Monday, October 5, 2020

शिवबाबा की मुरली
           वी सीडी 2805, दिनांक 28.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
VCD-2805-Hindi-Part-1
समय- 00.01-21.20
 
प्रातः क्लास चल रहा था – 13.11.1967. सोमवार को सातवें पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – कि तुम बच्चे तो ट्रस्टी हो ना। ट्रस्टी को सेठ पैसा देंगे तो काम चलेगा। नहीं तो काम कैसे चलेगा? तो ये ब्रह्मा भी ट्रस्टी है। और नंबरवार जो भी ब्रह्मा नामधारी हैं ट्रस्टी हैं। बच्चों को सुनाया है शिवबाबा का भंडारा भरपूर है। ये बाबा ट्रस्टी है ब्रह्मा बाबा क्योंकि ट्रस्टी हुआ ना सच-सच। तो है भी ऐसे ही बरोबर ट्रस्टी यानि इनका तो कुछ भी नहीं है बिल्कुल भी। जब अपना सब कुछ दे दिया तो इनका कैसे हुआ? तो इनको तो फिर कोई चीज़ याद भी नहीं पड़नी चाहिए। क्या? तन दिया, धन दिया, हँ, मन के संकल्प दिये, तो जो संकल्प बाप चलाना चाहते हैं वो ही चलाएं ना श्रीमत के अनुकूल। कुछ भी याद नहीं पड़ना चाहिए श्रीमत के विपरीत। समझा ना?
 
ये क्या है? ये तो शिव बाबा का है। अब हमारा तो कुछ भी नहीं है। हँ? किसने कहा? हँ? ब्रह्मा बाबा ने कहा हमारा तो कुछ भी नहीं है। बाबा को दिया तो दिया। कोई भी चीज़ हमारा कुछ भी नहीं। अब हम तो ऐसे समझें कि हम अकेला आया है, अकेला आए हैं, आत्मा अकेली आई है ना। आत्मा जाने। तो जानती है आत्मा कि जाने का है। इसलिए हम अकेला बनने के लिए याद करते रहते हैं बाप को। हँ? जितना बाप को याद करेंगे तो प्रैक्टिस पक्की होती जावेगी। अकेले होते जावेंगे। सब भूल करके अकेले। 13.11.67 के प्रातः क्लास का आठवां पेज। फिर रोज़-रोज़ समझाते रहते हैं बच्चों को – अरे भाई ये सारी दुनिया को अब भूल जाने का है। हँ? ये बेहद का सन्यास है। तो इस दुनिया को भूलते जाओ, भूलते जाओ, भूलते जाओ। बाकि आत्मा समझते जाओ। और ऐसे तो तुम सच-सच आत्मा ही थे ना। और रहने वाले भी तुम आत्मलोक के। हँ? तुम भी तो दूरदेश के रहने वाले हो ना। यहाँ आए हो इस देश में। पहले तो अपने देश में आए थे। कहाँ? नई दुनिया में। हँ? राज्य करने के लिए आए थे। हाँ। वो राज्य, जहाँ दुख का नाम-निशान नहीं था। पीछे वो पराया देश आया। किसका? हँ? पराया माने; पराया माने पर का। अपना नहीं कहेंगे। पर माने? पर माने प्रकृति। हँ? स्व माने आत्मा। प्रकृति क्या? ये जो पांच तत्वों का जो शरीर हैं ना, ये क्या है? प्रकृति है। प्रकृति का ये संघात है। तो ये भी पराया हुआ।
 
