Saturday, October 31, 2020

टीचर के प्रति इमानदार होना चाहिए 

Thursday, October 29, 2020


jagannath mandir ke ashleel chitr 

seva pyar se karna chahie 


Wednesday, October 28, 2020

maha kal maha kali 

Tuesday, October 27, 2020

3299

పంచ తత్వాలు 

Monday, October 26, 2020

अक्षरं परमं ब्रह्म (गीता 8/03) कौन है??

★ 84 जन्म लेने वाली जो क्षरित आत्मा है, उनमे भी नंबर वार है। कोई तो ऐसी है- जो 100% अक्षर है। उसका पार्ट इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर कभी खत्म होता ही नही। उसको बोला है गीता में-अक्षरं परमं ब्रह्म। वो परमब्रह्म है। 2 प्रकार की केटेगरी बताई। क्षर और अक्षर। जो क्षर है-वह 500-700 करोड़ मनुष्यात्माए है, अक्षर एक शिव है। परंतु जो क्षर आत्मा है उनमें भी एक आत्मा ऐसी है जो अक्षर है पार्ट के आधार पर। उसका पार्ट कभी खत्म नही होता। इसलिए बताया-शिव अक्षर, 500-700 करोड़ मनुष्यात्माएं क्षरित होने वाली, परंतु उन क्षरित होने वाली आत्माओं में भी एक आत्मा ऐसी है जो विष्णु पद पाती है। परमपद जिसें कहा जाता है। सारी मनुष्य सृष्टि का बीज। उत्तम पार्टधारी। पुरुषोत्तम। पुरुषो में उत्तम पार्टधारी। शिव को पुरुषोत्तम नही कहेंगे। उसकी कैटोगरी नही है। उसको किसी केटेगरी में रखा नही जा सकता। वो गिनती से बाहर है। इसलिए नाम जीरो है। गिनती में आने वाले 9 अंक है। जीरो को अकेला जीरो रख दो कोई वैल्यू नही। कोई भी अंग के साथ जीरो रखो तो वैल्यू है।  Varta 1682  [@ 37mins]




vishnu party vaale suno 

vishnu party vale suno 



शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2813, दिनांक 08.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
VCD-2813-Hindi-Part-1
समय- 00.01-25.42
 
प्रातः क्लास चल रहा था - 14.11.1967. मंगलवार को पांचवें पेज के मध्य में बात चल रही थी सोमनाथ मंदिर की। जो सोमनाथ मंदिर की यादगार है वो कोई इतना अभी नहीं है क्योंकि वो तो टूट-फूट गया ना सोमनाथ का मंदिर क्योंकि वो जो काशी का मंदिर है ना काशी विश्वनाथ तो वो अभी यादगार शिव का मंदिर है। क्यों? क्या यादगार? विश्व के मालिकपने की यादगार है। तो वो सोमनाथ इतना नहीं है जितना काशी को रखा है। जो वो धाम होते हैं ना उसमें भी काशी धाम रख दिया हुआ है। वो जो उज्जैन, वहाँ, वहाँ तो सोमनाथ का मंदिर था। उसको धोम नहीं रखते हैं। अरे? उज्जैन में महाकाल का मंदिर है या सोमनाथ का मंदिर है? हँ? अरे, सोमनाथ का मंदिर तो प्रभास क्षेत्र में गुजरात में है ना। सागर के किनारे है। उज्जैन कोई सागर के किनारे है क्या? नहीं। बाबा को याद नहीं रहा। तो बोला, हँ, कि उज्जैन वहाँ जो सोमनाथ का मंदिर था उसको धाम नहीं रखते हैं। काशी को धाम रखते हैं। क्योंकि काशी किनारे पर भी है गंगा के। और बच्चे वहाँ बहुत बैठे हुए हैं। हँ? कौनसे बच्चे? हँ? कौनसे बच्चे बैठे हुए हैं? हँ? बनारस में तो गई होगी तुम। कि नहीं गई हो? अरे, बनारस में भी नहीं गई हो क्या? तो किसी ने कहा – अभी नहीं। काशी में नहीं। अभी-3 की यात्रा। किसी ने कहा – अभी की लाइन में गई है।
 
