Thursday, October 15, 2020

शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2808, दिनांक 03.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
VCD-2808-extracts-Hindi
समय- 00.01-18.58
 
आज का प्रातः क्लास है – 14.11.1967. मंगलवार को रिकार्ड चला – ये कौन आया आज सवेरे-सवेरे, हँ, कि दिल चौंक उठा सवेरे-सवेरे? किसका दिल चौंक उठा? हँ? दिल चौंक उठा माने दिल प्रभावित हुआ। पहले-पहले किसका दिल चौंक उठा? हँ? अरे, किसी का तो चौंक उठा होगा ना? हं? (किसी ने कुछ कहा।) मुकर्रर रथ चौंक उठा? वो पत्थर दिल, उसका दिल चौंक उठा? हँ? पत्थरबुद्धि का दिल भी कैसा होगा? पत्थरबुद्धि का दिल भी पत्थर। हँ? हाँ। वो गीत गाते हैं ना – पत्थर के सनम तुझे हमने क्या जाना? बड़ी भूल हुई। क्या? हाँ। तो ये गीत है; (किसी ने कुछ कहा।) लक्ष्मी का गीत है? अच्छा? किस समय का गीत है लक्ष्मी का? हँ? अरे? कोई को तो लक्ष्मी ही लक्ष्मी दिखाई पड़ती। हँ? दिखाई पड़ना चाहिए नारायण को। हँ? बताओ। कब? लक्ष्मी का दिल अगर चौंक उठा तो कब? सो पता नहीं। ये पता है कि लक्ष्मी का ही चौंक उठा होगा। हँ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 5 दिसम्बर को दिल चौंक उठा? अच्छा? और सवेरे-सवेरे आया कौन? 5 दिसम्बर को सवेरा हुआ? हँ? कब कहें सवेरा हुआ? और किसका दिल चौंक उठा?
 
अरे, अरे, पहले-पहले तो दिल चौंक उठा दादा लेखराज ब्रह्मा का जिनको साक्षात्कार हुए। हँ? और उन साक्षात्कारों का अर्थ उनको कहीं से भी पता नहीं चला। न अपने गुरु से, न दुनिया के या बनारस के विद्वान, पंडित, आचार्य या कोई से भी नहीं पता चला। फिर जब अपने अनुभव के आधार पर जिस विद्वान व्यक्ति को समझा कि सच्चा व्यक्ति है, उस अपने भागीदार के पास पहुँचे। तो उसने जो बताया तो दिल चौंक उठा। चौंक उठा कि नहीं चौंक उठा? हाँ। फिर भी जाना तो नहीं ये कौन आया। हँ?
 
ओमशान्ति। तो ये कौन आया? भगवानुवाच। सुना - कौन आया? हँ? किसने पूछा? शिव बाप ने पूछा – सुना - कौन आया सवेरे-सवेरे? हँ? और किसमें आया? सुना? कुछ जाना तुमने? पहले किससे पूछा? पहले तो दादा लेखराज ब्रह्मा से ही पूछा। कौन आया? अरे, भगवानुवाच। देहधारी को भगवान नहीं कहा जाता। क्या? जो देह में जिसकी बुद्धि धरी हुई हो, उसको भगवान कहा जाता है? नहीं। भगवान तो न देह लेता है, न देह का जन्म लेता है, हँ, और न देह में आसक्त होता है। वो तो देहधारी है ही नहीं। तो देहधारी नहीं है, विदेही है, तो फिर ये भक्तिमार्ग में जो अर्जुन का रथ दिखाया है वो किस बात की यादगार? हँ? वो इसी बात की यादगार है कि देह ली ना अर्जुन की। ये शरीर रूपी रथ लिया। हँ? तो शास्त्रों में ही लिखा हुआ है, हँ, शरीरं रथं विद्धि इन्द्रियाणि हयान्याहू। हँ? ऐसे बोला है ना? तो ये शरीर जो है अर्जुन का जो ज्ञान धन अर्जन करने में सबसे आगे है। तो भगवान के पास क्या है? हाँ? उसके पास तो अखूट ज्ञान धन की संपत्ति है। तो उसकी वैल्यू जो देता होगा उसी के रथ में आएगा ना। हाँ। लेकिन जिसके रथ में आया उसकी बुद्धि तो देह में धरी हुई है या विदेही में धरी हुई है? विदेही को तो जानता ही नहीं। जानता है? हँ? जानता है? नहीं। वो तो कब आता है कब जाता है किसी को पता भी? पता भी नहीं चलता। तो जो रथधारी अर्जुन है वो तो देहधारी है। उसको तो भगवान नहीं कहा जा सकता। हँ? किसको कहा जा सकता है भगवान?
 
