शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2806, दिनांक 01.03.2019
रात्रि क्लास 13.11.1967
VCD-2806-extracts-Hindi
समय- 00.01-15.25
आज का रात्रि क्लास है – 13.11.1967. पूछने के पहले जो देही अभिमानी होकरके नहीं बैठे थे वो हाथ उठावें। देही माने देह को धारण करने वाली आत्मा। माना जो आत्मा की स्थिति में नहीं बैठे थे वो हाथ उठावें। बैठे थे। नहीं बैठे थे? (किसी ने कुछ कहा।) एक ही है? अच्छा? बाकि सब ज्योतिबिन्दु आत्मा की याद में बैठे थे? हँ? एक ने और मना किया। सिर्फ आज की बात नहीं पूछ रहे। बैठे थे। माना आज बैठे हो या पहले कभी बैठे हों। वो ज्योतिबिन्दु आत्मा की याद में बैठे थे? पूछा। ये पक्का निश्चय हुआ कि हम देह नहीं हैं? हँ? हम देह को चलाने वाली ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं। हँ?
और वो आत्मा की यादगार भारत में खास कन्याएं-माताएं आज भी लगाती हैं बिन्दी भृकुटि के मध्य में। लगाती हैं ना। हां। ऐसे तो कोई-कोई भाई लोग भी लगाते हैं। हिस्ट्री में तो ये प्रसिद्ध है – जब राजाएं या उनकी सेना, हँ, या सेना के जो भाती होते थे उनके परिवार वाले उनको युद्ध में भेजते थे तो टीका लगाते थे ना। हाँ। कहाँ? नाक के ऊपर? नहीं, भृकुटि के मध्य में टीका लगाते थे ना। हाँ। कि भई आत्मिक स्थिति में होकरके युद्ध करना। हं? हाँ। कहाँ की यादगार? ये पुरुषोत्तम संगमयुग की यादगार है जब बाप ने आकर ये बात बताई कि चाहे मन का युद्ध हो, चाहे तन का युद्ध हो, तन की इन्द्रियों का युद्ध हो, अगर युद्ध करना पड़े तो कौनसी स्थिति में रहना है? हँ? ज्योति बिन्दु आत्मा की स्थिति को चैक करना है कि ज्योति बिन्दु आत्मा याद है। हँ? कैसे याद किया जाता है? हँ? किसी को याद किया जाता है तो पहले उसका रूप याद आता है ना। तो वो स्टार, वो ज्योतिबिन्दु, वो किरण, हँ, क्योंकि सूर्य का ज्ञान है ना। तो सूर्य की किरण होगी ना। तो ये है तो चैतन्य ज्ञान सूर्य। बताया – वो उसकी जो ये किरणें हैं आत्मा रूपी बच्चे, हाँ, वो अपन को देखें कि वो किरण भृकुटि के मध्य में याद रहती है?
ये एक-दो को देखकरके हाथ उठाय रहे हैं। क्या? कोई तो उठा ही नहीं रहे हैं अभी तक। बताया – इससे अगर अच्छा ऐसे होता जब कोई भी क्लास कराते हैं; क्या? ऐसे नहीं बाबा क्लास कराते हैं। नहीं। कोई भी क्लास कराते हैं तो वो पहले देही अभिमानी के लिए कहकरके बैठें। क्या? क्लास शुरु होने से पहले पूछें कि आत्माभिमानी होकर बैठे हो? स्टार की, ज्योतिबिन्दु की भृकुटि के मध्य में याद है? हँ? कि भई देही अभिमानी होकरके बैठो। आत्मा अभिमानी होकर बैठो। फिर जब क्लास कराने वाला गद्दी से उतरे, हँ, तख्त से नीचे उतरे तभी भी जरूर कहना चाहिए, याद दिलाना चाहिए कि आत्मा अभिमानी स्थिति में बैठे हो? देह अभिमान में तो नहीं बैठे हो? या फिर दीदी बैठे। तभी दीदी पूछ पड़े। तो बताओ कि देही अभिमानी होकरके बैठे हो? बाबा दीदी किसको कहते थे? मनमोहिनी दीदी को दीदी कहते थे। हाँ। तो थोड़ी प्रैक्टिस अच्छी हो जाएगी। अगर जो टीचर है क्लास कराने वाला, गद्दी पे बैठने वाला वो बार-बार याद दिलाएगा स्टूडेन्ट्स को कि आत्मिक स्थिति में बैठे हो? हँ? तो आत्मा को ही तो ज्ञान सुनाना है। शिव बाप किसको ज्ञान सुनाने आए? आत्मा को या देह को? या देह अभिमानी को? नहीं।