हाँ, तो बनारस भी बहुत अच्छी है। उसमें बहुत साधु-संत, महात्मा रहते हैं। नंबरवन है काशी। और पीछे है हरिद्वार वास्तव में। क्योंकि काशी में तो काशी करवट खाते हैं ना। कहते हैं शिवकाशी-3. और वहाँ तो हरिद्वार कहते हैं। कहाँ? पहाड़ से गंगा उतरती है ना। तो हरिद्वार कहते हैं। हरि के द्वार में उतरी। और यहाँ तो शिव की काशी का नाम। यहाँ शिव की याद आती है। इसलिए जो भी साधु-संत बैठे रहते हैं वो जपते रहते हैं शिवकाशी-3. ये शिवकाशी वो काशी को बनारस भी कहते हैं। क्यों? जो कहते हैं, जो भी नाम दिये हुए हैं किस नाम के आधार पर? हँ? काशी नाम है काश्य के आधार पर। काश्य माने तेज। हँ? और बनारस किसलिए नाम दिया? हाँ, जब तेज आएगा याद का तो वो मंथन ज्यादा चलेगा ना। मनन-चिंतन-मंथन चलता है तो फिर ज्ञान का बना-बनाया रस निकलता है। बाकि असुल नाम तो इसका काशी था। पीछे बनारस रखा गया है। अंग्रेजों ने बनारस रखा। अंग्रेजों ने बनारस क्यों रखा? हँ? क्योंकि तुमको बादशाही कहाँ से लेनी है? अंग्रेजों से ही तो लेनी है ना। तो उनकी  बुद्धि में सारा ज्ञान ठहरता है। बाकि याद की बात तो।
 
तो अभी ये नाम रख दिया है बनारस दूसरा। तो कोई ने कहा – बाबा, वाणारसी। हाँ, वाणारसी। नाम इसका असुल सच्चा नाम है काशी। पिर ये जो शूद्र संप्रदाय हैं उन्होंने बैठकरके देखो नाम फिराय दिया है काशी का वाणारसी या बनारस। अब बनारस, वाणारसी है थोड़ा सा ही फर्क। परन्तु जैसा राजा होता है ना तो वो शहरों का नाम भी बदलते जाते हैं। गलियों का भी नाम बदल देते हैं। अरे, बहुत चीज़ों के नाम बदलते जाते हैं। ये दिल्ली इसका भी नाम बदला हुआ है। हँ? आगे असल कोई दिल्ली नहीं कहते थे। हँ? आगे क्या कहते थे? हँ? इंद्रप्रस्थ। इंद्रप्रस्थ कहते थे। कि इंद्र की बसाई हुई, स्थिर की हुई, प्रकष्ट रूप में स्थिर की हुई इंद्रप्रस्थ नगरी। तो पहले हिलती होगी। हँ? इंद्र ने आकरके उसको स्थिर किया। किसी ने कहा – हस्तिनापुर कहते थे। हँ? हस्तिनापुर? किसी ने कहा – जी, हाँ। ये इंद्रप्रस्थ नाम ठीक है। क्यों? हाथियों का पुर; हस्ति माने हाथी। अरे; हाथियों का पुर नाम क्यों रखना? हँ? हाथियों में तो कितना देह भान होता है। हँ? हस्तिनापुर? किसी ने कहा – जी, हाँ। ये इंद्रप्रस्थ नाम ठीक है। क्यों? हाथियों का पुर हस्तिनापुर माने हाथी। अरे? हाथियों का पुर नाम क्यों रखना? हँ? हाथियों में तो कितना देहभान होता है! है। अरे, यहाँ तो परियां रहती थी ना। हँ? ज्ञान योग के पंखों से उड़ने वाली परियां। इंद्र के दरबार में अप्सराएं, परियां दिखाते हैं ना। तो हैं ना वो नाम – पुखराज परी, नीलम परी। तो वो परियां हैं। तो ये परियां किसको कहते हैं? इंद्र की परियां हैं।
 
