[6:21 PM, 10/1/2020] PBK. JayasreeMatha Narsingi Hyd: शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2804, दिनांक 27.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
VCD-2804-extracts-Hindi
समय- 00.01-16.00
प्रातः क्लास चल रहा था – 13.11.1967. सोमवार को छठे पेज के मध्यांत में बात चल रही थी – शंकर को काला गला दिखाय दिया है, नीला। अरे, वो गला तो दूसरे का लोन लिया हुआ है ना। शिव बाप, सदा शिव जो निराकार है, हँ, जिसको अपना शरीर ही नहीं है, तो गला कहाँ से आया? तो गला लोन लेता है। लिया है ना। तो उस गले से तो बैठकरके बोलते ये हैं ना। उस गले से नहीं, उन गले से। माना कोई एक का गला नहीं लेते हैं। हँ? कितनों का गला लेते हैं? दिखाते हैं भक्तिमार्ग में चतुर्मुखी ब्रह्मा, पंचमुखी ब्रह्मा। तो 4-5 व्यक्तित्व हुए ना। हाँ। उनसे बैठ करके गला लेते हैं और फिर बोलते हैं। कौन? शिव सुप्रीम सोल सदा शिव। उनको कोई अपना गला थोड़ेही है जो काला हो जाएगा वरी। हँ? अरे, इनका भी काला कैसे होगा? इनका माने किनका? जो ब्रह्मा नामधारी चतुर्मुखी ब्रह्मा है, चित्रों में भी जो अर्जुन का रथ दिखाया है उसमें सफेद घोड़े दिखाए हैं या काले घोड़े दिखाए हैं? हँ? सफेद घोड़े दिखाए हैं ना। तो जब हैं ही सफेद घोड़े तो उनका गला कहाँ से काला हो गया? गला भी तो सफेद ही हुआ ना। हाँ।
तो ये सभी दंत कथाएं हैं ढ़ेर सारी शास्त्रों में। ये जो हड्डी-हड्डी कहते हैं ना कि भई दधीची ऋषि के मुआफिक ये हड्डी देनी है। हँ? कौन हुआ दधीची ऋषि? कोई ने तो अपनी हड्डियां दी होंगी ना, गलाई होंगी ना, हँ, दूसरों को सुख देने के लिए। कहाँ शूटिंग हुई? हँ? हाँ, अरे, ब्राह्मणों की संगमयुगी दुनिया में ही कोई चतुर, चार मुखों वाले ब्रह्मा में से कोई मुख्य ब्रह्मा है जिसने अपनी गोद में ले-लेकरके अपनी हड्डियां गलाय दीं। ऐसे थोडेही कहेंगे कि इन्द्रियजीत हो गया, इन्द्रिय पर जीत पा ली, डिस्चार्ज होता ही नहीं। ऐसे कहेंगे? कह ही नहीं सकते। अरे, जो ऐसा पक्का योगी होगा जिसने अपनी इन्द्रिय को जीत लिया, खास करके कामेन्द्रिय को, तो उसका हार्टफेल हो सकता है? उसका हार्टफेल तो हो ही नहीं सकता। हां। इसलिए बाप ने मुरली में ही बताय दिया योगी का कभी हार्टफेल नहीं हो सकता। तो ये दधीची ऋषि की शूटिंग हो गई, रिहर्सल कर दी। क्या? अपनी हड्डियां भी दान में दे दीं। किसलिए दे दीं? हँ? अपने फायदे के लिए कि दूसरे के फायदे के लिए? हाँ, अपने फायदे के लिए, दूसरे को, दूसरों को हड्डियां भी गलाय दीं। क्या फायदा? अरे, जो दधीची ऋषि की आत्मा है हड्डी-हड्डी अर्पण करती है ईश्वरीय सेवा में दूसरों को कल्याण करने के लिए, दूसरों को सुख देने के लिए वो ही आत्मा तो स्वरग का इन्द्र बनती है स्वर्ग का राजा कि कोई दूसरा बनता है? वो ही बनती है। तो स्वर्ग का जो मुख्य शस्त्र है वो कौनसा हुआ? हाँ, कहते हैं वज्र हुआ। अरे, वो वज्र काहे का बना? हाँ, संगमयुग में जो हड्डियाँ गलायीं दधीची ऋषि ने तो वो दधीची ऋषि जाके इन्द्र बनते हैं, उनको अपनी हड्डियों का अस्त्र मिल जाता है। कहाँ? यहीं संगमयुग में। क्या करते हैं? वो सतयुग में नहीं कोई दैत्य होते हैं, राक्षस होते हैं, जिनका संघार करना है। यहाँ संगमयुग में जो राक्षसी आत्माएं हैं उऩका संघार करते हैं।
