शिवबाबा की मुरली
सीडी 2805, दिनांक 28.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
VCD-2805-Hindi-Part-2
समय- 21.21-39.20
अब तुम बच्चे तो सब समझ गए हो। हँ? तुम बच्चे। ये बच्चे नहीं। ये बच्चे और तुम बच्चे क्या हुआ? ये माने? जिनको बाजू में रख दिया उनको कहेंगे ये। और तुम माने? तुम माने जो सन्मुख बैठे तो तुम। अच्छी तरह से समझ गए हो कि ऊपर में है बाबा। हँ? ऊपर में बाबा है या बाप है? कौन है? हँ? माला में ऊपर में कौन है? हाँ, जो रुद्र माला बनती है, ऊपर में फूल दिखाते हैं। उसको मणका नहीं दिखाते हैं। क्यों? क्योंकि वो तो जो भी आत्माएं हैं इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली उन सबके बीच में सबसे जास्ती हल्की-फुल्की है या भारी है? हाँ। हल्की-फुल्की आत्मा है। प्रवेश करती है तो पता नहीं चलता, निकल जाती है तो भी पता नहीं। और बाकि आत्माएं? बाकि आत्माएं तो सूक्ष्म शरीरधारी भी बनती हैं। तो जो सूक्ष्म शरीरधारी बनती हैं, ज्यादा पाप करती हैं, तो वो प्रवेश करती हैं, तो चेहरा-मोहरा भारी हो जाता है।
तो ऊपर में है बाबा। कौनसा बाबा? क्या कहेंगे? ऊपर में है शिवबाबा। और पीछे तो फिर युगलों की माला। उसमें शिवबाबा नहीं है। उसमें क्या है? हँ? उसमें युगल मणका ऊपर है। बाकि 108 मणके नीचे हैं। वो युगल मणका ऊपर क्यों दिखाया गया? इसलिए दिखाया गया कि ये माला के अंदर जो युगल मणका दिखाया गया ये इस युगल मणके को फालो करने वाले सब युगल हैं। हँ? वो कोई भी वो नहीं हैं जो रुद्रमाला में दिखाया गया सिंगल-सिंगल। हाँ। क्योंकि पीछे तो युगल की माला बनेगी ना। युगल ही हैं प्रवृत्ति मार्ग वाले। देवताएं तो प्रवृत्तिमार्ग वाले ही होते हैं ना। हँ? प्रवृत्ति को निभाने वाले होते हैं या प्रवृत्ति को तोड़ देते हैं? हँ? क्या करते हैं? प्रवृत्ति को निभाते हैं। हाँ। तुम सतयुग में जावेंगे, त्रेता में जावेंगे, वहाँ प्रवृत्ति को निभावेंगे ना। कितने जन्म? हँ? बताया - कितने जनम? 21 जनम के लिए तुमको पक्की प्रवृत्ति निभानी है। तो उसके लिए क्या करें? कहते हैं अपन को आत्मा समझो। क्योंकि प्योर होकरके, पवित्र होकरके ही तुम आत्मा को जाना है। इस आत्मा में देहभान का कोई भी खाद पड़ा रहेगा, कोई भी धर्म का या देवी देवता सनातन धर्म का भी; खाद पड़ती है कि नहीं उनमें? हँ? सतयुग में भी खाद पड़ती है कि नहीं? हाँ, नहीं पड़ती? अरे, ज्ञानेन्द्रियों की खाद पड़ती है ना। ज्ञानेन्द्रियों में भी ऊँचे ते ऊँची और नीची इन्द्रियां भी होती हैं। तो नीची इन्द्रियों का सुख लेने वाले बाद में आते हैं या पहले आते हैं? हँ? बाद में आते हैं। तो जो बाद में आते हैं और ज्यादा संख्या में आते हैं तो उनके संग का रंग लगता है। तो कुछ न कुछ नीचे आत्मा गिरती तो है ना। लेकिन अभी तो तुम सबको पवित्र होकरके जाना है। कैसा होके जाना है? हँ? कोई भी धर्म का, कोई भी संग का रंग न रहे। एकदम पवित्र। तो अगर पवित्र नहीं बनेंगे तो फिर सज़ाएं खाएंगे। सज़ाएं खाकरके जाना होता है। हँ?