तो इंद्र तो कोई बरसात नहीं बरसाते हैं। इंद्र बरसात बरसाते हैं क्या? हँ? वो तो कहते हैं वरुण देवता, वो बरसात बरसाते हैं। हँ। गाया जाता है कि इंद्र सभा में कोई परी, हँ, कोई परी थी जो छी-छी को ले आई। तो उनको श्राप मिल गया, हँ, कि तुम जाकरके पत्थर बन जाओ। अब कोई पत्थर बनने की बात थोड़ेही है। पत्थरबुद्धि बन गई। 14.11.1967, मंगलवार का प्रातः क्लास, छठा पेज। तो पत्थर बन जाओ। या वो परियां नीचे की तो बात नहीं है। ये तो बाप यहीं बताय दिया है कि जो जानबूझ करके छी-छी को ले आते हैं ना, साथ में ही ले आते हैं, यहाँ पतित को ले आते हैं तो गोया उनको जैसे श्राप मिल जाता है कि तुम जाकरके फिर भी पत्थरबुद्धि बन जाओ। हँ? बुद्धि पत्थर बन जाएगी तो क्या होगा? हँ? क्या अंतर पड़ेगा? आत्मिक स्थिति ठहरेगी? नहीं ठहरेगी। क्योंकि हैं तो सभी पत्थरबुद्धि ना। तो उनको बोला जाकरके तुम फिर भी पत्थरबुद्धि बन जाओगी। कहाँ जाकरके? हँ? सतयुग, त्रेता में कोई पत्थरबुद्धि होते हैं? वहाँ तो आत्मिक स्थिति रहती है ना, याद रहती है ना। लगातार याद रहती है। तो हैं सब बातें यहाँ की। क्या सब बातें? यहाँ सब बातों की शूटिंग होती है।
 
 इंद्रप्रस्थ नाम बिल्कुल ठीक है। क्या? बिल्कुल ठीक कैसे? कि इंद्र ने प्रकष्ट रूप से दिल्ली को स्थिर किया। हँ? पहले दिल्ली, पहले दिल्ली में हाहाकार होता है; तो हिलती है या स्थिर होती है? हिलती है। हाँ। तो हो सकता है ना। बाकि वो तो इंद्र तो है नहीं ना। माना अभी नहीं है। इंद्र माने? राजा। और यहाँ परियां-वरियां तो कुछ नहीं हैं ना जिनको वो पंख हों, उड़ती हों। ये तो ज्ञान-योग के पंखों की बात है। हँ? ज्ञान का पंख और योग का पंख। तो परियां तो अभी तुम बन रही हो सच्ची-सच्ची। हँ? दैवी गुणों को धारण करने वाली परियां। तो जब तुम दैवी गुण धारण करती हो तो बरोबर बस इनसे ऊँची तो कोई परी होती नहीं है। इसको ही स्वरग की परियां भी कहते हैं। तो वो तुम हो यहाँ पढ़ रही हो अच्छी तरह से। कहाँ जाने के लिए? अरे, परिस्तान में चलने के लिए। कौनसा परिस्तान? जो इंद्र ने क्या बनाया? कब्रिस्तान दिल्ली बन गई थी; मरा पड़ा था ना। तो जब ज्यादा मरते हैं तो कब्रिस्तान में ज्यादा कब्रें बन जाती हैं। हाँ। कब्रिस्तान बन गई माने देह अभिमान की मिट्टी में सब गल गए। पहले तो बेहद की बात। फिर हद में।
 
