Thursday, October 15, 2020

शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2809, दिनांक 04.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
VCD-2809-extracts-Hindi
समय- 00.01-22.18
 
14.11.1967. मंगलवार को पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – अभी इनको आत्माभिमानी बनाय; हँ? किनको? इन ब्रह्मा नामधारियों को आत्माभिमानी बनाय और बैठकरके आय समान बनाय रहे हैं। हँ? आप समान माना? हँ? निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, अकर्ता, अभोक्ता। हँ? तो क्या चारों ही, पांचों ही ब्रह्मा नामधारी निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, अकर्ता, अभोक्ता की स्टेज पर पहुंचेंगे कि सारे संसार का विनाश भी कर दें फिर भी, हँ, जैसे कुछ भी नहीं किया? अकर्ता की स्टेज पर टिके रहें। हँ? पांचों ब्रह्मा नामधारियों को ऐसी स्टेज धारण कराय देते हैं आप समान बनाने की? हाँ, क्योंकि जिसको कहा आप समान, वो तुरीया तो एक ही है। तो तुरीया एक ही तुरीया को तुरीया बनाता है।
 
तो आत्मा की महिमा गाई जाती है। हँ? कब? हाँ, शरीर की तो कोई महिमा नहीं गाई जाती है। हँ? वास्तव में हर एक की आत्मा की महिमा गाई जाती है। भई, फलाना था। हरेक की आत्मा की? हाँ। हर एक आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जब पहले-पहले जनम में पार्ट बजाती है तो उसकी महिमा; सात्विक स्टेज में पार्ट बजाती है या राजसी या तामसी? सात्विक स्टेज में पार्ट बजाती है तो उसकी महिमा गाई जाती है। कहते हैं भई फलाना था, बहुत अच्छा था। हँ? तो सतोप्रधान था ना, सात्विक था ना, तभी तो अच्छा था ना। हाँ। अब शरीर तो नहीं कहेंगे। क्या? अब। हँ? शरीर तो नहीं। बाकि आत्मा के लिए कहा जाता था कि फलाने की आत्मा बहुत अच्छी। अच्छी तरह से पार्ट बजाया। और आत्मा के पार्ट का तो किसको मालूम भी नहीं है बच्चे। बाकि ये ज़रूर महिमा करेंगे उस जीव आत्मा की। हँ? किस जीव आत्मा की? हँ? किधर इशारा किया? बाबा तो मिसाल देते हैं; भक्तिमार्ग की दुनिया का मिसाल देते हैं।
 
तो मिसाल दिया भई नेहरू बड़ा अच्छा था। क्या? क्या नाम दिया? नेह का रूह। नेह माने? स्नेह, हँ, का रूह बड़ा अच्छा था। तो कहेंगे कि जिसका मिसाल दिया, नेहरू बड़ा अच्छा था। बच्चों को बहुत प्यार करता था। हँ? तो हद का नेहरू या बेहद का नेहरू? हँ? क्या कहेंगे? हद का नेहरू अपन को आत्मिक स्थिति में स्थित करता था? नहीं। तो जो आत्मिक स्थिति में स्थिर करे उसकी बात है कि सबको आत्मा-आत्मा भाई-भाई के रूप में उस दृष्टि से देखे तो कहेंगे कि रूह अच्छी। और देह की दृष्टि से देखा, हँ, और दैहिक प्यार किया तो अच्छा कहेंगे क्या? नहीं। तो मिसाल दिया बाहर की दुनिया का लेकिन तुम बच्चों के मिसाल दिया क्योंकि तुम बच्चे तो आत्मा हो ना। आत्मा अपने को समझ लिया ना। हाँ। जैसे नेहरू के लिए कहते हैं वैसे शास्त्री भी बड़ा अच्छा था। हँ? अभी शास्त्री का तो शरीर नहीं है। हँ? बाकि कहेंगे कि शास्त्री की आत्मा बड़ी अच्छी थी।
 
