18.07.88 प्रातः क्लास ओमशान्ति “अव्यक्त बापदादा” मधुबन {रिवाइज़}
निराकारी, आकारी और साकारी तीनो ही स्टेजेस को समान बनाया है? जितना साकारी स्वरूप में स्थित होना अनुभव करते हो उतना ही आकारी स्वरूप में अर्थात अपने सम्पूर्ण स्टेज में वा अनादी स्वरूप निराकारी स्टेज में स्थित होना सहज अनुभव होता है? साकारी स्वरूप आदि स्वरूप है, निराकारी अनादि स्वरूप है| तो आदि स्वरूप सहज लगता है वा अनादी स्वरूप में स्थित होना सहज लगता है| वह अविनाशी स्वरूप है और साकारी स्वरूप परिवर्तन होने वाला स्वरूप है| तो सहज कौन सा होना चाहिए? साकार अरूप की स्मृति स्वतः रहती है वा निराकारी स्वरूप की स्थिति स्वतः रहती है? वा स्मृति लानी है? मैं जो हूँ उसको स्मृति में लाने की क्या आवश्यकता है| अब तब भी स्मृति स्वरूप नहीं बने हो| क्या यह अंतिम स्टेज है| वा बहुत समय के अभ्यासी भी अन्त में इस स्टेज को प्राप्त कर पास विद आनर बन सकेंगे| वर्त्तमान समय पुरुषार्थियों के सामने यह संकल्प रहना कि अन्त में विजयी बनेंगे वा निर्विघ्न, विघ्न विनाशक बनेंगे, यह संकल्प हो रायल रूप के अलबेलापन की माया सम्पूर्ण बन्ने में विघ्न डालती है| यही अलबेलापन सफलातामूर्त, समान मूर्त बनाने नहीं देता| दुसरा संकल्प-विनाश की चादियों को जितनी करते हो ना| सोचते रहते हो क्या होगा, कैसे होगा| नहीं होगा- यह सीधा स्वरूप नहीं देते| तो यह है सीधा संशय का स्वरूप| इसलिए सीधा शब्द न बोल रायल शब्द बोलते कि क्या होगा, कैसे होगा| इस र्रूप से सोचते हो| जितना समय समीप आ रहा है उतना स्वयं को समीप बना रहे हो? विनाश किसलिए होगा, कीन्हों के लिए होगा, यह जानते हो? तीव्र पुरुषार्थियों वा सम्पूर्ण बन्ने वाली आत्माओं के लिए सम्पूर्ण श्रेष्ठ वा सतोप्रधान प्रकृति प्रालब्द भोगने के लिए विनाश होता है| तो विनाश की घड़ियाँ गिनती करनी चाहिए वा स्वयं को सम्पूर्ण सतो प्रधान बनाने की बाप समान क्वालिफिकेशन को बार-2 गिनती करना चाहिए| विनाश की घड़ियों का इन्तजार करने के बजाय स्वयं को अभी से सम्पन्न और समान बनाने के इन्तजार में रहना चाहिए| तो इन्तजार में ज्यादा रहते हो वा इंतजाम में ज्यादा रहते हो? प्राल्ब्द भोगने वाले ही इस इन्तजार में रहते हैं तो अन्य आत्मायें जो साधारण प्रालाब्द पाने वाली हैं उन्हों तक भी सूक्ष्म संकल्प पहुँचते हैं| रिजल्ट में मैजारिती आत्मायें यही शब्द बोलती कि जब विनाश होगा, देख लेंगे| जब प्रैक्टिकल प्रालाब्द देखेंगे तब हम भी पुरुषार्थ कर लेंगे| क्या होगा, कैसे होगा, यह किसको पता| यह वायब्रेशन निमित्त बनी हुई आत्माओं का ओरों प्रति भी कमजोर बनाने का वा भाग्यहीन बनाने का कारण बन जाता है| इस समय आप सबकी जगत माता और जगत पिता की मास्टर रचयिता की स्टेज है|तो रचयिता के हर संकल्प अतवा वृत्ति के वायब्रेशन रचना में आते हैं|इसलिए वर्तमान समय जो कर्म हम करेंगे हमुको देख सब करेंगे| सिर्फ यह अटेन्शन अनिं करना है लेकिन साथ-2 जो मैं संकल्प करूंगा, जैसी मेरी व्रत्ति होगी वैसे वायुमंडल में वा अन्य आत्माओं में वायब्रेशन फैलेगी| यह सलोगन यह स्मृति में रखना आवश्यक है| नहीं तो आप रचता की रचना कमजोर अर्थात कम पद पाने आली