तो ऐसे बार-बार पूछने से थोड़ी प्रैक्टिस अच्छी होती जाएगी। क्योंकि मूल बात है ही इसके ऊपर। किसके ऊपर? अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा समझ करके बैठो। और सिर्फ बैठने की भी बात नहीं है। चलते-फिरते, उठते, कर्मेन्द्रियों से कुछ भी कर्म करते आत्मिक स्थिति में हैं? हँ? चैक करो। क्योंकि जब देही अभिमानी होकरके बैठते हैं तो ये बात ज़रूर है कि आत्मा की याद आएगी तो साथ में फिर क्या होगा? हँ? हाँ। जो आत्मा का बाप है वो ज़रूर, ज़रूर याद आएगा क्योंकि आत्मा भी ज्योति बिन्दु और बाप भी ज्योतिबिन्दु। आत्मा अति सूक्ष्म, तो बाप भी अति सूक्ष्म। तो ऐसे तो नहीं समझते कि आत्मा को याद किया, स्टार को याद किया भृकुटि के मध्य में तो बाप याद नहीं आया? हँ? अरे, ये तो बुद्धि में बैठा है ना कि ज्यादा फायदा जो है वो आत्मिक स्थिति में स्थिर रहने में है, आत्मा को याद करने में ज्यादा फायदा है कि आत्मा समझकरके साथ-साथ बाप को भी याद करने में ज्यादा फायदा है? हँ? बाप को याद करेंगे तो बहुत फायदा है। कैसे? आत्मिक स्थिति में रहेंगे, कोई भी कार्य करेंगे, भ्रष्ट इन्द्रियों से, श्रेष्ठ इन्द्रियों से कर्म करेंगे, तो पाप कर्म नहीं बनेगा उस समय। आत्मिक स्थिति में रहेंगे तो पाप कर्म बनेगा? नहीं बनेगा। लेकिन पिछले जन्म के पाप और इस जनम के पाप भस्म होंगे? हँ? भस्म होंगे? आत्मिक स्थिति में सिर्फ रहेंगे, बाप को याद नहीं करेंगे तो? हाँ, आत्मिक स्थिति में रहें, अपनी भृकुटि में ज्योतिबिन्दु आत्मा को याद करें और फिर आत्मा को याद करने के बाद फिर आत्मा का जो बाप है सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु वो भी याद आए या ना आए? हँ? हाँ।
वो ब्रह्माकुमारियां कुमार क्या कहते हैं? कि हाँ, हम तो याद करते हैं। अपनी आत्मा ज्योतिबिन्दु को भी याद करते और अपने बाप को भी याद करते। तो सही बोलती हैं क्या? क्यों? क्यों नहीं सही बोलती? हँ? झूठ कैसे बोलती? हाँ, क्योंकि वो उन्हें पता ही नहीं है कि वो ज्योतिबिन्दु सुप्रीम सोल जो सब आत्माओं का बाप है वो है कहाँ? हँ? अगर आत्मा सो परमात्मा, तो तो झूठी बात हुई, सच्ची बात हुई? हँ? चींटी, हाथी, हँ, और ये कीड़े-मकोड़े आत्माएं हैं ना। तो फिर वो सब परमात्मा हो गए? हँ? ऐसे कहेंगे आत्मा सो परमात्मा? नहीं। ये तो फिर सर्वव्यापी हो गया। तो ये तो झूठी बात है। तो सच्ची बात क्या हुई? हँ? क्या सच्ची बात हुई? हँ? अरे, कुछ सच्ची बात भी बताओ। हँ? अरे? (किसी ने कुछ कहा।) साकार में निराकार आया। ठीक है हमारी आत्मा हमारे साकार शरीर में है ना। क्या? और आत्मा निराकार है। हमारे साकार शरीर है कि नहीं? और भृकुटि के मध्य में निराकार आत्मा बैठी है ना। तो साकार में निराकार आया है तो हम उसी को तो याद कर रहे हैं। झूठी बात है? अच्छा? कैसे झूठी बात? (किसी ने कुछ कहा।) आत्मा को परमात्मा एक ही है। आत्मा को परमात्मा एक ही है? शिव बाप, क्या लिखा? शिव बाप साकार मुकर्रर रथ में आया है। हाँ।
