Tuesday, September 29, 2020

Dear visitors
This capital is being established.  If there is a king in the capital and the king gives some direction and does not listen, then will the king make him sit on a high chair?  Will make you part of the punishment.  Not everyone can follow directions.  Those who do not walk will not be called loyal, obedient and decisive.  You have to walk completely on the dictates of God.  The ruling is dictating.  God commands.  Those who do not agree, you will not be able to get high positions.  If you have taken some other knowledge, you will go to heaven based on that knowledge.  Only then do you become happy that you will come to heaven!  They do not understand that there are many types of things in heaven too.  The Father knows that we can follow divine orders, when?  When can we go  If you dare, you can follow divine orders, but there is not so much strength and strength.  Local people do not have the strength to compete against total dignity.  What will they say, what will they say?  This will happen, it will happen!  If you do not have the power to follow the Father's directions, you will surely have such a position.  Only the one Father establishes heaven, or do people who are in this world establish heaven?  The Father keeps giving you children how much you become elevated by the dictates of God!
 Vcd- 737
शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2803, दिनांक 26.02.2019
प्रातः क्लास 13.11.1967
VCD-2803-extracts-Hindi
समय- 00.01-17.31
 
प्रातः क्लास चल रहा था – 13.11.1967. सोमवार को पांचवें पेज पर मध्यांत में बात चल रही थी कि जो भोगी आत्माएं हैं वो शरीर से भोग भोगते हैं तो उनको नाम तो जरूर चाहिए। नाम बिगर तो काम ही नहीं चल सकता। कोई सर्विस ही नहीं चल सकती। अरे, ये सृष्टि भी नहीं चल सकती। तो ऐसा नहीं कोई ख्याल करना कि वहाँ नाम नहीं रहेगा। नाम तो बिल्कुल सहज है। बाकि हाँ, यहाँ जरूर आत्मा के ऊपर ही सारी बात है कि हे पतित-पावन आओ। आकरके हमारी आत्मा को पावन बनाओ। हँ? आओ का मतलब क्या? हँ? आओ माने आओ और गुप्त बने रहो? हँ? अरे, आत्मा भी परमधाम से आती है कोई भी आत्मा तो कब कहा जाता है कि आई? जब कोई शरीर के द्वारा प्रत्यक्ष हो; बच्चा भी जन्म लेता है तो बाहर प्रत्यक्ष होता है तभी कहते हैं ना आया। तो बताया – जो बुलाते हैं पतित पावन आओ, तो जरूर तब ही आत्मा को आकरके पावन बनाएंगे जब इस मनुष्य सृष्टि रूपी रंगमंच की सबसे जास्ती पतित, तमोप्रधान आत्मा में प्रवेश करके पार्ट बजाए। तो दोनों का प्रत्यक्षता रूपी जन्म साथ-साथ है। पतित का भी और पावन आत्मा का भी। तो, तो कहा जाएगा आया।
 
फिर उस पावन आत्मा को तो देखो श्री-3 सबका नाम पड़ता है। जो भी पावन बनते जाते हैं संग के रंग से तो पावन बनते जाते हैं। तो ऐसा कोई न समझकरके बैठे कि वहाँ नई दुनिया में आत्माभिमानी बनके रहेंगे, नहीं, देह अभिमानी बनके रहेंगे। नहीं। देह का नाम तो वहाँ होगा परन्तु वो याद नहीं आएगा। नाम जरूर होगा। तो जभी नाम-नाम रखे जाते हैं तो फिर आत्माभिमानी बनकरके ही कैसे रह सकेंगे? रह कैसे सकेंगे? हाँ, इतना ज़रूर है कि आत्मा प्योर हो जाती है। तो तुम्हारे से वहाँ कोई पीछे विकर्म नहीं होता है। पवित्र आत्मा अपने ठिकाने पर टिकी रहती है। हाँ, लक्ष्मी वा नारायण या जो भी सीता या राम, हँ, उस ऊँची स्थिति में टिके रहने के कारण, हँ, कौनसी ऊँची स्थिति? भृकुटि के मध्य में जिसे कहते हैं मूर्धा। फिर उतने विकर्म नहीं होंगे। बल्कि नाम तो फिर भी यही गिनती करते जाएंगे ना। क्योंकि यहाँ तो है प्योर बनने की बात।
 
