँ? दिल्ली क्या बन जाएगी? परियों का स्थान। घूमना चाहिए ना क्योंकि तुम पढ़ते ही हो परिस्तान के लिए। हँ? तो ज़रूर बुद्धि में परिस्तान ही घूमना चाहिए ना। सो भी तुम जानते हो कि अभी जो पढ़ते हैं हम वो कितने जन्म के लिए पढ़ते हैं? हँ? 21 जन्म के लिए पढ़ते हैं। तो तुम्हारे पास जो परिस्तान तो सदैव ही रहना चाहिए। खास करके अभी पिछाड़ी में। जबकि तुम ये पढ़ाई पढ़ रहे हो। और ये भी जानते हो कि बाप ने समझाया है कि तुम पढ़ते रहते हो। पढ़ते-पढ़ते तुम परिस्तान में चले जाएंगे। और स्वरग की परी कहा जाता है। बाकि और तो कोई परियां नहीं होती हैं ना बच्ची। परियां कोई होती नहीं हैं दूसरी। शास्त्रों में भी दिखाते हैं ना कि इंद्र का स्वर्ग में राज्य था। वहाँ परियां होती थी। अब बताओ परियां सतयुग, त्रेता में होती हैं क्या? वहाँ परियां कहाँ से आईं ज्ञान-योग के पंखों वाली? हँ? वहाँ देवी-देवताएं ज्ञान-योग वाले होते हैं? किससे योग लगाते हैं? उनमें ज्ञान होता है? नहीं। तो ज्ञान योग के पंखों की वहाँ तो बात ही नहीं।
 
और फिर बाद में तो द्वापुर आ गया, कलहयुग आ गया। हँ? द्वापुर माने दो-दो पुर, चार-चार पुर। हँ? तो कलह-क्लेश बढ़ता जाता है। हाँ। तो फिर ये जो मनुष्य हैं ना जो देवताएं थे वो फिर क्षत्रीय बने, क्षत्रीय से वैश्य बने, वैश्य से कलियुग में शूद्र बन गए। तो ये मनुष्य सिर्फ फिरते जाते हैं। बदलते जाते हैं। अगर सच्ची-सच्ची परियां बनते हो तभी तुम जानते हो कि हम परिस्तान की परियां बन रहे हैं। कैसे? अब देखो, ऐसे बन रहे हैं। इनसे ऊँचा वेश तो दूसरे का कोई का होता ही नहीं है। इतना धनवान, इतना ये। ये जो इस दुनिया में देखते हो, ये तो कुछ भी नहीं है बच्ची। (क्रमशः)
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[6:41 PM, 10/25/2020] +91 70216 24279: वार्तालाप प्वाइंट        वार्ता न. 360

स्टूडेन्टः- साकारी, आकारी और निराकारी जो तीन स्टेज हैं उनमें पाप और पुण्य कैसे आका जाएगा? कौन-सी स्टेज में पाप और पुण्य होते हैं?

बाबाः- पाप शरीर से होते हैं या बिना शरीर के भी  पाप होते हैं? शरीर पाँच तत्व का पुतला है। पाँच तत्व जब तमोप्रधान बनते हैं तो तमोप्रधान शरीर से पाप भी होते हैं। सतयुग, त्रेतायुग में भी शरीर होता था; परंतु वहाँ पाप नहीं होते थे। क्यों? क्योंकि पाँच तत्व का बना हुआ पुतला सतोप्रधान था। प्रकृति ही सतोप्रधान थी। भाव-स्वभाव, संस्कार को भी प्रकृति कहते हैं। मानवीय भाव-स्वभाव, संस्कार जब सात्विक होता है तब जड़ प्रकृति भी सात्विक होती है। पाप कर्म नहीं हो सकते हैं। जब मानवीय प्रकृति है, तामसी बनती है तब जड़ प्रकृति भी तामसी बन जाती है। फिर पाप कर्म होने लग पड़ते हैं । फिर साकार से पाप कर्म होंगे या निराकार और आकार से पाप कर्म होंगे? आकार से भी अगर होंगे तो भी कोई न कोई शरीर में प्रवेश करके ही पाप कर्म होंगे।
समय - 26.25- 28.18
[6:41 PM, 10/25/2020] +91 70216 24279: हिन्दी व्याख्या