तो बाप बैठकरके समझाते हैं कि मैं आया हूँ सवेरे-सवेरे। हँ? कौन आया हूँ? आत्मा आया हूँ या शरीर आया हूँ? हँ? मैं आया हूँ सवेरे-सवेरे। माना इसको कहा जाता है प्रभात। क्या? प्रकष्ट रूपेण ‘भा’ माने रोशनी देने वाला। प्रभात। हाँ। सवेरे को सूर्य निकलता है ना। तो सवेरे की सूर्य की किरणें जो हैं वो ज्यादा फायदेमन्द होती हैं या दोपहर और शाम की किरणें ज्यादा फायदेमन्द होती हैं? हँ? कौनसी ज्यादा फायदेमन्द? दुनिया में तो शरीर को हिसाब से देखते हैं तो वो स्थूल सूर्य को कहते हैं सवेरे 7-8 बजे की सूर्य की किरणें लेना चाहिए। लेकिन वो तो स्थूल सूर्य है ना। हँ? यहाँ तो बात किसकी है? ज्ञान सूर्य चैतन्य आत्मा की बात है ना। कहते ही हैं सत, चित, आनन्द। चैतन्य है ना? तो वो, वो जब आता है तो ज्ञान की रोशनी का प्रभात, हँ, सवेरे को कहा जाता है। हँ? उसको कहेंगे अंग्रेजी में ए.एम.। ए.एम. की शुरुआत, माना एकदम फर्स्टक्लास या सेकण्ड, थर्ड क्लास? हाँ, एकदम फर्स्टक्लास ए.एम. प्रभात; प्रभात हो गई। हँ? फिर बाद में कहेंगे पी.एम. हो गई। हँ? क्या हो गई? पहले ए.एम. हो गई। बाद में पी.एम. हो गई। तो प्रभात तो ए.एम. हो गई ना। सवेरे में। बारह बजे के बाद फिर दिन हो जाता है। कौनसे बारह बजे के बाद? दोपहर के या रात के? हँ? हँ? वो स्थूल सूर्य हो या ये चैतन्य सूर्य हो। हँ? इसका जो प्रत्यक्षता रूपी जन्म है वो कबसे शुरु होता है? हँ? भारत में भी मनाते हैं। क्या मनाते? घोर अज्ञान अंधकार की रात्रि शिवरात्रि मनाते हैं ना। मनाते हैं। हाँ। तो ये किस आधार पर मनाते हैं? भारत में तो सवेरे को जब सूर्य निकलता है; हँ? जो इन आँखों से देखे, जो इन कानों से दूसरों से सुने बस सूर्य निकल आया, हँ, तब मानते हैं दिन की शुरुआत। भारतवासी दिन की शुरुआत कै बजे मानते हैं? हँ? स्थूल सूर्य निकलता है, देखने में आता है तब मानते हैं, सुनने में आता है तब मानते हैं या रात के 12 बजे से मानते हैं? हँ? कब मानते हैं? सवेरे 6 बजे से 5 बजे से, हाँ, दिन की शुरुआत मानते हैं।
 
तो बाबा ने यहाँ जो 12 बजे से बोला 12 बजे के बाद फिर दिन हो जाते हैं। ये किस हिसाब से बोला? दोपहर के 12 बजे के बाद या रात के 12 बजे के बाद? हँ? हाँ, क्योंकि बाप विदेशी बनकरके आया है ना। हँ? तो विदेशी बनकरके आया है तो विदेशियों की बात पहले करेगा या पहले स्वदेशियों की बात करेगा? हँ? क्यों? विदेशियों की क्यों? क्योंकि स्वदेशी तो कुंभकर्ण बनके पड़े हुए हैं। और विदेशी? विदेशियों को कोई कुंभकर्ण कहेगा? हँ? सोते हैं? नहीं। वो तो ज्यादा बुद्धिमान हैं, बाप को पहचान लेते हैं। क्या? जब बाप आते हैं तो विदेशियों के द्वारा प्रत्यक्षता होती है कि भारतवासी कुंभकर्णों के द्वारा प्रत्यक्षता होती है? हँ? भारतवासी कुंभकर्ण तो नींद में, अज्ञान की नींद में सोए पड़े हैं। हाँ। मनाते हैं। क्या? क्या मनाते हैं? कि भारत में, नार्थ इंडिया में भगवान का जनम हुआ। चाहे वो कृष्ण के रूप में मथुरा में हुआ हो, चाहे वो विश्वनाथ शंकर के रूप में बनारस, काशी में हुआ हो। और चाहे राम भगवान के रूप में अयोध्या में हुआ हो। भक्तिमार्ग में तो ये मानते हैं; क्या? भगवान का जन्म तो नार्थ इंडिया में होता है, हँ, लेकिन जब भगवान प्रैक्टिकल में आते हैं तो क्या पहचान पाते हैं? हँ? वो नहीं पहचान पाते। जो भी प्रत्यक्षता होती है जो भारत का विदेश, दक्षिण भारत बताया है जिनकी भाषा भी अलग, कि नहीं? भाषा भी अलग। और परंपराएं भी नार्थ इंडिया वालों से अलग। परंपराएं भी। और धनाढ्य भी? नार्थ इंडिया में ज्यादा धनाढ्य कि दक्षिण भारत में ज्यादा धनाढ्य? कहाँ ज्यादा धनाढ्य? हाँ, दक्षिण भारत में धनाढ़्य भी।
 