तो, तो ये बात बताई है कि दधीची ऋषि के मुआफिक हड्डी-हड्डी देंगे, हँ, शरीर की हड्डियां भी अर्पण करेंगे दूसरों के कल्याण के लिए, दूसरों को सुख देने के लिए तो उसका रिजल्ट क्या होगा? अच्छा ही रिजल्ट होगा, सुख ही मिलेगा या दुख की दुनिया में जाएंगे? सुख ही मिलेगा। तो अब हड्डी-हड्डी क्या देने का है? हँ? वो भी तो बुद्धि में आना चाहिए। हँ? बाप तो कहते हैं बच्चे बड़े तंदुरुस्त रहो। बाप कहते हैं कि अपनी हड्डियाँ गला दो और, और टीबी के मरीज हो जाओ? ऐसे कहते हैं? हँ? या हार्टपेल हो जाओ? नहीं। बाप तो कहते हैं बच्चों को बड़े तंदुरुस्त होकर रहो। बिल्कुल अच्छी तरह से रहो। ऐसे अच्छी तरह से रहो कि कोई कितना भी, कैसा भी आघात करे, तुम्हारे ऊपर कोई न मन के ऊपर, न तन के ऊपर, कोई असर न हो। क्या? असर हो? नहीं। ऐसे तंदुरुस्त रहो। तन से, मन से।
तो जितनी तुम बच्चों को बाप की याद रहेगी इतनी खुशी बहुत रहेगी। किसकी याद? हँ? सिर्फ अपनी आत्मा की याद या साथ में बाप की भी याद? हाँ, बाप; बाप के लिए क्या टाइटल देते हैं? सत, चित, आनन्द। कभी आनन्द से नीचे उतरती है वो आत्मा? नहीं। अरे, इस पतित दुनिया में आती है, पतित तन में आती है, फिर भी? फिर भी आनन्द मनाती है, आनन्द में रहती है या कभी दुखी होती है? हँ? सदा आनन्द। तो, तो उसका याद करेंगे उसकी तो खुशी रहेगी ना। कितनी खुशी रहेगी! बहुत खुशी। तो कहेंगे कि ऐसी खुशी जैसी तो कोई खुराक ही नहीं। कोई होती है इतनी खुशी? हँ? जो ज्ञान की खुशी है, हँ, जो योग की खुशी है, इससे बड़ी खुराक तो और कोई आत्मा को हो ही नहीं सकती। तो तुम बच्चों को कितनी खुराक मिलती है! हँ? कौनसे बच्चों को? हँ? देहधारी बच्चों को? अरे, देह के बच्चों से तो बात ही नहीं करते। किनसे बात करते हैं? हाँ, जो आत्मिक स्थिति में रहते हैं, जितना भी रहते हैं। कोई कम कोई ज्यादा। तो उन आत्मिक स्थिति में रहने वाले बच्चों से कहते हैं कि तुमको कितनी खुराक मिलती है! तुमको माने किसको? देह को थोड़ेही? किसको? आत्मा को खुराक मिलती है। कितनी खुशी मिलती, मिलती है! हम अभी ये बात जान गए हैं।
हाँ, ये, ये बाप समझाते हैं। क्या? समझाने वाला कौन है? हँ? ये, ये; ये, ये कहके किसकी तरफ इशारा किया? हाँ, कोई आत्मा इमर्ज की कि ये, ये। बाप समझाते हैं। क्यों? शिव सुप्रीम सोल नहीं समझाते? अरे, समझाते तो हैं लेकिन मनुष्य सृष्टि के बाप में ही प्रवेश करके समझाएंगे ना। तो वो तो दोनों एक ही हो गए। ये बाप समझाते हैं जबकि भगवान है। हँ? हाँ। भगवान से तो हमको वर्सा, स्वरग का वर्सा मिलना चाहिए। हँ? भगवान है तो कहाँ का वर्सा मिलना चाहिए? हँ? स्वरग का वर्सा। स्व माने? स्व माने आत्मा। ग माने गया। आत्मा जब आत्मिक स्थिति में गई तो स्वर्ग का सुख भोगती है। और वरी वो भगवान सबका ही है। ऐसे नहीं कि देवताओं का है, दैत्यों का, राक्षसों का नहीं है, कीड़े-मकोड़ों का नहीं है। नहीं। भगवान तो सबका है। तो हम सबको तो कुछ वर्सा मिलना चाहिए ना। हाँ। कुछ। कुछ क्यों? सब कुछ क्यों नहीं? अरे, जैसा संग करेंगे वैसा प्राप्ति करेंगे। ऊँच ते ऊँच का संग करेंगे तो ऊँच ते ऊँच जास्ती से जास्ती प्राप्ति।
