🎯✔️05-10-2020 प्रात:मुरली प्रश्नः-एकान्त का अर्थ क्या है? एकान्त में बैठ तुमको कौन-सा अनुभव करना है?
उत्तर:-एकान्त का अर्थ है एक की याद में इस शरीर का अन्त हो अर्थात् एकान्त में बैठ ऐसा अनुभव करो कि मैं आत्मा इस शरीर (चमड़ी) को छोड़ बाप के पास जाती हूँ। कोई भी याद न रहे। बैठे-बैठे अशरीरी हो जाओ। जैसेकि हम इस शरीर से मर गये। बस हम आत्मा हैं, शिव बाबा के बच्चे हैं, इस प्रैक्टिस से देह भान टूटता जायेगा।
👇🌿विचार सागर मंथन🌿👇
👉बाबा ने एडवांस ने आये बेसिक ब्राह्मणों से पूछा जानते हो एकान्त का अर्थ क्या है? एकान्त में बैठ तुमको कौन-सा अनुभव करना है? बताया
एकान्त का अर्थ है एक की याद में इस शरीर का अन्त हो ! अब सवाल उठता है वह एक कौन है? क्योंकि बाप तो कहते हैं...
🎯✔️जैसे आत्मा को देख नहीं सकते हैं, जान सकते हैं, वैसे ही परमात्मा को भी ( ज्ञान से ) जान सकते हैं। देखने में तो आत्मा और परमात्मा दोनों एक जैसी बिंदी, बाकी तो है सारी नॉलेज । यह बड़ी समझ की बातें हैं। ( मु.11.1.66 पृ.3 मध्यांत )
कहने से मतलब आत्मा और परमात्मा दोनों ही निराकार है। फिर क्या यह चाहते हो निराकार बिंदी की याद में शरीर का अंत हो। परन्तु बाप तो कहते हैं।
🎯✔"बाप कहते हैं बच्चे तुम निराकार को क्यों याद करते हैं? उससे क्या मिलेगा? क्या निराकारी दुनिया में जाएँगे? ...भल सब याद करते हैं; परंतु बिगर परिचय। इस प्रकार याद करने से तो कोई पावन नहीं बनेंगे। *यहाँ तो निराकार खुद साकार में आते हैं। ( मु.31.8.98 पृ.3 मध्य ) फिर पूछा अच्छा तो
🎯✔️10-07-2018 प्रात:मुरली "तुम जानते हो निराकार विचित्र बाबा इस साकार में आया हुआ है, हम उनके सामने बैठे हैं, हमें संगम पर डायरेक्ट ईश्वर का प्यारमिलता है - यह है नया और अनोखा प्यार। सारा कल्प देहधारियों से प्यार किया, अब विदेही बाप से प्यार करना है। ऐसा प्यार संगम पर ही होता है। समझाया।
फिर क्या उस साकार बाप को पहचान लिया? अगर पहचान लिया तो फिर भी ब्रह्मा कुमारिज में
🎯✔️ऐसे बहुत बच्चे हैं, बाप को पूरा पहचानते नहीं हैं । बाप का अदब (सम्मान) नहीं रखते, क्योंकि बाप कहते हैं मैं साधारण रूप में आता हूँ। मैं जो हूँ, जैसा हूँ, विरला कोई उस रूहाब से चलते हैं। यहाँ तो बहुत साधारण है ना कितनी बडी आसामी!.....आगे चल वह भी पहचानेंगे, ऐसे बाबा को हमने फारकती दे दी। तकदीर को लकीर लगा दी। यह पीछे होगा। अभी तो बहुत साधारण है। रथ है गुप्त।....गुप्त होने कारण पूरा पहचान नहीं सकते हैं। पूरा पहचान लें तो कहें-बाबा, आपके सिवाए दुनियाँ में है ही क्या ! कोई सदगति कर न सके।*(मु.ता.15.11.75 पृ.1 आ.,म.,अं.)
अब अनुभव बताओ अर्थात् एकान्त में बैठ ऐसा अनुभव करो कि मैं आत्मा इस शरीर (चमड़ी) को छोड़ बाप के पास जाती हूँ। कोई भी याद न रहे। बैठे-बैठे अशरीरी हो जाओ। जैसेकि हम इस शरीर से मर गये। बस हम आत्मा हैं, शिव बाबा के बच्चे हैं, इस प्रैक्टिस से देह भान टूटता जायेगा। अच्छा ओमशान्ति।
वार्तालाप प्वाइंट वार्ता न. 304
स्टूडेन्ट - बाबा, एड़ी-चोटी का पुरुषार्थ माना क्या?