तो मीठे-मीठे सीकिलधे यानि 5000 वर्ष के बाद और बाबा घड़ी-घड़ी कहेंगे 5000 वर्ष के बाद; हँ? ये 5000 वर्ष को घटाएंगे नहीं कि कोई जल्दी आ जाएंगे। नहीं। फिर से आय करके मिले रूहानी बच्चों के प्रति रूहानी बाप का और रूहानी बाप ही तो पढ़ाते हैं। हँ? जिस जिस्मानी बाप में मुकर्रर रूप से भी पढ़ाते हैं या टेम्परेरी शरीरधारियों में भी पढ़ाते हैं, तो पढ़ाने वाला है कौन? एक ही बाप है ना। आत्माओं का बाप ही पढ़ाते हैं। तो वो भी समझते हो बरोबर क्योंकि आत्मा ही तुम हो। क्योंकि आत्मा को ही पढ़ाते हैं।
अभी देखो तुम भी ज्ञान के सागर बन रहे हो ना। हँ? सारा ज्ञान किसमें बैठा? कहेंगे नदियों में बैठा, सरोवरों में बैठा, झीलों में बैठा या सागर में बैठा? सारा ज्ञान तो एक सागर में ही बैठता है। हाँ। अब ये किसने कहा? कौन कहते हैं ऐसे-ऐसे कि सारा ज्ञान एक सागर में ही बैठता है? हँ? न पहाड़ों में बैठता है। हँ? (किसी ने कुछ कहा।) हाँ, शिव में बैठता है? हँ? हां, शिव कहते हैं सुप्रीम सोल बाप कहते हैं कि सारा ज्ञान तो सागर में बैठा। बैठा? पूछा। हँ? ये किसने? पूछा है। ऐसे-ऐसे पूछा है। तो ये आत्मा कहती है ना, हँ, कि हाँ, मुझे इतनी छोटी सी बिन्दी में ये जो आपका इतना सारा अखूट ज्ञान का भंडार है वो बुद्धि में है आत्मा में। जो हम साथ में ये संस्कार ले जाएंगे। कहाँ ले जाएंगे? हँ? ये अखूट ज्ञान के भंडार के संस्कार साथ में ले जावेंगे। कहाँ ले जाएंगे? हँ? अरे, नई दुनिया में ले जावेंगे? हाँ, वहाँ तो सार रूप में ले जावेंगे। बीजरूप में ले जावेंगे। बीज सार को कहा जाता है ना। हाँ। फिर वो संस्कार कहाँ विस्तार को पाएंगे? हाँ, कहेंगे द्वैतवादी द्वापरयुग में फिर विस्तार में जाएंगे। परन्तु वहाँ शिव बाप तो, शिव बाप तो होगा नहीं। तो क्या अंतर पड़ेगा? कुछ न कुछ अपनी मनमत मिक्स करेंगे या नहीं करेंगे? करेंगे।
तो देखो शरीर तो सबके खतम हो जाते हैं ना। यहाँ कोई को शरीर रह जाता है क्या? नहीं। तो ये घड़ी-घड़ी, घड़ी-घड़ी अपने से बात करनी चाहिए। करनी पड़े। ये हुई अपने से आपे ही बातें करना। और फिर अंदर ही अंदर विचार सागर मंथन करना। नहीं तो अपने आप से चरिये-खरिये पागल लोग बात करते हैं। अब ये मालूम है तुम लोगों को। चरिये लोग जो होते हैं वो आपे ही आपे बक-बक करते रहते हैं। कहीं भी जाएंगे कुछ न कुछ बक-4 करते ही जाएंगे। हँ? दीवाल पर लिखते जाएंगे। ये दीवाल होगी, ये होगा, वो होगा। ये पता नहीं क्या बोलते जाएंगे। और जितना भी रास्ता चलते जाएंगे सारा रास्ता बोलते चले जाएंगे। हाँ, कि चरिये लोग ऐसे विचार-सागर-मंथन चरिये बनके करते हैं। क्या? अभी तुमको कुछ बोलने का नहीं है। क्या? अंदर ही अंदर विचार-सागर-मंथन करना है। वो चरिये-खरिये तो बाहर से मुख से बहुत बोलते जाते हैं। हँ? वो तो मुख से बोलते हैं। और तुमको तो कुछ बोलने का ही नहीं है। सारा सब कुछ तुम्हारे दिल में रखा हुआ है।
अभी देखो सारा झाड़ तुम्हारी बुद्धि में खड़ा हो गया। हँ? सारा झाड़ माने? सब धर्मों की टाल-टालियां दाईं ओर की, बाईं ओर की। हँ? और तुम्हारा अपना मुख्य तना। वो भी बुद्धि में आया ना। हाँ, सारा ख्याल आ गया। ऊपर से लेकरके और स्थूल के 84 जन्म तक। तुमको सारा बुद्धि में बैठ गया। सतयुग से लेकरके कलियुग के अंत तक। कोई भी तुम्हारे से बोलेंगे - तुम रचयिता और रचना के आदि-मध्य-अंत को जानते हो? तो तुम तो फट से सुना देंगे। और कह देंगे कि हां हम जानते हैं। जानते भी हैं और हम बताय भी सकते हैं नटशैल में। क्या? क्योंकि वो ऋषि-मुनि, सन्यासियों ने तो सृष्टि की आयु लाखों वर्ष बताय दी। तो वो तो बताय ही नहीं सकते। हँ? और यहाँ तो हमको बाप ने बताया है कि ये चारों युगों का, चार सीन का जो ड्रामा में बेहद में चक्कर है वो टोटल 5000 वर्ष का है। तो पीछे कोई अच्छा बताय सकते हैं। कोई तुम बच्चों में फिर नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार कम बताय सकते हैं। पर बताय तो सकते हैं ना।