तो वर्सा भगवान का है। किसका वर्सा है? हँ? धनवान का है? अरे, वो टाटा-बिड़ला वाले जो भगवान कहे जाते हैं भारत में, हँ, ये प्रजातंत्र वाले क्या समझते हैं हमारा भगवान कौन है? जो बड़ी-बड़ी ऊँची-ऊँची गद्दियों पे बैठते हैं, हँ, मंत्री, महामंत्री बन करके वो क्या समझते हैं हमारा भगवान कौन है? जो पैसा देगा इलेक्शन लड़ने के लिए वो हमारा भगवान है। हँ? है ना? नोटों से वोटों की राजाई चलती है ना। हाँ। तो उनका नाम शास्त्रों में दिया है धृतराष्ट्र। धृत माने धारण कर लिया। और क्या? राष्ट्र माने राष्ट्र की धन-संपत्ति सारी अपनी बगल में दबा के रख ली गरीबों की खून चूस-चूस के। तो उनको क्या कहेंगे? धृतराष्ट्र नहीं कहेंगे? धृतराष्ट्र। हाँ। तो वो कोई उनके भगवान हैं। कौन? धृतराष्ट्र। और तुम बच्चों का भगवान कौन है? तुम बच्चों का तो भगवान वो धनवान नहीं है स्थूल धन का। काहे का धनवान है? हँ? ईश्वरीय ज्ञान धन का धनवान है। अकूट ज्ञान का धनवान। और वो अकूट ज्ञान का धनवान भी कोई ऐसे नहीं कि बिन्दी है, निराकार है, हवा है। नहीं। वो भी साकार मनुष्य तन में मुकर्रर रथ में प्रवेश करके, हाँ, क्या बनता है? भगवान। जो सारी दुनिया उस भगवान को निराकार रूप में याद करती है कि साकार रूप में याद करती है? सारी दुनिया में जो दूसरे धर्म की आत्माएं हैं वो निराकार रूप में याद करती हैं। और जो तुम बच्चे हो, हँ, देव आत्माएं वो साकार और निराकार, दोनों रूपधारी जो है उसको भगवान समझते हो। हँ?
तो वो भगवान का वर्सा है। हाँ, सृष्टि के, विश्व के रचने वाला। हँ? या स्वरग का रचने वाला। पर वो स्वरग का वर्सा सबको कैस देंगे? हँ? कैसे देंगे? हँ? नाम ही है स्वर्ग। जो अपनी आत्मा की ऐसे स्टेज बनाए प्रैक्टिस करके कि मैं ज्योतिबिन्दु निराकार आत्मा हूँ, ज्योति का बिन्दु हूँ, हँ, ऐसी प्रैक्टिस करकरके पक्का कर दें। क्या पक्का कर दें? कि लगातार क्या याद आए? देह न याद आए। ज्योतिबिन्दु आत्मा याद आए। तो वो स्वर्गवासी बन जाते हैं। तो बताओ वो जो पुरुषार्थ करेंगे आत्मिक स्थिति में रहने का वो ही स्वरग का वर्सा लेंगे कि सबको दे देंगे? हँ? कीड़े-मकोड़ों को, पशु-पक्षियों को दे देंगे? अरे, उनको तो मन-बुद्धि ही नहीं होती। वो तो ज्ञान को, ईश्वर के ज्ञान को वैल्यू देते ही नहीं। वो तो समझ ही नहीं सकते। हाँ, इस मनुष्य सृष्टि में भी जो मनुष्य हिंसक नहीं हैं, देवात्माएं हैं, सुख देने वाले हैं, वो उनको वो वर्सा मिलता है। बाकि जो हिंसक हैं, तन से, मन से, धन से, समय से, संपर्क से, संबंधियों की ताकत लगाके, दुख ही दुख देते हैं, उनको वर्सा मिलेगा स्वर्ग का? मिलेगा? कैसे मिल सकता है?