तो देखो हाँ, दक्षिण भारत की आत्माएं पहले आती हैं बाप के सन्मुख। हँ? आती हैं? हाँ। भले अंदर से नहीं समझ पातीं लेकिन शरीर से तो आती हैं ना। आती हैं। तो बताया 12 बजे के बाद जो दिन हो जाते हैं, वो विदेशियों के हिसाब से बताया रात के बारह बजे से सूर्य निकलना शुरू होता है स्थूल सूर्य या सवेरे को जब दिखाई पड़ता है तब सूर्य उदय होता है? वास्तविकता क्या है? हँ? कहेंगे रात के बारह बजे तक सूर्य डूबता रहता है। और रात के बारह बजे से, हाँ, उदय होना शुरू होता है। तो पहले-पहले जो पश्चिम में जाता है ना सूर्य तो पश्चिम में जाता है, तो पश्चिम में कौनसे देश हैं? कहेंगे अमेरिका है, यूरोप है। है ना? तो, जो अमेरिका, यूरोप कनाडावासी हैं वो पहले पहचानते हैं। हाँ। और इधर जो पूरब साइड के हैं वो अज्ञान की नींद में सोए पड़े रहते हैं।
 
तो बताया – उनके भी जो बीज हैं वो कहाँ हैं? हँ? कहाँ हैं? बताया – वो हैं दक्षिण भारत में। हँ? जो बताया ना जो मूल रूप में बीज दिखाए जाते हैं, आठ हैं ना। हाँ। वो आठ बीजों की पूजा कहाँ होती है? हँ? मूर्तियां कहाँ बनती हैं? मंदिर कहाँ बनते हैं? कहां बने हुए हैं? दक्षिण भारत में। तो बताया कि ये पहले पहचान लेते हैं। तो जब पहचानते हैं तो क्या कहेंगे? कि जो देखे, जो सुने, हँ, वो स्थिति आ गई? वो स्थिति नहीं आई। माना देखने की इन आँखों से और इन कानों से दो शब्द वो ध्यान देकरके, जैसे, हँ, जैसे सुना जाता है बड़ा आदमी आता है ना एरिया में, जैसे प्रधान मंत्री आता है, राष्ट्रपति आता है तो कितनी भीड़ लगती है। हँ? कितने चाव से सुनते हैं! क्या बोल रहा है? कैसा है? क्या है? आँखें फाड़-फाड़ के देखते हैं। देखते हैं या नहीं? हाँ। तो इससे तो ज्यादा बेहद का, बड़ा और कोई पार्ट बजाने वाली आत्मा संसार में है ही नहीं। लेकिन भारतवासी क्या करते हैं? हँ? भारतवासी सोए पड़े रहते हैं। और वो जिनको बोला कि बाप विदेशी बनकरके किसके लिए आते हैं? भारतवासियों के लिए पहले आते हैं या विदेशियों के लिए आते हैं? हाँ, विदेशियों के लिए आते हैं क्योंकि विदेशी ही बाप को पहले पहचानते हैं। पहचानते हैं और डम-8 चारों तरफ क्या होता है? हाँ, नगाड़ा बजाय देते हैं बाप आ गया। बेसिक में भी ऐसे ही होता है। पश्चिम में आवाज़ निकली, चलो इंडिया से ही निकली, तो कहाँ से निकली? दक्षिण हैदराबाद? हँ? पश्चिम हैदराबाद से या दक्षिण हैदराबाद से? पश्चिम हैदराबाद से निकली ना। तो पश्चिमी देश हुआ ना। भारत का पश्चिमी देश हुआ। ऐसे तो नहीं कहेंगे पूर्वी देश हुआ। हँ? आता तो है पूरब में वास्तव में। क्या? कहते हैं ना कि इस रथ को कहाँ से पकड़ा? कहते हैं, हँ, कलकत्ते से पकड़ा। क्यों? क्योंकि कलकत्ते में ही यादगार है। क्या? इस मनुष्य सृष्टि का बीज कहाँ पड़ा हुआ है जो बड़े वृक्ष के रूप में दिखाया जाता है? बनियन ट्री। है ना।
 