और ये तो जानते हो कि आगे हम ये नहीं थे। क्या? ये क्या? आगे हम ये नास्तिक नहीं थे। क्या थे? हँ? आगे हम आस्था रखने वाले, श्रद्धा-विश्वास रखने वाले थे। हँ? कहेंगे, बाप कहेंगे - तुम आस्तिक भी नहीं थे। क्या? आस्तिक थे? हँ? आस्तिक किन्हें कहा जाता है? जो बाप को जानते हैं कि बाप प्रैक्टिकल में इस दुनिया में किस मुकर्रर रथ में पार्ट बजाय रहा है पुरानी दुनिया को पलट करके नई दुनिया बनाने का। तो जो जानते हैं उसको, बाप को जानते हैं तो आस्तिक और बाप को प्रैक्टिकली नहीं जानते हैं तो? तो नास्तिक। तो कहेंगे, हँ, आगे हम नास्तिक थे, आस्तिक नहीं थे। अभी भी? अभी भी कोई कहेंगे; क्या कहेंगे? हम आस्तिक हैं कि नास्तिक हैं? हँ? क्योंकि दुनिया सारी नास्तिक है। और तुम थोड़े से बच्चे आस्तिक। ब्राह्मण ही हैं ना। ब्रह्माकुमार-कुमारी। तो सिर्फ ब्राह्मण ही आस्तिक हैं। हँ? किनको कहेंगे ब्राह्मण? हँ? यहाँ तो 4-5 ब्रह्मा के मुख दिखाय दिये। तो पक्का ब्राह्मण किसको कहें? हँ? तो कहेंगे, हाँ, नंबरवार ब्राह्मण हैं। भक्तिमार्ग में भी कहते हैं ना। ब्राह्मणों की नौ कुरियाँ होती हैं। नौ ऋषि-मुनियों के आधार पर नौ कुरियाँ बनाई हुई हैं। तो देखो, नंबरवार क्यों कहा? नंबरवार ब्राह्मण कोई फर्स्ट कुरी के कोई लास्ट कुरी के, कोई मध्यम कुरी के। क्योंकि फर्स्ट कुरी में जाने के लिए, आदि नारायण के राज्य में जाने के लिए, हँ, विष्णु लोक में जाने के लिए, वैकुंठ में, दैवी गुण तो बहुत अच्छी तरह से चाहिए। क्या? कैसा दैवी गुण? कलाओं में बंधे हुए दैवी गुण? हँ? 16 कला संपूर्ण दैवी गुण? नहीं। कलाओं से भी अतीत। जैसे सूर्य होता है ना। सूर्य की कलाएं होती हैं? होती हैं? नहीं होती हैं। वो तो कलाओं से भी परे। तो ऐसे दैवी गुण, हँ, बच्चों में कमी रहती है। बच्चों में बहुत ही कमी रहती है।
फिर भी कहेंगे टाइम तो पड़ा है ना। वो तो 67 की मुरली है ना सिक्स्टी सेवन की। तो कहा टाइम तो पड़ा है ना। फिर भी भले टाइम पड़ा है, पुरुषार्थ करके जितना हो सके इतना दैवी गुण धारण करना चाहिए। हँ? जितना उतना क्या? हँ? नौ कुरी के ब्राह्मण हैं तो नौ कुरी में लास्ट कुरी में तो कोई नहीं जाना चाहेगा। हँ? क्योंकि लास्ट कुरी के बाद तो फिर अंदेशा रहता है कहीं उससे भी बाहर न चले जाएं, नास्तिक न बन जाएं। हाँ। तो पुरुषार्थ करके जितना हो सके नौवीं कुरी से लेकरके आठवीं, सातवीं, जितना ऊपर चढ़ सकें इतना दैवी गुण धारण करना चाहिए। और फिर जो अवगुण हैं; हँ? जब दैवी गुण धारण करेंगे तो अवगुण सारे निकालते जाना चाहिए। अब अवगुण भी धारण रखेंगे और गुण भी धारण करेंगे तो फिर? तो फिर कुछ मिलेगा? हँ? पलड़ा बराबर हो जाएगा। हँ? या हो सकता है अवगुणों का पलड़ा भारी हो जाए। तो कुछ भी नहीं मिलेगा। फिर लाटरी मिलेगी क्या? हँ? नहीं मिलेगी। अच्छा, ऐसे मीठे-मीठे रूहानी पुरुषार्थी बच्चों के प्रति रूहानी बाप व दादा का दिल व जान से, सिक व प्रेम से यादप्यार व गुडमार्निंग। ओमशान्ति। (समाप्त)
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