तो बताया – तो जिनको हक है लेने का, हँ, जिन्होंने पुरुषार्थ किया है, जिन्होंने पुरुषार्थ किया उनको हक है। जरूर हक है। परन्तु सबको कैसे दे सकते हैं? जो पुरुषार्थ ही नहीं करते, देह के अर्थ ही सब कुछ करते रहते हैं। हँ? देहार्थ या पुरुष माने? पुरु माने? पुरुष माने आत्मा। आत्मा के अर्थ। तो वो भी तो हिसाब चाहिए ना बच्चे। क्या हिसाब? कि देह के लिए जब भगवान बाप आते हैं, ज्ञान का अखूट भंडारी आके अखूट भंडार बांटते हैं, तो वो, वो कितना धारण किया? हँ? धारण किया, ज्यादा टाइम उसमें लगाया, ज्यादा तन, मन, धन उसमें अर्पण किया या अपने रथ में स्वारथ में लगाया? वो हिसाब नहीं चाहिए? वो हिसाब चाहिए ना बच्चे। 13.11.1967 की प्रातः क्लास का सातवां पेज। तो वो हिसाब बाप बैठकरके समझाते हैं। क्या कहा? कौन समझाते हैं? हँ? कौन समझाते हैं? बाप बैठकरके। कौनसा बाप? जन्म-जन्मान्तर के लौकिक बाप या धरमपिताओं रूपी बाप या धरमपिताओं का भी बाप आदम समझाते हैं? हँ? आदम भी तब समझाते हैं जब आदम के उस मुकर्रर रथ में शिव बाप प्रवेश करते हैं तो कहेंगे कि हाँ, वो दो बेहद के बाप हैं – एक आत्माओं का बाप, निराकार आत्माओं का बाप निराकार बाप। और साकार मनुष्य सृष्टि का बाप आदम, एडम, आदि देव जिसे कहा जाता है। तो वो दोनों एक ही हो गए ना। जब एक ही शरीर में दोनों प्रवेश हैं। तो वो हिसाब बैठ करके दो बाप समझाते हैं।
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[7:27 PM, 10/1/2020] +91 70216 24279: हिन्दी व्याख्या
वार्तालाप प्वाइंट वार्ता न. 303
स्टूडेन्ट:- बाबा, अव्वल नम्बर स्वर्ग कौन सा है?
बाबा:- अव्वल नम्बर स्वर्ग है, संगमयुगी स्वर्ग ।
स्टूडेन्टः- 2018 से आगे क्या?
बाबा:- 2018 से ही तो शुरू होगा ।
स्टूडेन्टः- 2036 तक?
बाबा:- हाँ, जी। अव्वल नम्बर जो स्वर्ग है वो 18 साल का ही तो होगा। 36 के बाद उतरती कला।
समय-9.56
आत्मा का बाप एक ही परमपिता परमात्मा है। आत्मा का नाम कभी बदलता नहीं है। शरीर का नाम बदलता है। आत्मा भिन्न-2 शरीर लेकर के पार्ट बजाती है अर्थात पुर्नजन्म लेती है। आखरीन कितने जन्म मिलते हैं ? वो भी बाप ही आकर के समझाते हैं बच्चे तुम अपने जन्मों को नहीं जानते हो और बाप तो आते भारत में है। उनका नाम शिव है। समझते भी है शिव परमात्मा है, शिव जंयती वा शिव रात्रि भी मनाते हैं। हे निराकार ! जैसे आत्मा निराकार है वैसे परमात्मा बाप भी निराकार है। वो निराकार भी साकार में आते हैं पार्ट बजाने के लिए। अब निराकार शिव तो साकार बिगर पार्ट नहीं बजाए सकता। मनुष्य इन बातों को कुछ भी समझते नहीं हैं। नयनहीन है। ये शरीर के दो नेत्र तो सबको हैं। तीसरा ज्ञान का नेत्र आत्मा का नहीं है जिसको दिव्यचक्षु कहा जाता है। तो पुकारते हैं नयनहीन को राह दिखाओ अर्थात आत्मा को दिव्यचक्षु चाहिए। आत्मा अपने बाप को भूल गई है इसलिए पुकारते हैं नयनहीन को राह बताओ। कहाँ की राह बताओ ? शांतिधाम और सुखधाम की राह बताओ। सर्व का सद्गति दाता, सद्गुरू तो एक ही है। जो शांतिधाम सुखधाम का रास्ता बताते हैं। मनुष्य कोई मनुष्य का गुरू नहीं बन सकते। सद्गति दे नहीं सकते हंै। ना खुद सद्गति पाते हैं और ना औरों को देते हैं। एक बाप ही जो सबको सदगति देते हैं उस अल्फ बाप को ही याद करना है।
Vcd- 42
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