Saturday, October 17, 2020

वार्तालाप प्वाइंट       वार्ता न. 322

स्टूडेन्ट- बाबा, वायब्रेशन का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

बाबा - हर आदमी के चारों ओर उसके संकल्पों का, वायब्रेशन का एक वृत्त घूमता रहता है। जैसे-जैसे संकल्पों का, दुष्ट संकल्पों का व्यक्ति होचगा तो उसके वायब्रेशन का वृत्त चारों तरफ उसी तरह का घूमेगा और श्रेष्ठ संकल्पों का व्यक्ति होगा तो उसके चारों तरफ वैसे ही वृत्त घूमेंगे। तो जो आत्माएँ उनके कनेक्शन में आती हैं उनके ऊपर उसका संग का रंग लगता है। इसलिए कहते हैं कि - जैसे आत्मा रूपी बैटरी होती है वो बैटरी दूसरी बैटरी से जोड़ दी जाए तो एक बैटरी खाली होने लगेगी और दूसरी भरने लगेगी। ऐसे ही ये संग का रंग लगता है।
समय - 33.21
बच्चों को ख्याल आना चाहिए कि हम श्रीमत पर क्या कर रहे हैं? स्वच्छ रहना है। दिल के अन्दर भी कोई बात नहीं रहनी चाहिए। अगर दिल के अन्दर भी कोई मैल रह जाता हैं, तो दूसरों के वायब्रेशन को भी खराब करता है। बच्चों को समझाया जाता हैं अशरीरी भव! यहाँ पार्ट बजाने आए हो। और ये आत्मा में अविनाशी पार्ट है जो बजाते  ही रहते हो। जो भी है सभी को अपना पार्ट बजाना है। तो ये नालेज बुद्धि में रहनी चाहिए, क्या नालेज ? कि हम आत्मा है , हम देह नहीं है। आत्मा अभिमानी होकर के रहेंगे तो शूटिंग कैसी होगी? सुख की शूटिंग होती रहेगी। और देहअभिमानी होकर रहेंगे तो दुख की शूटिंग होती रहेगी। रिहर्सल होती है ना।

Vcd- 786
वार्तालाप प्वाइंट         वार्ता न.322


स्टूडेन्ट - बाबा, जब अपन (हम) याद में बैठते हैं ना। तो जो सांग्स है ना, भगवान के गाने।वो लगाना अच्छा है या नहीं लगाना अच्छा है?
 