अब देखो ये फारेनर आ गए देखो। कौनसी तरफ इशारा किया? अरे, इब्राहिम, बुद्ध, क्राइस्ट ये क्या हैं? फारेनर हुए ना। तो सबसे दुश्मन तो फारिनर। हँ? सबसे दुश्मन फारेनर। बाप समझाते हैं ना इनको। दुनिया तो कोई नहीं जानती है कि ये रावण कोई हमारा दुश्मन है। और हम हैं रावण के राज्य में। तो दुनिया में कोई की बुद्धि में ये है कि हम रावण राज्य में हैं? नहीं। देखो, जब कहते भी हैं तुम रावण सम्प्रदाय और राम राज्य में जाने वाले हो, हँ, तो वो बिगड़ पड़ेंगे। हँ? कौन बिगड़ पड़ते हैं? अरे, यही कांग्रेसी। हँ? काहे की रेस? कांग्रेसी काहे की रेसी? कांव-कांव की रेसी। बिगड़ पड़ते हैं। कांव-कांव करके किसको बुलाते हैं? हँ? वो ही जो फाइव स्टार होटल खोले हुए हैं। आओ कांव-कांव तुम भी आओ। बोलते हैं - हमको रावण क्यों कहते हो? तो जो ब्राह्मण बच्चे चुस्त होंवें, बोलें - वाह, तुमको एम.पी. कृपलानी, फलाना, टीरा जो कहते हैं। अरे, ये सभी रावण राज्य है। उनको कुछ नहीं कहते हो। हँ? हमको कहते हो। अरे, हमको रावण राज्य क्यों कहते हो? क्योंकि सभी कहते तो हैं ना बाहरवाले। हँ? सभी बहुत कहते हैं - ये रावण राज्य है। ये तो मुख से बहुतों को निकलता ही रहता है। इसलिए वो कहते हैं ये रावण राज्य को उखाड़ देना चाहिए, उड़ा देना चाहिए। क्यों? रावण ने क्या किया? हँ? क्या करता है? पराई स्त्री को, हाँ, कंट्रोल में करता है। तो यथा राजा तथा? तथा प्रजा हो जाती है। तो ये करना चाहिए। इनको उड़ाय देना चाहिए।
 
सो तो ज़रूर आखरीन में ये सिविल वार तो होनी ही है। सिविल वार माने क्या होता है? अंदर ही अंदर, हाँ, अंदर ही अंदर, ऊपर से पता नहीं चलता कि कोई वार हो रही है। अंदर ही अंदर युद्ध चलता रहता है। तो बताया – सिविल वार कहते हैं। क्या? कि आपस में लड़ाई-झगड़ा। अब ये तो ज़रूर यहाँ होगा। हँ? होएगा ना। क्योंकि ये भारत ही एक ऐसा देश है। कैसा? और इसकी राजधानी भी ऐसी ही है। कैसी? जो सबको अड्डा दे देते हैं। क्या? दिल्ली की राजधानी में देखो, हाँ, क्रिश्चियन्स भी खूब बड़ी तादाद में जुटे हुए हैं, मुसलमान भी जुटे हुए हैं, सिक्ख भी जुटे हुए हैं। हैं ना? हाँ। तो सबको अड्डा मिला हुआ है। कोई भी होवे। मुसलमान होवे, फलाना होवे, टीरा होवे। कोई भी आकरके यहाँ रहे। क्यों? मातृ प्रधान देश है ना। तो माता की गोद में सब; सबने अपना मनमाना राज किया, मनमाना राज्य किया। हँ? खून की नदियां बहाईं या नहीं बहाईं? बहाईं। हाँ। तो ये सब करना चाहिए। हँ? सिविल वार कहती है, आपस में लड़ाई-झगड़ा जरूर होना चाहिए क्योंकि यहाँ तो सबको अड्डा देते ही हैं ना। मुसलमान होवें, फलाना होवें। कोई को मना किसी को भी नहीं है।
 
तो देखो, यहाँ सभी जाते हैं। हँ? कोई भी ऐसे नहीं यहाँ होते हैं कि तुम जाओ, जैसे सीलोन वाले ने बोल दिया, हँ, ये तमिलियन यहाँ से जाओ। हाँ। तुम जाओ अपने घर। सब जाओ। यहाँ से रवाना हो जाओ। अब देखो, वो जकार्ता में वो है ना वहाँ इंडोनेशिया से, बोले जाओ। तुम सब अपने-अपने घर में जाओ। बर्मा से भी अपने घर में जाओ। तो देखो ऐसे-ऐसे करते रहते हैं। तो जब लड़ाई लगेगी तो फिर लड़ पड़ेंगे आपस में ही। सो तो तुम बच्चों ने देखी भी है, समझा भी है। अभी समझ भी गए हो ना कि ये यवन हैं मुसलमान। और ये हिंदुओं की लड़ाई लगी थी। ये पार्टीशन में, हँ, पार्टीशन से पहले लड़ाई थी थोड़ेही? फिर? फिर लड़ाई हुई। यहाँ था क्या? यहाँ तो मुसलमानों का ही राज्य था। था भले। जब लड़ाई चलती है पीछे तो वो भी खतम हो गए। मुसलमानों का राज्य भी खतम हो गया ना। खतम हो गया। हँ? फिर भी तो देखो मुसलमानों का भी राज्य रह गया ना कुछ भी। रहा? ऐसे तो नहीं रहा कि मुसलमानों का राज्य नहीं रहा तो मुसलमान नहीं रहे। मुसलमान रहे ना। सभी मुसलमानों का। देखो सबसे पहले ते पहले नंबर में तो निजाम का राज्य रहा कि नहीं रहा? हाँ। ये भारत में सबसे जास्ती साहूकारों के साहूकार निजाम मुसलमान। क्योंकि उनके पास पैसे बहुत रह गए। तो वो भी तो रह गए ना इसमें। सब हिंदुस्तान में रह गए। तो रह गए तो पिछाड़ी में तो नहीं होंगे। पिछाड़ी में तो, हँ, भारत में से क्या होगा फिर? भारतवासी ही रहेंगे कि ये जो बाहर से आए हैं, राज्य किया, वो रहेंगे? पिछाड़ी में तो मार-पीट कर-करके फिर कौन रहेंगे? अरे, ये मुसलमान रहेंगे? नहीं। फिर तो बाकि जाकरके देवता ही रहेंगे। कहाँ? भारत में। 
 