भगवान तो उसे कहा जा सकता है जो देह में जिसकी बुद्धि एक सेकण्ड भी न टिके। क्या? कहाँ टिके? या तो अपनी आत्मा ज्योति में टिके या तो, हँ, किसमें टिके? वो मन-बुद्धि रूपी आत्मा है वो आत्माओं के बाप की याद में टिके। हँ? और किसी की याद में दुनिया में न टिके। तो, तो कहेंगे उसको भगवान। (किसी ने कुछ कहा।) मंथन? अरे? मंथन भी तो अधूरी स्टेज है ना। हँ? कि भगवान की स्टेज है? हँ? मंथन करता है, मनन-चिंतन-मंथन करता है तो मन का उपयोग करता है ना। हँ? हाँ। और भगवान को मन होता है क्या? हँ? भगवान को तो मन ही नहीं होता, हँ, जो मनन-चिंतन-मंथन करे। और उसे मनन-चिंतन-मंथन करने की दरकार भी? दरकार भी नहीं है। क्यों? क्योंकि वो तो अजन्मा है, अकर्ता है, अभोक्ता है, त्रिकालदर्शी है। हँ? जन्म-मरण के चक्र में न आने से वो तो सब कुछ जानता है पहले से ही। तो किस बात का मनन-चिंतन-मंथन करेगा? करेगा? हाँ, जिसमें प्रवेश करता है, हँ, देहधारी में तो उसके लिए बताया कि वो जिस देहधारी में प्रवेश करता है उसको पहले-पहले आप समान बनाता है। कैसा आप समान? हँ? निराकारी, निरहंकारी, हँ, निर्विकारी। अभोक्ता बनाता है कि नहीं? हँ? अरे? हाँ, अभोक्ता। जब आत्मा संपन्न बनेगी तो देहभान होगा तो भूख लगेगी? हँ? देहभान होगा तो कोई भी इन्द्रियों की भूख लगेगी कि नहीं? तो भूख लगेगी। और देहभान है ही नहीं, आत्मिक स्थिति है सदाकाल, तो भूख लगेगी? न कोई भूख, न कोई प्यास।
 
तो बताया – जैसे सुप्रीम सोल बाप हैविनली गॉड फादर कहा जाता है कि वो हैविन बनाने का रास्ता बताता है, हँ, ज्ञान बताता है, जानकारी देता है। और जिसको जानकारी पहले-पहले देता है वो ही इस संसार में क्या कहा जाता है? भगवान। भगवान माने? भग का अर्थ भाग्यवान भी है। हँ? कहते हैं ना जिस घर में कन्या पैदा होती है तो कन्या अपना भाग्य लेके आती है। हँ? तो कन्या भग वाली है। हाँ। तो ज़रूर जो भाग्य है वो काहे से बनता है? सन्यासियों का भाग्य बनता है क्या? हँ? वो तो, वो तो घृणा के मारे छोड़छाड़ के भाग खड़े होते हैं। तो उनका भाग्य कहेंगे? कोई भाग्य नहीं। तो भाग्य तो कहा जाता है किसका ऊँचे ते ऊँचा? ऊँचे ते ऊँचा भाग्य उसका कहा जाता है जो विश्व का मालिक बने। हँ? कौनसी ताकत से? हँ? भगवान की, जो सुप्रीम सोल गॉड फादर है, उसकी याद की पावर से, हँ, योग की पावर से, हँ, विश्व का मालिक बन जाए। माने राजाई राजयोग से मिलती है ना। तो इसलिए; फिर उसे देहधारी थोड़ेही कहेंगे? क्या? देह में बुद्धि धरी रहेगी या विश्व कल्याण में बुद्धि धरी रहेगी? हँ? स्वार्थ में बुद्धि लगेगी, रथ माना शरीर के कल्याण में बुद्धि लगेगी या सारे विश्व के कल्याण में बुद्धि रमण करेगी? सारे विश्व के कल्याण में बुद्धि रमण करेग। क्योंकि ये भी देहधारी है ना। ये भी कौन? ये भी है और फिर वो भी है। ‘ये’ किसके लिए कहा? हँ? हाँ, दादा लेखराज ब्रह्मा के लिए कहा जिसके तन में ये वाणी चलाई जा रही थी कि ये भी है देहधारी। ये ‘भी’ का मतलब क्या है? कि ये भी है और कोई दूसरा भी है देहधारी। तो इनको; इसको भी और जो दूसरा है उसको भी। हँ? मुकर्रर रथधारी भी है ना। ये तो टेम्परेरी रथ है। आज है, सन् 67 में है और पता नहीं एक साल के बाद रहे या, या न रहे। हाँ।
 
