Thursday, October 1, 2020

आत्मा का बाप एक ही परमपिता परमात्मा है। आत्मा का नाम कभी बदलता नहीं है। शरीर का नाम बदलता है। आत्मा भिन्न-2 शरीर लेकर के पार्ट बजाती है अर्थात पुर्नजन्म लेती है। आखरीन कितने जन्म मिलते हैं ? वो भी बाप ही आकर के समझाते हैं बच्चे तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो और बाप तो आते भारत में है। उनका नाम शिव है। समझते भी है शिव परमात्मा है, शिव जंयती वा शिव रात्रि भी मनाते हैं। हे निराकार ! जैसे आत्मा निराकार है वैसे परमात्मा बाप भी निराकार है। वो निराकार भी साकार में आते हैं पार्ट बजाने के लिए। अब निराकार शिव तो साकार बिगर पार्ट नहीं बजाए सकता। मनुष्य इन बातों को कुछ भी समझते नहीं हैं। नयनहीन है। ये शरीर के दो नेत्र तो सबको हैं। तीसरा ज्ञान का नेत्र आत्मा का नहीं है जिसको दिव्यचक्षु कहा जाता है। तो पुकारते हैं नयनहीन को राह दिखाओ अर्थात आत्मा को दिव्यचक्षु चाहिए। आत्मा अपने बाप को भूल गई है इसलिए पुकारते हैं नयनहीन को राह बताओ। कहाँ की राह बताओ ? शांतिधाम और सुखधाम की राह बताओ। सर्व का सद्गति दाता, सद्गुरू तो एक ही है। जो शांतिधाम सुखधाम का रास्ता बताते हैं। मनुष्य कोई मनुष्य का गुरू नहीं बन सकते। सद्गति दे नहीं सकते हंै। ना खुद सद्गति पाते हैं और ना औरों को देते हैं। एक बाप ही जो सबको सदगति देते हैं उस अल्फ बाप को ही याद करना है।
Vcd- 42

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