तुमको हार खिलाने वाला ये रावण कौन है ? क्यों उनको जलाते हैं? ये बात भी कोई नहीं जानते। कोई का पुतला जलाते हैं तो क्यों जलाते हैं? कब जलाते हैं?  जब कोई बहुत दुःख देते हैं तो उनका पुतला बैठ बनाए जलाते हैं। ये रावण भी, द्वापर में तुमको बहुत दुःख देता नहीं है तो द्वापर में तुम बैठ पुतला नहीं जलाते हो।  कलियुग में जब बहुत दु:ख देता है तो पुतला जलाते हैं। वास्तव में रावण ना सतयुग में होता है, ना द्वापरयुग-कलियुग में होता है। कहाँ होता है ?  संगमयुग में रावण भी है तो निराकार राम भी है। अभी ये रावण तुमको बहुत दुःख देता है। रावण राज्य है तब ही उनको जलाते हैं। कौन-सी दुनिया की बात है ? ब्राह्मणों  की दुनिया में असली रावण-राज्य है। तो उनके जी को तुम जलाते हो। अभी तुम बच्चे जानते हो कि कैसे रावण खलास होता है। बाप कितनी सहज रीति समझाते हैं और बाप खुद बैठ पढ़ाते हैं। बताते हैं कि रावण कौन है और राम कौन है।
Vcd- 601

[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 2) यज्ञ की शुरुआत कब(सन्) और कहां(स्थान)से हुई?
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: यज्ञ की शुरुआत सन् 1936 में हुई और सिंध हैदराबाद से हुई है और एडवांस पार्टी की शुरुआत 1976 हुई है।
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 3) राम वाली आत्मा पहली बार अव्यक्त मिलन कब मनाती है?  उस दिन को स्मृति दिवस कहा गया है।
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: स्मृति दिवस- 5 दिसंबर 1969
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: निश्चय है तो लिखकर देना चाहिए- " पहले मुख्य बात है मात-पिता की पहचान देनी है।... मुख्य बात है मात-पिता का परिचय दिया। अब समझा है तो लिखो, नहीं तो गोया कुछ नहीं समझा। हड्डी (दिल से) समझाकर फिर लिखवाना चाहिए। बरोबर यह जगतअंबा, जगतपिता है। वह लिख दे बरोबर बाप से वर्षा मिलता है।"... एक ही त्रिमूर्ति चित्र पर पूरा समझाना है। निश्चय करते हो यह तुम्हारा मां- बाप है। इससे वर्षा मिलना है। (मु. 12.3.87 पृ.2 मध्यांत)
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 4) बाप पर निश्चय है उसकी  निशानी क्या है?
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 5) जब से यज्ञ की शुरुआत हुई तब से लेकर अब तक इस यज्ञ का क्या-क्या नाम पड़ा?
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: भट्टी का लक्ष्य है कि खुद बदलकर औरों को बदलना है।... यह है निश्चय की छाप। (अ. वा. 28/9/69 पृ.111)
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 1936 में ओम मंडळी, राजस्व अश्वमेध अविनाशी रूद्र गीता ज्ञान यज्ञ, 
1951 में ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, 
1976 में आध्यात्मिक विश्व विद्यालय
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 6) ईश्वरीय पढ़ाई के 4 सब्जेक्ट कौन से हैं?
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: ज्ञान,योग,धारणा,सेवा
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 8) भगवान कहां आते हैं?(देश,राज्य,जिला और गांव)
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 8) भगवान कहां आते हैं?(देश,राज्य,जिला और गांव)
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: भारत में, मगध देश जो की यू पी में आता है। यूपी  मे भी फर्रुखाबाद जिले मे और कंपिला गांव है जहां भगवान आते हैं।





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