ब्राह्मणों का धंधा क्या है? ज्ञान लेना है और ज्ञान देना है। ये ही मुख्य धंधा है। तो भगवान बाप के हम सब बच्चे हैं। अभी यहाँ बैठे हैं, वातावरण में बैठे हैं, तो उमगं-उत्साह आता है,हम ज़रूर ऐसा पुरूषार्थ करें! फिर बाहर की दुनिया में गए, 'गंगा गए गंगानाथ, जमुना गए जमनुानाथ।' जो दृढ़ता क्या धारण करनी है? क्या धारणा धारण करनी है? ये शरीर रूपी धनुष है, कैसा बनाना है ? एकदम ऐसा लचीला बनाना है, इस दुनिया में चाहे जैसी परिस्थिति आ जाए, लेकिन हम हिलने वाले नहीं हैं। हम वैसा ही लचीला पुरूषार्थ करके दिखाएँ जैसा भगवान बाप हमसे चाहते हैं। क्या चाहते हैं? भगवान बाप हमसे चाहते हैं, चैलेंज देते हैं, बापदादा ने जो बोला हुआ है- "राख कौन बनते हैं और कितने बनते हैं और कोटों में से, लाखों में से एक कौन निकलते हैं, वह भी देखेंगे।" अपने दहेभान को क्या बना दें? राख बना दें।
Vcd- 2238
वार्तालाप प्वाइंट वार्ता न. 322
स्टूडेन्ट- बाबा, एक छोटा-सा क्वेश्चन और है। जैसे आपने आज बताया ना कि जितना याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। ये तो हो गई याद में विकर्म विनाश होने की बात। जो आप से मिलना तीन घंटे का हुआ उसमें कितना विकर्म विनाश होंगे?
बाबा - मिलने से, जुलने से विकर्म विनाश नहीं होते हैं; लेकिन मिलने के बाद जो स्मृति आती रहती है। स्मृति आएगी या नहीं आएगी? कोई भी हमको सुख देता है तो सुख देने वाला याद आता है या नहीं आता है? तो जो याद आती रहती है वो याद से हमारे पाप कर्म भस्म होते जावेंगे। और फस्र्ट इम्प्रेशन इस दी लास्ट इम्प्रेशन। पहली बार मिलने में जो बात होती है, गहराई होती है वो बाद में उतनी नहीं होती है। इसलिए फायदा ही फायदा है।
समय-31.16
भगवान जो नई दुनियाँ रचता है उसमें कोई भी बीमारी नहीं होती। कोई भी प्रकार का दुःख नहीं होता। कोई भी प्रकार का भय नहीं होता। कोई भी प्रकार की अशांति नहीं होती। सुख-शांति से भरपूर दुनियाँ बनाकर के जाता है। कोई कहते हैं- ऐसा न कभी हुआ है, न होगा। अरे, जब दिन का सोझरा हो सकता है और रात का घोर घुप्प अंधेरा हो सकता है। दोनों बातें विपरीत हो सकती हैं कि नहीं? होती हैं। तो फिर दुनियाँ में घोर सुख और घोर दुःख भी हो सकता है। ये सतयुग की जो दुनियाँ थी, जहाँ लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, उन लक्ष्मी-नारायण के राज्य में कोई भी दुःख नहीं था। इसलिए 33 करोड़ देवताओं में से एक भी ऐसा देवता नहीं है जिसकी ग्लानि न हो। एक लक्ष्मी-नारायण ही ऐसे हैं जिनकी दुनियाँ में कोई ग्लानि नहीं है। शास्त्रों में भी कहीं कोई ग्लानि नहीं है। ऐसे लक्ष्मी-नारायण का राज्य भगवान आकर के स्थापन करता है। इसलिए गीता में लिखा हुआ है- हे! अर्जुन, मैं ऐसा ज्ञान देता हूँ जो तू नर अर्जुन नारायण बने और हे! द्रोपदी नारी, तू इस ज्ञान को पाकर के नारायणी बनेगी। मनुष्य को देवता बनाना ये भगवान का काम है। नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनाना मनुष्य गुरुओं का काम नहीं है।
Vcd- 1387
वार्तालाप प्वाइंट वार्ता न. 322
स्टूडेन्ट- बाबा, जो शरीर छोड़ते हैं उनकी आत्मा भटकती है और बाबा कहते हैं कि आत्मा तो उसी शरीर में प्रवेश करती है। तो यही समझ में नहीं आ रहा है।
बाबा - जो अकाले मौत में शरीर छोड़ते हैं उनकी आयु पूरी नहीं होती है। आयु पूरी न होने की वजह से वो आत्मा भटकती रहती है। उसका और एक कारण ये है कि जिनकी अकाले मौत होती है उन आत्माओं के ऊपर पाप का बोझा जास्ती चढ़ जाता है। वो बोझा और जास्ती न चढे़ इसलिए उनको अपना शरीर नहीं मिलता है। वो दूसरे के शरीर में प्रवेश करके उल्टा-पल्टा कार्य करते रहते हैं। इसलिए ऐसी आत्माएँ भटकती रहती है; तुरन्त जन्म नहीं लेती। जब उनका पापों का बोझा हल्का हो जाता है तब उन्हें जन्म मिल जाता है।
समय- 29.10
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