पीछे बच्चे जानते हैं कि वो ही आत्मा थोड़ी-5 डिग्री कमती होती जाएगी। कहाँ? नई दुनिया में। यहाँ जब तुम्हारी आत्मा बिल्कुल प्योर हो जाएगी। अभी तो नहीं कहेंगे बिल्कुल प्योर। क्यों? आत्मिक स्थिति में कम रहते और देह भान में ज्यादा रहते। तो प्योरिटी की बात ही नहीं। तो बिल्कुल जब प्योर हो जाएगी तब ही ये शरीर छोड़ जावेंगे। हँ? आत्मा ऐसे अनुभव करेगी कि ये देह अलग और मैं आत्मा अलग। फिर उस प्योर आत्मा को प्योर शरीर मिलेगा। हँ? किस प्योर आत्मा को? उस प्योर आत्मा को। किस प्योर आत्मा को प्योर शरीर मिलेगा? हँ? हाँ? जिस शरीर में मुकर्रर रूप से प्रवेश करते हैं उसको पवित्र शरीर, नीरोगी कंचनकाया मिलेगी या नहीं मिलेगी? इसी जनम में मिलेगी या बरफ में दब जाने के बाद मिलेगी? (किसी ने कुछ कहा।) बरफ में दब जाने के बाद मिलेगी? अच्छा? बरफ में दब जाने का मतलब भी हद का है, बेहद का है। बर्फ में क्या होता है? ठंडा हो जाता है। है ना? और यहाँ बेहद में क्या है ठंडी का मतलब ब्राह्मणों की दुनिया में? पुरुषार्थ की ठंडी ऐसी पड़ जाती है कि कोई से भी वो पुरुषार्थ हो नहीं पाता है। कौनसा पुरुषार्थ? इस दुनिया में जब विनाश का हड़कंप चलता है तो इस हड़कंप के बीच में आत्मा स्थिर हो नहीं पाती है। अब जब स्थिर नहीं हो पाती है तो क्या कहें कि पुरुषार्थ की ठंडी लग रही है कि नहीं? ठंडी लग रही है।
 
तो, तो जो आत्मा बताया, उस आत्मा, जो प्योर आत्मा बन जाती है फिर शरीर भी प्योर मिलेगा। तो इसी दुनिया में मिलेगा कि जो नई दुनिया कही जाती है उसमें मिलेगा? हाँ, तो खूबी ये है। क्या? जो बताते हैं कि तुम्हारी आत्मा रूपी नैया, वो आत्मा रूपी जो बिठैया है और शरीर रूपी जो नैया है तुम्हारी जिसमें आत्मा बैठी हुई है, दोनों का पार लगाने वाला खिवैया तुमको मिला हुआ है। किसको? किसको? हँ? अरे, बताओ जल्दी। किसको मिला हुआ है? इसी दुनिया में, हाँ, (किसी ने कुछ कहा।) पूरी रूद्र माला को? पूरी रुद्र माला के जो भी मणके हैं वो बर्फ में नहीं दबेंगे शरीर के साथ? बर्फ में नहीं जाएंगे? तो कहेंगे, तो कहेंगे यहीं कंचनकाया बन जाएगी इसी दुनिया में? हँ? हाँ, बताया उस प्योर आत्मा को। उस प्योर आत्मा को माने उन आत्माओं को या उस आत्मा को? एक के लिए बोला। तो खूबी ये है। क्या खूबी? कि तुम्हारी आत्मा भी पवित्र और तुम्हारा शरीर भी पवित्र बन जाएगा।
 
शरीर भी प्योर और फिर यहाँ, यहाँ देखो इस दुनिया में न कोई की आत्मा प्योर न कोई शरीर प्योर। ये तो समझ सकते हो ना बच्चे कि न आत्मा प्योर होती है न शरीर प्योर होते हैं। हँ? ये जो ढ़ेर के ढ़ेर शरीरधारी हैं वो यहाँ इस दुनिया में, नरक की दुनिया में पवित्र बनते हैं? बनते हैं? हँ? अरे? अरे, विष्णुलोक में जाएंगे तब ही पवित्र कहेंगे या स्वर्ग में जाएंगे, सतयुग जिसे कहेंगे 16 कला संपूर्ण, वहाँ जाएंगे तब पवित्र होंगे शरीर या यहाँ नरक की दुनिया में पवित्र होंगे? हँ? नहीं। तो शरीर प्योर नहीं होते हैं क्योंकि, क्योंकि ये अलाय पड़ता ही रहता है। अलाय माने किसका अलाय? अलाय माने खाद। कौनसी खाद? दूसरी-दूसरी जो देहधारी आत्माएं हैं ना उनके संग के रंग की, उनकी स्मृति की खाद पड़ती है। वो खाद छूटती ही नहीं। जब छूटती नहीं तो शरीर पवित्र बनेगा ही नहीं। अलाय पड़ता जाता है।
 
तो अच्छी तरह से ये सब बातें धारण करनी होती है ना। क्या? कि जो बर्फ में भी दबेंगे उनमें भी तो नंबरवार होंगे। कोई तो पहले निकलेंगे कि बाद में निकलेंगे सब इकट्ठे? हाँ, कोई पहले निकलेंगे, कोई? कोई बाद में निकलेंगे। 13.11.67 के प्रातः क्लास का छठा पेज। तो ये धारण करने से इन बातों को फिर खुशी बहुत रहती है। क्या खुशी रहती है? कि हम आत्मा जब ये बातें ज्ञान की अच्छी तरह गहराई से धारण हो जाएंगी तो बुद्धि में बैठेगा कि हम आत्मा अब नई दुनिया में जल्दी से जल्दी विष्णुलोक में पहुँचने वाले हैं। क्योंकि बच्चों को समझाया तो जाता है ना।
 