बाबा - एड़ी कहते हैं पाँव का सबसे निचला अंग और चोटी कहते हैं सबसे ऊँचा अंग। माना सारे शरीर का कोई भी अंग ऐसा न रह जाए जो पुरूषार्थ में सहयोगी न बने। इसको कहते हैं एड़ी से लेकर चोटी तक का पुरूषार्थ। कहते है, ईश्वरीय सेवा में हड्डी 2 स्वाहा कर दी ।
समय-28.35
जब मुकर्रर रथ में प्रवेश करते हैं तो सारे संबंध तुम निभा सकते हो जो चाहो। तुम्हारे संकल्पों के ऊपर है। मानसी सृष्टि बन रही है ना कि देह की सृष्टि बन रही है? तो मन के अन्दर तुम जैसे भी संकल्प चलाओगे, वो संकल्प तुम्हारा सिद्ध होगा कि नहीं? तुम जैसे संकल्प चलाओगे, वो ही संकल्प तुम्हारा सिद्ध हो जाएगा। नहीं समझ में आया? बूढ़ी-2 माताएँ कम्पलेन्ट करती हैं तो बाबा को उनके ऊपर दया आ गई, क्या? बूढ़ी-2 माताएँ क्या कम्पलेन्ट करती हैं अरे, बाबा हम बुड्ढे हो गए, तब तुम क्यों आए? करती हैं ना! तो बाबा कहते हैं- नहीं, अरे! ये बुड्ढा शरीर होता है, आत्मा तो बुड्ढी होती है क्या? आत्मा तो सदाकाल है। तो आत्मा कोई नौजवान, बुड्ढी जवान नहीं होती है, तुम आत्मा हो और आत्मा माने मन-बुद्धि के साथ हो तो मन-बुद्धि के द्वारा तुम जो संकल्प करोगे अच्छा तो भी शूटिंग हो जाएगी और बुरे-ते-बुरा तो भी शूटिंग हो जाएगी। तो जो संकल्प करोगे- ‘‘जो इच्छा करे हो मनमाहि, हरी प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं।’’ क्या? भगवान की कृपा से सब संकल्प तुम्हारे सिद्ध हो जाएँगे। तो बताया, बुड्ढी आत्मा, बुड्ढी औरतों बुड्ढी-2 जो बुढ़ियाँ थी, उनको भी तथा दे दिया बाबा ने- तुम जैसे चाहो मन से संकल्प करते रहो और तुम्हें बाबा उस रूप में मिलेगा ज़रूर। एक जन्म कि जन्म-जन्मान्तर भी मिल सकता है? (किसी ने इशारा किया) हाँ, जन्म-जन्मांतर भी मिल सकता है।
Vcd- 2955
वार्तालाप प्वाइंट वार्ता न. 304
स्टूडेन्ट- बाबा, कापारी नशा माना क्या?
बाबा - कापारी माना नशा नीचे तक का नहीं, घुटनों तक का नहीं, कमर-पेट तक का नशा नहीं, यहाँ तक (गला) तक का नशा नहीं, एकदम कपार, पूरा नशे में डूबा हुआ है ।
समय-25.13
लोग समझते हैं शिव-शंकर एक ही है। अरे, एक ही है तो दो नाम क्यों हैं और उन दो नामों के ओपोजिट अर्थ क्यों हैं? शिव माना कल्याणकारी और शंकर माना संघारकारी। कहाँ कल्याण करने वाला और कहाँ सृष्टि का संघार करने वाला। कल्याण करने में सुख होता है या संघार करने से सुख होता है? कल्याण करने से सुख होता है। इसलिए शिव सदैव कल्याणकारी है, वह जन्म-मरण के चक्र में आने वाला ही नहीं है। वह ज्ञान सुना करके सृष्टि का कल्याण करता है, मनुष्य तन में प्रवेश करके दृष्टि से सुख देता है। कहते हैं ना- गुरू जी की कृपा-दृष्टि हो जाए। अब ढाई हज़ार वर्षों से सृष्टि पर गुरुओं की कृपा-दृष्टि होती आई। इस सृष्टि में गुण बढ़ रहे हैं या घट रहे हैं? दुर्गुण बढ़ रहे हैं या गुण बढ़ रहे हैं ? गुण बढ़ रहे हैं। तो गुरुओं की कृपा-दृष्टि कहाँ चली गई? मनुष्य गुरुओं की कृपा-दृष्टि से यह सृष्टि नहीं सुधरती। एक ईश्वर ही ऐसा सद्गुरू है जिसकी कृपा-दृष्टि से सारी सृष्टि सुधर जाती है। उसकी वाचा से सारी मनुष्य सृष्टि परिवर्तन के लिए बाध्य हो जाती है। मनुष्य तन में आए हुए उस परमपिता परमात्मा के वायब्रेशन से सारी दुनियाँ का परिवर्तन होता है।
Vcd- 582
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