तो इनको तो भगवान नहीं कहा जा सकता। हँ? दोनों को नहीं भगवान कहा जा सकता। कब? हँ? माने 1967 की बात बताई कि वो देहधारी हैं कि विदेही हैं? भगवान तो विदेही होता है। देह के विपरीत होता है। देही माने देह को धारण करने वाली आत्मा। और आत्माएं सब भोगी होती हैं। इस दुनिया में सब आत्माएं भोगी कि संपूर्ण योगी? सब भोगी। तो भगवान तो विदेही है। वो भोग वासना से बिल्कुल न्यारा है। तो इनको भगवान नहीं कहा जा सकता। दोनों को नहीं। न मुकर्रर रथधारी को और न टेम्परेरी रथधारी दादा लेखराज ब्रह्मा को।
 
बाकि बच्चे जानते हैं। कौनसे बच्चे? रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाबा आया हुआ है। कौन बच्चे जानते हैं? हँ? रूहानी बच्चे जानते हैं। तो वो रूहानी बच्चे जिस्मानी नहीं हुए? हँ? जिस्मानी हुए तो। लेकिन फिर भी कुछ न कुछ रूह की स्थिति में टिकने वाले हैं या नहीं हैं? हाँ, जरूर कुछ न कुछ रूह की स्थिति में टिकने वाले हैं। तो रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाबा आया हुआ है। कि ये पहले ही से बताया जाता है। क्या? अभी की बात नहीं है 1967 की। ये तो पहले से ही बताया जाता है कि देहधारी को कभी भी भगवान नहीं कहा जा सकता है। हँ? न आज और न भविष्य में कभी और न पास्ट में कभी देहधारी को भगवान कहा गया हो ऐसे तो होता ही नहीं। और ये भी पहले से बताय दिया। क्या? कि रूहानी बच्चे कब कहे जाएं? जब रूह की पहचान हो।
 
तो रूह की पहचान, रूह की पहचान कब से कहें? हँ? कबसे कहें? (किसी ने कुछ कहा।) 1936 से रूह की पहचान हो गई? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 5 दिसम्बर को रूह की पहचान हुई? माने 5 दिसम्बर को रूह की स्थिति में टिका नहीं, सिर्फ पहचान हुई? हँ? टिका या पहचान हुई? हँ? टिका भी। तो वो टिकने की बात नहीं है। पहचान कबसे हुई जो रूहानी बच्चा कहा जाए? एक पहचान होना अलग बात है। और उस स्थिति में टिकना अलग बात है। तो पहचान 1936 से हो गई? अच्छा? हँ? कैसे? हाँ। 36-37 में जब दादा लेखराज को उनके साक्षात्कारों का अर्थ बताया गया, हँ, तो फिर भगवान ने तो, जो भगवान ऊँच ते ऊँच आत्मा कही जाती है, सुप्रीम सोल गॉड फादर, वो तो कुछ न कुछ आकरके सुनाएगा ना। तो उसने तो पहले-पहले ये ही बात सुनाई होगी। क्या? क्या? गीता का पहले ओम मंडली में क्या किया जाता था? क्लेरिफिकेशन दिया जाता था, व्याख्या दी जाती थी। तो गीता में तो ये श्लोक आया हुआ है। क्या? अणोणीयांसम् अनुस्मरेत यः। आत्मा या आत्माओं का बाप क्या है? अणु रूप है। लेकिन किसी को समझ में नहीं आया। ये समझ में तो आया कि अणु रूप, अणोणीयांसम् माने अणु से भी अणु रूप छोटी से छोटी अति सूक्ष्म आत्मा, ये भृकुटि के मध्य में है, ये इतना समझ में आया। तो जिनको समझ में आया वो तो थोड़ा बहुत तो प्रैक्टिस करेंगे ना। तो बताया कि ये सभी देहधारी बच्चों को भगवान नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये इनकी देह तो है ही नहीं। किनकी देह? शिव बाप की देह तो है ही नहीं। ये तो बच्चे सभी जानते हैं ये पराई देह है।          
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