बच्चे वो तो सभी बाप, टीचर, वगैरा अलग हैं। क्या? वो बाप, दुनिया में जितने भी बाप हुए। चाहे धरमपिताएं हों ऊँच ते ऊँच पावरफुल कहे जाते हैं और चाहे वो जन्म-जन्मान्तर के तुम्हारे बाप हों। या जन्म-जन्मान्तर के टीचर हों। वो सब अलग हैं। और ये तो बाप, टीचर, सद्गुरु बिल्कुल अलग है। और ये एक ही है। वो तो अनेक हैं। तो सुप्रीम जिसको कहा जाता है परमपिता। क्या? क्या? सुप्रीम माने? परमपिता। जिससे ऊँचा पिता और कोई होता ही नहीं। परम और क्या? परम शिक्षक। जिसमें प्रवेश करते हैं उसको भी कहेंगे परमशिक्षक? हँ? नहीं कहेंगे? अरे? अरे, कहेंगे कि नहीं? चक्कर में पड़ गए। कहेंगे? कौन कहेंगे? हँ? वो खुद कहेगा परमशिक्षक? कहेगा? हाँ, बिल्कुल नहीं कहेगा। क्यों? क्योंकि उसको भी पढ़ाई पढ़ाने वाला कौन है उससे भी ऊँचा? हाँ, वो ही सुप्रीम सोल जिसको कहा जाता है परमपिता। तो फिर कहेंगे परम टीचर। परम टीचर भी है, परम पिता भी है। और? सद्गुरु भी। कब? वो तो निराकार तो नहीं हो सकता। वो कब? जब शरीर में प्रवेश करते हैं तो परमगुरु भी हैं। हाँ। लेकिन फिर परमगुरु तो भले कह दो लेकिन सतगुरु नहीं कह सकते। क्यों? सत तब कहेंगे जो इस दुनिया में सदा काल सत रहे। वो सदाकाल सत रहता है इस दुनिया में? सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु निराकार? नहीं। तो जब शरीर में प्रवेश करते हैं तब उनको कहा जाता है सद्गुरु क्योंकि सत के बदली में परम कह देते हैं। क्या? परमपिता, परम टीचर, परम गुरु। बाकि उस सुप्रीम सोल को; क्या? सतगुरु नहीं कह सकते।
 
तो वो तो फिर एक ही हो जाते हैं ना बच्ची। हँ? एक ही कैसे? एक ही शरीर में प्रवेश करते हैं दो आत्माएं तो जब सद्गुरु कहेंगे तो दोनों मिल करके एक ही हो जाते हैं। हाँ। एक ही कहेंगे। एक ही हो जाते हैं माने? दो आत्माएं नहीं रहती? हँ? अरे? विष्णु को एक कहेंगे या दो कहेंगे? विष्णु को क्या कहेंगे? (किसी ने कुछ कहा।) विष्णु को 4-5 कहेंगे? अलग-अलग हैं? उनके संस्कार टकराते हैं? हँ? एक रहते हैं। न संस्कार टकराते, न वाचा टकराती, न दृष्टि तुर्स होती है एक-दूसरे के प्रति। होती है? बिल्कुल नहीं होती है। तो कहते हैं एक विष्णु। ऐसे ही ये सद्गुरु भी एक हुआ या दो अलग-अलग हुए? हाँ, एक हुआ। एक हो जाते हैं। 
 
देखो ऐसे कभी भी कृष्ण को तो नहीं कह सकेंगे। कहेंगे? कहेंगे? परमपिता तो कह भी नहीं सकते कृष्ण को। हँ? कि उनका भी जन्म देने वाला कोई बाप था या नहीं था? तो उसको परमपिता कहेंगे? नहीं। और यहाँ तो जो तुम कहते हो बापों का बाप जिसका कोई बाप होता ही नहीं। किसका बाप? हाँ, मनुष्य सृष्टि का। अनेक प्रकार का धरमपिताओं में विभाजन है। क्या? बड़े ऊँचे-ऊँचे धरमपिताएं माने जाते हैं ना। सारी दुनिया मानती है ना। हाँ, लेकिन उन धरमपिताओं का भी कोई बाप है जिसको कहते हैं। क्या? वो आदम, एडम को मानते हैं ना। जानते नहीं हैं। तो वो हो गया उनसे भी ऊँचा। फिर? आदम से भी ऊँचा कोई और है? हाँ। उससे भी ऊँचा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर पार्ट बजाने वाली आत्मा है। सदाकाल पार्ट नहीं बजाती है। लेकिन सौ वर्ष के लिए जैसे और धरमपिताएं आते हैं, अपना धर्म स्थापन करते हैं, सौ वर्ष के अन्दर, वैसे वो परमपिता शिव भी, हाँ, आते हैं, प्रवेश करके पार्ट बजाते हैं।       
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