बन जायेगी| रचता की कमी रचना में भी स्पष्ट दिखाई देगी| इसलिए अपने कमजोर संकल्पों को भी अब समर्ध बनाओ| यह जो कहावत है कि ‘संकल्प से सृष्टि रची’- यह इस समय की बात है| जैसा संकल्प वैसे अपनी रचना रचने के निमित्त बनेंगे| इसलिए हर एक स्टार में अलग-2 दुनिया का गायन करते हैं| स्वयं का आधार अनेक आत्माओं प्रति स्मृति में रखते हुए हर संकल्प , हर सेकण्ड की वृत्ति , बोल और कर्म करना- इतनी जिम्मेवारी समझते हुए चलते हो? वा यह बापदादा का काम है| आपका काम है वा बाप का काम है? प्राल्ब्द पाने वालों को पुरुषार्थ करना है वा बाप को? जैसे लेने में कुछ भी कमी नहीं करने चाहते वा लेने समय स्वयं को किससे भी कम नहीं समझते, यही सोचते हो कि मेरा भी अधिकार है| वैसे ही हर बात के करने में अपने को अधिकारी समझते हो? वा करने में हम छोटा है, यह बड़ों का काम है और लेन में हम छोटे भी कम नहीं हैं| वा चोटों को सब अधिकार होने चाहिए| चोटों को भी बड़ा समझना चाहिए| समझना चाहिए वा बनना चाहिए? जो करेंगे सो पायेंगे, वा जो सोचेंगे सो पायेंगे| नियम क्या है? सोचना, बोलना और करना तीनो समान बनाओ| सोचना और बोलना बहुत ऊंचा, करना कुछ भी नहीं, तो
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सोचते बोलते ही समय बिता देंगे| करने से जो पाना है वह पा नहीं सकेंगे| स्वयं को भी श्रेष्ठ प्राप्ति से वंचित करेंगे और अपनी रचना को भी वंचित करेंगे| इसलिए कहना कम, करना ज्यादा| मेहनत करके पाएंगे, यह लक्ष्य सदा याद रखो| मुझे भी महारथी वा सर्विसबुल समझा जाए, मुझे भी अधिकार दिया जाए वा स्नेह सहयोग दिया जाए, यह मांगने की चीजें नहीं| श्रेष्ठ कर्म श्रेष्ठ वृत्ति, श्रेष्ठ संकल्प की सिद्धि र्रूप में यह सब बातें स्वतः ही प्राप्त होती है| इसलिए इन साधारण संकल्पों वा व्यर्थ संकल्पों में भी समय नहीं गंवाओ| समझा|
ऐसे बाप समान गुण कर्म करने वाले, हर संकल्प में जिम्मेवारी समझने वाले, संकल्प में भी अलबेलापन को मिटाने वाले, सदा बाप के साथी बन निभाने वाले, हर पार्ट को साक्षी हो बजाने वाले सर्व श्रेष्ठ आत्माओं को बापदादा का याद प्यार और नमस्ते|
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{पार्टियों से}: जो समीप होते हैं वही समान बनते हैं| जैसे साकार में समीप हो वैसे ही लगन लगाने में भी बापदादा के तख्तनिवासी हो? जैसे तन से समीप वैसे ही मन से भी समीप हो? जैसे विदेश में रहने वाले तन से दूर होते भी मन से सदैव समीप हैं| बापदादा के सदैव साथी ही हैं अर्थात हर समय साथी बनकर साथ का अनुभव करते हैं, वैसे सदैव साथी बन्ने का वा साथ निभाने का अनुभव करते हो? जैसे बंधन में रहने वाली गोपिकायें हर श्वाँस, हर सेकण्ड बाबा बाबा की धुन में ही खोई रहती हैं ऐसे बाबा को प्रत्यक्ष करने के, बाबा के चरित्रों को अपने चित्र द्वारा दिखाने के, बंधन में बंधे हुए- याद की धुन में रहते हो? जैसे बाहर वालों को मिलन ही तड़फ रहती है ऐसे हर समय याद की तड़फ में रहते हो वा साधारण स्मृति में रहते हो? हम तो है ही बाबा के, हम तो है ही समीप, हम तो है ही समर्पण, हमारा तो एक बाबा है ही- सिर्फ इस संकल्प से संतुष्ट तो नहीं हो गये हो?