तो लेकिन वो पहचाना किसी ने नहीं। क्या? पहचाना किसी ने? जो चार मुख वाले ब्रह्मा हैं चार दिशाओं के, हँ, वो उन्होंने पहचाना? उन्होंने भी नहीं पहचाना। और पांचवां मुख जो है ऊर्ध्वमुखी मुख कहा जाता है ब्रह्मा का उसने पहचाना? उसने भी? उसने भी नहीं पहचाना। तो ब्रह्मा तो विदेश में नहीं होता है। ब्रह्मा विदेश में होता है कि स्वदेश में होता है? ब्रह्मा सो विष्णु। हँ? ब्रह्मा कहेंगे मुख वालों को जिनके मुख इकट्ठे होकरके बोलते हैं। हँ? और तो जैसे रावण के मुख होते हैं तो मुख से बोलते हैं। हँ? सहयोग देते हैं? रावण राम राज्य की स्थापना में सहयोग देता है? कि विरोध करता है? हाँ, विरोध करता है। वो जो दिखाया गया है ना कि सागर मंथन हुआ, हँ, तो जो सांप था ना जिसकी रस्सी बनाई गई मथानी, वो मथानी, वो घुमाने के लिए तो मुख किसकी तरफ रहा? मुख रहा किसकी ओर? हाँ, असुरों की ओर मुख रहा। और भारतवासियों की ओर, देवताओं की ओर? हाँ, पूंछड़ी। इसका मतलब क्या हुआ? कि भारतवासी पूंछ माने फालो करते हैं पूंछ को पकड़ते हैं। और जो विदेशी हैं वो क्या करते हैं? हँ? पूंछ को नहीं पकड़ते, मुँह पकड़ते हैं। तुमने ये ऐसा किया, ये हमें समझाओ, वो ऐसा किया, वो समझाओ, ये कैसे हो सकता है? वो कैसे होता? ये हमारी समझ में नहीं आता। वो हमारी समझ में नहीं आता। ऐसे-ऐसे करते रहते हैं। सामना ज्यादा करते हैं। हँ? तो उनको फिर क्या होता है? उनको वा सांप की जो विषैली फुंकार है ना वो सहन करनी पड़ती है।
 
तो बताया – बाप किसके लिए आए? बाप ये देखते हैं; क्या? बाप ये बात देखते हैं कि कौन अपोजिशन कर रहा है, कौन अपोजिशन नहीं कर रहा है? हर बात में, हँ, कोई को तो हर बात अच्छी लगती है। और कोई को हर बात में, क्या, संशय पैदा होता है। तो बाप को दोनों प्रिय हैं या कोई एक प्रिय है एक प्रिय नहीं है? हँ? बाप को तो दोनों प्रिय। हँ? क्योंकि जानते हैं कि ये जो भी मेरे बच्चे हैं वो सब मेरे से वर्सा लेने वाले हैं। कौनसा वर्सा? हँ? पहले जनम का पहले-पहले सुख का वर्सा सबको मिलना है। हाँ। और उसमें भी जितने जनम पार्ट बजाएंगे इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, आधा समय सुख और आधा समय दुख। ये तो सबको है। बाकि हाँ, कि जो मेरे डायरेक्ट बच्चे बनते हैं, हँ, पहचान करके बनते हैं; पहचान करके माने? निराकार सो साकार तो पहचाना या सिर्फ निराकार को पहचाना और साकार के ऊपर विश्वास नहीं बैठा तो पहचाना? नहीं। साकार सो निराकार भगवान को अच्छी तरह से पहचान करके, हँ, जो आँखों से भी देख लेते हैं और कानों से भी दो शब्द सुनते हैं, तो ऐसे बच्चों के लिए बताया कि मैं बाद में प्रत्यक्ष होता हूँ। क्या? पहले-पहले किसके सामने? प्रिफरेंस किसको देता हूँ? प्रिफरेंस विदेशियों को देता हूँ या स्वदेशियों को? विदेशियों को देता हूँ। क्यों? क्योंकि अगर बाप विदेशी बनकरके न आते तो इन बच्चों से मिल भी नहीं, हँ, मिल पाते? नहीं मिल पाते। तो बताया कि रात के बारह बजे वास्तव में दिन होना शुरू होता है। हाँ, और उस बात की गहराई को विदेशी जो बुद्धि में ज्यादा तीखे होते हैं या कहो बुद्धि का जिनको ज्यादा अभिमान होता है वो ही पहचान पाते हैं। दूसरे पहचान पाते हैं? नहीं।           
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