[10:14, 9/12/2020] +91 88797 26711: हमेशा यही समझो शिवबाबा समझाते हैं। तो मम्मा में स्पेशल क्या बात थी? वो क्या समझती होगी? उसकी बुद्धि में हमेशा यही रहता होगा कि शिवबाबा ही समझाते हैं। तो उसकी ट्रेन कैसी हो जावेगी? सुपरफास्ट हो जावेगी। तो स्पेशल हो गई ।धारणा ज्यादा है बाबा के महावाक्य पर। आडियो 39 @21.50
[10:14, 9/12/2020] +91 88797 26711: यह अनादि बना- बनाया खेल है। इसमें फिर से सतयुग होगा, ये ऐसा अनादि बनाया हुआ सृष्टि रूपी खेल है। सृष्टि अनादि है, इसकी कभी आदि नहीं होती, इस का कभी अंत नहीं होता। ये चार युगों का चक्कर यूं ही फिरता रहता है- सतयुग, त्रेता, द्वापर, कलियुग। जैसे मनुष्य आत्माएं जन्म लेती हैं, बचपन आता है, जवानी आती है, बुढ़ापा आता है फिर मृत्यु होती है, फिर जन्म होता है। तो जैसे ये चक्कर चलता रहता है वैसे इस सृष्टि का भी चक्कर चलता रहता है। तो इसमें फिर से सतयुग होगा। भारत में ही सतयुग होता है। सबसे ज्यादा झूठखंड कौन - सा देश बनता है? भारत ही झूठ खंड बनता है।... भारत में ही स्वर्ग होता है और भारत में ही रौरव नरक होता है। भारत ही अविनाशी खंड है। और धर्म खंड विनाशी हैं। वीसीडी 85
[10:14, 9/12/2020] +91 88797 26711: दस इंद्रियां है। दस इंद्रियों में भ्रष्ट इंद्रियां भी हैं, जिन भ्रष्ट इंद्रियों से मूत-पलिती काम किया जाता है, तब संतान पैदा होती है। और श्रेष्ठ इंद्रियां भी हैं, जिन्हें ज्ञान इंद्रियां कहा जाता है। ज्यादा आकर्षण कौन सी इंद्रियों में होगा? ज्ञानेंद्रिय में ज्यादा आकर्षक ज्यादा शक्ति होती है या कर्मेन्द्रियों में ज्यादा आकर्षण, ज्यादा शक्ति होती है? जिसमें ज्यादा शक्ति होगी वह जास्ती लंबे समय तक सुख भोग सकेगा जिसमें कम शक्ति होगी वह क्षणभंगुर सुख भोग सकेगा और भोगने में आएगा।... भगवान तो आकर ऐसी दुनिया बनाता है जहां ज्ञान इंद्रियों से, श्रेष्ठ इंद्रियों से सदा काल का सुख भोगा जा सकता है। वहां थकान की बात नहीं रहती। यहां तो इस दुनिया में घड़ी-2 थकान आती है। श्रेष्ठ ज्ञान इंद्रियों से आचरण करने वाले को श्रेष्ठाचारी देवता कहा जाता है।उन श्रेष्ठाचारी देवताओं की मंदिर में हम पूजा करते हैं। पूजा का आधार पवित्रता होती है। वीसीडी 489
[10:14, 9/12/2020] +91 88797 26711: असवद का संस्कृत शब्द है- अश्वेत। अश्वेत कहा जाता है जो सफेद न हो अर्थात जो काला है। जिस खुदा का जिक्र मुसलमान करते हैं, उसे जब चमकने वाला तारा माना गया है, जो प्रकाशित रहता है, तो सफेद के बदले काले पत्थर को चूमने के पीछे क्या कारण है? यह काला पत्थर वास्तव में परमपिता शिव के साकार स्वरूप लिंग का यादगार है, जो इस काली करतूतों वाली कलियुगी रुपी दुनिया के बीच अपना पार्ट बजाता है। जब तक इस साकार स्वरूप (जिंदा शख्सियत) का संग नहीं करते तब तक परमपिता परमात्मा शिव (खुदा) की प्राप्ति (बरकत और आला नसीब) नहीं होती। इसी के यादगार में संग ए असवद काले शिवलिंग रूपी पत्थर का चुंबन करते हैं, अन्यथा निर्गुण खुदा को अपना प्यार कैसे जता सकते हैं? साकार द्वारा ही तो यह संभव है!
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