अपने लगन में अग्नि की महसूसता आती है? जिस लगन की अग्नि में स्वयं के पार्ट के संस्कार और स्वभाव और अन्य आत्माओं के दुखदाई संस्कार स्वभाव भस्म कर सको? ज्ञान द्वारा अथवा स्नेह संपर्क द्वारा संस्कार परिवर्तन करते हो लेकिन उसमें समय लगता है? मिटा हुआ फिर भी कभी प्रत्यक्ष हो जाता है| लेकिन जब समय की लगन की अग्नि में भस्म करने का है जो फिर नाम निशाँन न रहे| इस मुक्ति कि युक्ति कौनसी है? अर्थात इस लगन की अग्नि पैदा करने की युक्ति वा तीली कौन सी है? तीली से आग जलाते हो ना| तो इस अग्नि को प्रज्वलित करने की कौनसी तेली है? एक शब्द कौनसा है? ढृढ़ संकल्प| अर्थात मर जायेंगे मिट जायेंगे, लेकिन करना ही है| करना तो चाहिए, होना तो चाहिए, कर ही रहें है, हो ही जाएगा, अटेन्शन तो रहता है, महसूस भी करते है सेसा सोचना यह बुझी हुई तीली है| बार-2 मेहनत भी करते हो, समय भी लगाते हो लेकिन अग्नि प्रज्वलित नहीं होती|कारण यह है कि संकल्प रूपी बीज ढृढ़ता रूपी सार सम्पन्न नहीं है अर्थात खाली है| इस कारण जो फल को आशा रखते हो वा भविष्य सोचते हो वह पूर्ण हो नहीं पाता है| और चलते-चलते मेहनत ज्यादा प्राप्ति कम दिखाई देती तो दिल्शिकस्त हो जाते हो| करते तो हैं लेकिन मिलता नहीं तो क्या करें| हमारा प्रात ही ऐसा है, यह है दिल्शिकास्त वा अल्बेलेपन के बिगर देने वाले संकल्प| आप अन्य आत्माओं को संगमयुग की विशेषता कौनसी बताते हो? सभी को कहते हो संगमयुग है असम्भव के सम्भव होने का युग| जो बात सारी दुनिया असम्भव समझती वह सम्भव करने का युग है| तो स्वयं को भी जो मुश्किल वा असम्भव होता है उसको एक सेकण्ड में सम्भव करना ही है ढृढ़ संकल्प| सहज को अथवा सम्भव को प्रैक्टिकल में लाना कोई बड़ी बात नहीं| लेकिन असम्भव को सम्भव करना और ढृढ़ संकल्प से करना, यह है पास विद आनर की निशानी| अब यह नवीनता करके दिखाओ| जैसे स्टूडेन्ट अपने हर वर्ष की टोटल रिजल्ट देखते हैं कि हर सब्जेक्ट में कितनी परसेन्ट रही वैसे पनी रिजल्ट देखनी है कि किस बात में चढ़ती कला हुई, किस पुरुषार्थ के आधार पर चद्ती कला हुई वा किस सब्जेक्ट में कमी, वह पूरा हिसाब निकाला? मुबारक भी बापदादा तो सदैव देते रहते हैं| रोज अमृत वेले मुबारक मिलति है ना| वह तो एक दिन मुबारक देते हैं| बापदादा तो पूरा संगम्युग मुबारक देते हैं| क्योकि सृष्टि का बड़ा दिन तो यही है ना| अच्छा- ओमशान्ति|
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