बाबा - पहले बाबा बोलते थे कभी अवस्था खराब हो जाती है, चित्त अच्छा नहीं होता है, माया बहुत प्रकोप करती है तो अच्छे-अच्छे गीत रिकार्ड रखना चाहिए अपने पास। एक-दो रिकार्ड लगा लिए बाबा की याद में बैठ गए तो चित्त अच्छा हो जाएगा। वो तो बचपन की बात बताई। अभी हम बचपने में नहीं है एडवान्स पार्टी के हैं। क्या? एडवान्स के लिए अभी डायरेक्शन निकला है - गीत गाना नहीं है वास्तव में गीत सुनना भी नहीं है। क्यों? क्योंकि अब हम मनन-चिंतन-मंथन कर रहे हैं। हम दुनियाँ वालों को सुनाते हैं विनाश सामने खड़ा हुआ है। अब आया की अब आया। और हम ढोल मंज़ीरा बजाने में लगे हुए हैं। तो दो बातें हो जाती है ना। तो ऐसी दो बातें जो सुनेंगे तो ज्ञान के ऊपर विश्वास ही नहीं करेंगे।
समय - 55.25
बाप ने कहा है - अब अपन को आत्मा समझ मुझे याद करो, तो तेजी से तुम्हारे सारे पापकर्म भस्म हो जावेंगे। अगर कोई दूजम को याद किया तो पाप कर्म कम नहीं होंगे। ये रूहानी यात्रा है। बाप की याद से विकर्म विनाश होते हैं। क्यों विनाश होते हैं ? बाप की याद में ऐसी क्या चीज समाई हुई है ? सतयुग-त्रेता में विकर्म नहीं होते । यहाँ पापकर्म बन जाते हैं। सतयुग-त्रेता में आत्मिक स्थिति रहती है, इसलिए पापकर्म होने का सवाल ही नहीं। क्योंकि देहभान होता ही नहीं। और यहाँ, यहाँ घड़ी-घड़ी देहभान खींचता है तो पापकर्म बन जाता है। बाप की याद भूल जाती है। बाप की याद के लिए ये शर्त है; क्या ? कि अपन को आत्मा समझो। अगर देहभान में रहकर के बाप को याद करना चाहेंगे तो याद आवेंगी ही नहीं।उन जिस्मानी यात्रा से तो और ही विकर्म बनते हैं। तुम्हारी तो है रूहानी यात्रा। तो तुम बच्चों को सदैव कुछ ना कुछ सर्विस करनी चाहिए। क्या ? देहभान में आने से बचने कि लिए क्या करना चाहिए ? सदैव कुछ-ना-कुछ सेवा करनी चाहिए। ईश्वरीय सेवा करेंगे तो ईश्वर बाप खुश होंगे। लौकिक दुनिया में भी कोई बच्चा बाप की दुकान में बहुत सहयोगी बनता है तो बाप  उस बच्चे पर खुश होता है, दुआएँ मिलती हैं। यहाँ तो बाप से कितनी ताकत मिलती है ? हम बच्चे याद करते हैं और बाप सर्विसएबुल बच्चों को याद करते हैं। तो हमारी याद में ज्यादा ताकत  या बाप की याद में ज्यादा ताकत ?( किसी ने कहा- बाप की याद मेें ज्यादा ताकत) तो सर्विस करना छोड़ना नहीं है। सर्विस करने से ही कल्याण होगा। सर्विस नहीं करते हैं तो जरूर डिसर्विस करते हैं। देहभान आता है, कहीं-न-कहीं लगाव होता है, तो जिसका लगाव होता है वो सर्विस  कर नहीं  सकता।
Vcd- 786
वार्तालाप प्वाइंट           वार्ता न. 326


स्टूडेन्ट - ग्लानि की परिभाषा क्या है?

बाबा - ग्लानि की परिभाषा ये हैं- जो गायन योग्य चीज़ है, जो गायन योग्य व्यक्ति है उसका गायन न करना, उसकी महिमा न करना ,वो महिमा को ग्लानि में बदल देना, उल्टा कर देना, सत्य को असत्य कर देना, असत्य को सच्चा साबित कर देना। जैसे-आज के काले कोट वाले वकील होते हैं।

समय - 41.27
वो महारथी कहेंगे जिनकी सद्गति मार्ग की दशा है, अपने दिल से पूछना चाहिए हम महारथी हैं ? फलाने मिसल सर्विस करते हैं ? जो प्यादे होंगे वो कब किसी को ज्ञान सुना नहीं सकेंगे, कोई का कल्याण कर नहीं सकेंगे। तो कल्याणकारी बाप  का बच्चा क्यों कहलाना चाहिए ? बाप तो पुरूषार्थ करावेंगे ना। पुरूषार्थ करावेंगे या स्वार्थी  बनावेंगे ? पुरूषार्थ करते हैं तो बाप के बच्चे हैं । पुरूषार्थी माना ही आत्मा के अर्थ करने वाला। जो भी वाणी बोले आत्मा के अर्थ, जो भी कर्मेन्द्रियों से कर्म करे आत्मा के कल्याण के अर्थ, जो भी संकल्प चलावे आत्मा के  कल्याण के अर्थ तो कहेंगे कल्याणकारी बाप का बच्चा। बाप अपने बच्चों को ठंडा थोडे़ ही छोड़ेगे। अगर  उनको ठंडा छोड़ दे तो और ही डिसर्विस करेंगे। इस ज्ञान यज्ञ की सर्विस में तो हड्डियाँ भी स्वाह कर देनी चाहिए। बाकी सिर्फ खाना , पीना, सोना ये क्या सेवा हुई ? समझना चाहिए हम जाए प्रजा में जावेंगे। राजाई में तो आने की बात  नहीं दिखाई पड़ती  या तो दास-दासी बनेंगे। बाप तो कहते हैं पुरूषार्थ करके नर से नारायण बनो। सपूत बच्चों को देखकर के बाप भी खुश होंगे।
Vcd- 790

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