ये भी तो बोला है। क्या? मुरली में ये नहीं बोला बीस बार? क्या? कि दो प्रकार के रथ हैं। एक मुकर्रर रथ और दूसरा टेम्परेरी। तो मुकर्रर रथ तो एक ही है जो सदाकाल मुकर्रर है। हँ? आदि से लेकरके जबसे ये ओम मंडली शुरू हुई या सिंध, हैदराबाद में जो भी संगठन चलता था, ज्ञान का क्लास होता था तबसे लेकरके। कबसे लेकरके? जबसे ये परिचय मिला। क्या परिचय मिला? ब्रह्मा बाबा को कि तुम्हारा पार्ट, साक्षात्कार जो तुम्हें हुए हैं, उनके आधार पर तुम्हारा पार्ट ही है इस जनम में ब्रह्मा के रूप में, सफेदफोश के रूप में और अगले जनम में कृष्ण के रूप में। और? और क्या? और दुनिया का विनाश सामने खड़ा है। एटम बम्ब इसीलिए बने हैं। क्या? ओम मंडली जब शुरू हुई थी उससे पहले एटम बमों के नाम, नाम-निशान था क्या? नहीं था। ये तो बाप है दोनों काम कराने के लिए आए हैं ना। पुरानी दुनिया, पुराने धर्म, पुरानी मान्यताएं, परंपराएं, सब खलास कर देगा। हँ? और नई दुनिया, नई मान्यताएं शुरू कर देगा।
तो उसके सब लिए वो बाप सुप्रीम सोल आत्माओं का बाप कहते हैं स्पष्ट बताय देते कि मैं मुकर्रर रथ में तो मुकर्रर रूप से सदाकाल रहता हूँ। कायमी रहता हूँ। क्या? कायमी रहता हूँ माने? सदाकाल मुकर्रर रथ में तो रहता ही हूँ। लेकिन बीच-बीच में ज़रूरत पड़े तो फिर मुकर्रर नहीं तो जो टेम्परेरी रथ है ना उनमें भी आता हूँ। इसलिए तो शास्त्रों में दिखाया है कि ब्रह्मा के चार मुख ज्यादा दिखाते हैं। पांचवां मुख दिखाते ही नहीं हैं। मानते हैं कि ब्रह्मा पांच मुख वाला भी था, पंचानन भी कहते हैं। तो ये फाउण्डेशन कहाँ पड़ा? हँ? ये जो मान्यता चल रही है कि ब्रह्मा के चार मुख; और जब भी चित्रों में दिखाएंगे चार ही मुख दिखाएंगे। हँ? कोई सीरियल बनाएंगे, नाटक बनाएंगे तो चार मुखों वाला ब्रह्मा दिखाएंगे। पांच मुखों वाला दिखाते हैं? दिखाते ही नहीं। तो ये शूटिंग कहाँ होती है? हाँ। यहाँ ब्राह्मणों की दुनिया में तुम बच्चे शूटिंग करते हो। क्या? क्या शूटिंग करते? कि मुकर्रर रथधारी को पक्का-पक्का बाप के रूप में पहचान नहीं पाते कि मेरा सौ परसेन्ट यही बाप है। और मैं अब इस बाप को कभी भूलने वाला नहीं हूँ। अरे? बाप की एक बार पहचान हो जाए बच्चे को; मां ही तो पहचान देती है ना। तो बच्चा कभी ये कहेगा ये मेरा बाप नहीं है या दूसरा भी हो सकता है? हँ? बाप है तो बाप है। नहीं है तो नहीं है। तो देखो ये घड़ी-घड़ी पहले याद दिलाने की बात है कि पहले तो आत्माभिमानी होकरके बैठो। फिर दूसरी बात? फिर दूसरी बात ये है कि बाप को भी याद करो।
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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
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