ये समझा तो है ना। इस सारे चक्कर को तुम बच्चों ने समझ तो लिया ना। सृष्टि के आदि, मध्य, अंत को तो बहुत जाना हुआ भी है। जैसे बॉम्बे में महाराष्ट्रियन कहते हैं। हँ? महाराष्ट्र में हमारा राज्य होवे। गुजराती कहेंगे गुजरात में हमारा राज्य होवे। तो लड़ पड़ते हैं एक-दो में। क्योंकि बच्चे बहुत हो गए ना। तो अभी बाबा आए हैं सबका बैठकरके फैसला करने। क्या फैसला कर देते हैं? हँ? क्या फैसला कर देते हैं? चलो, लड़ो, मरो, खतम हो जाओ। ये फैसला हुआ? पीछे बाकि आकरके देवी-देवता रहेंगे। जो तुम देवी-देवता बनने का पुरुषार्थ कर रहे हो। सो भी तुम जानते हो कि हम पुरुषार्थ कर रहे हैं। हँ? किस बात का? मनुष्य से देवता बनने का। कहते भी हैं ना मनुष्य से देवता किये करत न लागी वार।
 
तो वो माला बनेगी। हँ? राजाई में रहेंगे तो। लेकिन पहले माला बनेगी या नहीं बनेगी? माला माने? हँ? जो राजा बनने वाले हैं या राजघराने में आने वाले हैं, हँ, या नंबर वन माला है, नंबर टू माला है उनका माला रूपी संगठन बनेगा या नहीं बनेगा? बनेगा। आठ की माला बनेगी। हँ? 108 की माला बनेगी। कब बनेगी? हँ? कब बनेगी? अरे, कुछ बताया कि नहीं? बनेगी, ऐसे करके छोड़ दिया क्या? हाँ। 28 में 8 की माला बन जाएगी? कि 108 की बन जाएगी? अच्छा? बोला - ये तो है ना बच्चे। बच्चों को तो ये समझाय दिया है कि ये जो, हँ, भारतवासी खास माला सिमरते हैं, सिमरते हैं ना? ऐसे तो सभी धरमवाले माला तो सिमरते हैं ना। उनकी अपनी-अपनी माला होती है ना। हां। तो दूसरा कोई थोड़ेही जानते हैं कि ये माला क्यों सिमरी जाती है सिवाय तुम बच्चों के। क्यों सिमरन करते हैं? सिमरन करना माने? स्मरण करना, याद करना। एक-एक मणके को, हँ, बुद्धि रूपी हाथ में लेके याद करते जाते हैं। तो भक्तिमार्ग में तुमको मालूम, मालूम पड़ा है कि ये माला किसकी बनी हुई है? हँ? किसकी बनी हुई है? जो राजयोग सीखकरके राजाई पाते हैं, नंबरावार पुरुषार्थ अनुसार उनकी माला बनी हुई है। दुनिया में तो कोई भी ऐसा मनुष्य नहीं है जो तुमको ये बात बताय देवे कि माला किसकी बनी हुई है? और हम इस माला को क्यों सिमरते हैं? माला के मणकों को क्यों स्मरण करते हैं? उन्हें थोड़ेही मालूम है कि ये माला के गोल-गोल मणके, गुरवे ये कोई आत्मा की यादगार हैं? और वो भी नबंरवार हैं। कोई ऊँचे, कोई नीचे, कोई दाएं के, कोई बाएं के, कोई मध्यम। बाकि इन बातों को एक भी मनुष्य नहीं जानते। (क्रमशः)
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