अपन को शरीर से न्यारा समझना है। इसको ही जीते जी मरना कहा जाता है। तुम इस शरीर में जन्म-जन्मान्तर रहते आए हो तो तुमको ये हेर पड़ जाती है। मैं तो इसमें आता ही हूँ टेम्पररी । तो मर कर चलना अर्थात अपन को आत्मा समझकर चलने से कोई भी देहधारी से ममत्व नहीं रहेगा। सभी सेन्टर्स पर अकसर कर के किसी- ना-किसी का किसमें मोह हो जाता है। सबका नहीं हो जाता लेकिन किसी-ना-किसी का मोह सभी सेन्टर्स पर हो जाता है। फिर उसका रिजल्ट क्या होता है ? बस उसको देखे बिगर रह नहीं सकेंगे। ये देहधारी की याद एकदम नीचे गिरा देगी। बड़ी ऊँची मंजिल है। खाते- पीते जैसे कि मैं इस शरीर में हूँ ही नहीं। वो अवस्था पक्की करनी है। तब ही आठ रत्न की माला में जा सकते हैं। मेहनत बिगर थोडे़ ही ऊँच पद मिल सकता है। जीते जी देखते हुए समझो मैं तो वहाँ का रहने वाला हूँ। जैसे बाबा इसमें टेम्पररी बैठा है, हम भी इस शरीर में टेम्पररी हूँ। हमको भी अभी फिर घर जाना है। घर भी प्यारा लगता है, राजाई भी प्यारी लगती है। जब तक देह का भान नहीं टूटा है तब तक मुक्ति कैसे पावे ? शरीर का भान एकदम छोड़ दो क्योंकि तुमको मेरे साथ जरूर चलना है।
Vcd- 803
वार्तालाप प्वाइंट वार्ता न. 326
स्टूडेन्ट - तप कर राज, राज कर नर का। तो क्या हम सेवा कर सकते हैं सभी को बताने के लिए कि जो आत्मा तप कर रही है वही आत्मा से सावधान रहना है कि वही आत्मा हमारी दुनिया को नर्क बनाने के लिए निमित्त बनी है?
बाबा - वो जब द्वैतवादी युग द्वापर/कलियुग की शूटिंग होती है तब की बात है। अद्वैतवादी युग की शूटिंग करने वाला तो प्यार में रहेगा। तपस्या में क्यों तपेगा? प्यार में रहना माना तपस्या आटोमेटिक होती है। तपस्या माने आत्मिक स्थिति। जितना ईश्वरीय सेवा में लगे रहेंगे उतना आटोमेटिक बाप हमको प्यार करेगा। बाप सर्विसएबुल बच्चों को याद करते हैं।तो बाप की याद की पावर उन बच्चों को मिलेगी और वो आटोमेटिक आत्मिक स्थिति में स्थित हो जाएँगे। उन्हें तपस्या महसूस ही नहीं होगी।
समय-53.27
[18:01, 10/18/2020] +91 6260 266 924: भारी संकट आने हैं, जब विनाश शुरू हो जायेगा फिर समझेंगे जरूर कहीं भगवान गुप्त वेश में है। कृष्ण अगर होता तो सारी दुनिया में ढिंढोरा पिट जाता। कृष्ण तो आ न सके। यह तो बाप को आना पड़ता है। अन्त तक बाप को ज्ञान सुनाना है। आते ही गुप्त रूप में हैं। कृष्ण तो हो न सके। निराकार बाप सभी का एक है। ज्ञान मुरली 10-8-2017
[18:03, 10/18/2020] +91 6260 266 924: बाप गरीब-निवाज़ है ना। गरीबों से ही मिलने आते हैं। साहूकार लोग तो नामीग्रामी मनुष्यों से ही मिलते हैं। इनको तो गरीब ही प्यारे लगते हैं। गरीबों पर ही तरस पड़ता है। तो बाप गरीबों पर तरस खाते हैं। ज्ञान की मुट्ठी भर देते हैं तो तुम साहूकार बनो। साहूकारों का ठहरना मुश्किल है। दरकार ही नहीं है इस ज्ञान मार्ग में। गवर्मेन्ट को तो धनवान लोग बहुत मदद करते हैं ना। नामीग्रामी हैं ना। मु 11-9-17
[18:40, 10/18/2020] +91 6260 266 924: गायन क्या है-- ज्ञान से सद्गति या योग से सद्गति?? योग से सद्गति होती है, लेकिन संपूर्ण गति सच्ची गति होती है या कुछ ना कुछ अपूर्ण सदगति होती है??अपूर्ण कहेगें।
जो भी देवताएं जन्म लेते हैं कृष्ण से लेकर आठवीं नारायण तक, उनकी संपूर्ण सद्गति कहें??नहीं*फिर कृष्ण की??वह तो 16 कला संपूर्ण होता है। उसकी भी संपूर्ण सद्गति नहीं कह सकते। क्योंकि वह कलातीत नहीं बनते।कलातीत तो एक ही सूर्य है। वह सूर्य कभी भी कलाओं के बंधन में नहीं बंधता। उस का नारा है-- स्वतंत्र रहो, स्वतंत्र रहने दो। कोई के बंधन में ना रहो। ना कोई को बंधन में बांधो।त्रिमूर्ति में कौन है बंधन काटने वाला?? उसको कहते-- देव देव महादेव। ब्रह्मा को नहीं कहेंगे, विष्णु को भी नहीं कहेंगे। शंकर को ही क्यों??क्योंकि वो एक ही आत्मा इस सृष्टि में ऐसी है, जो आप समान सभी बीज रूप आत्माओं को पैदा करती है। वृक्ष में सबसे पावरफुल बीज होता है।* जड़ें भी सड़ जाती हैं। जड़ों से जो तना निकलता है, वह भी सड़ जाता है। टहनियां फूल पत्ती डाल डाली सब सड़ जाते हैं।लेकिन मनुष्य सृष्टि के बीज अविनाशी है।Vcd 2635(9-9-18)1.09मि
[18:41, 10/18/2020] +91 6260 266 924: शिवलिंग किस रूप की यादगार हैं? साकारी है या निराकारी??
देहधारी उन्हें कहा जाता है जिनकी देह में बुद्धि धरी रहे, और देह से बुद्धि परे हो जाए तो निराकारी।
तो शिवलिंग जो यादगार है वह किस रूप की यादगार है?? वो साकार है या निराकार? लिंग तो बड़ा रूप है, साकारी होगा ना?
*निराकारी ही कहेंगे, क्योंकि बड़ा भल है, लेकिन हाथ, पाँव, आंख, नाक, कान का ध्यान नहीं है। इसीलिए निराकारी कहा जाता है।देहधारी नहीं कह सकते। लिंग भी निराकारी स्टेज और उसमें जो बिंदु आत्मा है, वह तो निराकार होती ही है। क्योंकि निराकार बाप को देह तो है ही नहीं। वो प्रवेश तो करते हैं, लेकिन देह में उनकी आसक्ति होती ही नहीं।
Vcd 2566(38min.)
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