तो बताया – परिस्तान में चलने के लिए तुम अब तैयार हो रही हो क्योंकि जानती हो अभी परिस्तान भी तो यहीं बनने का है ना। क्यों? पहले दिल्ली क्या बनती है? पहले कब्रिस्तान, फिर परिस्तान बनती है। तो ये वो ही तो दिल्ली है ना। दूसरी जगह तो कोई नहीं है ना। तो बच्चे तो समझ गए हैं कि हम अपने घर जाकरके फिर वापस आएंगे। कौन बच्चे? आत्मा रूपी जो तुम बच्चे हो बिन्दु-बिन्दु आत्माएं, देह तो नहीं हो ना। आत्मा, आत्मा आत्मा के घर में रहेगी। आत्माओं का घर कौनसा? आत्मलोक। हाँ। तो वहाँ जाकरके फिर वापस आएंगे। कहाँ आएंगे? हँ? इसी इंद्रप्रस्थ में वापस आएंगे क्योंकि पहले घर तो ज़रूर जाना है। क्यों? क्योंकि अभी पार्ट बजाते-बजाते आत्मा थक गई है। तो कहाँ जाना है? थक जाते हैं तो रात में सोने जाते हैं ना। हँ? हाँ, तो ये आत्मा थक गई तो कहाँ चली जाएगी? सुषुप्ति में चली जाएगी। वहाँ संकल्प-विकल्प चलेंगे? इंद्रियां काम-धंधा करेंगी? वहाँ इन्द्रियां होती ही नहीं। जैसे सुषुप्ति में इन्द्रियों की याद रहती है? नहीं।
 
तो घर तो जाना ही है। और जाना भी नंगा ही है। माना ये शरीर रूपी चोला उतार करके जाना है। हँ। पवित्र बनके जाना है। ये तो चोला अपवित्र हुआ ना। हँ? अगर अपवित्र चोले को पवित्र नहीं बनाया तो क्या होगा? तो सज़ाएं खानी पड़ेंगी। सज़ाएं खा-खाकरके जाना है। तो फिर प्योर होकरके जावेंगे। घर जाएंगे। फिर वहाँ से यहाँ आना है। फिर भी वहाँ से नंगा ही आवेंगे ना कि घर में से कपड़े-वपड़े पहनके आवेंगे? हाँ। तो ये तो बिल्कुल समझ की बात हो गई कि नंगा जाना है, नंगा आना है। कहते भी हैं नंगे गए, नंगे आते हैं, नंगे जाते हैं। हँ? तो अंत में नंगा जाना है। जब वो पुरानी दुनिया खत्म होती है, हँ, फिर हम आते हैं नई दुनिया में। तो ये तो तुम बच्चे समझाते हैं कि ऊपर से आते ही रहते हैं। हँ? आना शुरू करते हैं तो पहले अच्छे-अच्छे आएंगे या जो आत्माओं ने अच्छे से पुरुषार्थ नहीं किया वो आएंगे पहले? नहीं। आते ही रहते हैं। तो आते रहते हैं नंबरवार। किस नंबर से? हँ? इस समय के पुरुषार्थ के अनुसार नंबरवार आते हैं।
 
तो अभी परिस्तान तो तुम्हारी बुद्धि में घूमता रहता है। हँ? दिल्ली क्या बन जाएगी? परियों का स्थान। घूमना चाहिए ना क्योंकि तुम पढ़ते ही हो परिस्तान के लिए। हँ? तो ज़रूर बुद्धि में परिस्तान ही घूमना चाहिए ना। सो भी तुम जानते हो कि अभी जो पढ़ते हैं हम वो कितने जन्म के लिए पढ़ते हैं? हँ? 21 जन्म के लिए पढ़ते हैं। तो तुम्हारे पास जो परिस्तान तो सदैव ही रहना चाहिए। खास करके अभी पिछाड़ी में। जबकि तुम ये पढ़ाई पढ़ रहे हो। और ये भी जानते हो कि बाप ने समझाया है कि तुम पढ़ते रहते हो। पढ़ते-पढ़ते तुम परिस्तान में चले जाएंगे। और स्वरग की परी कहा जाता है। बाकि और तो कोई परियां नहीं होती हैं ना बच्ची। परियां कोई होती नहीं हैं दूसरी। शास्त्रों में भी दिखाते हैं ना कि इंद्र का स्वर्ग में राज्य था। वहाँ परियां होती थी। अब बताओ परियां सतयुग, त्रेता में होती हैं क्या? वहाँ परियां कहाँ से आईं ज्ञान-योग के पंखों वाली? हँ? वहाँ देवी-देवताएं ज्ञान-योग वाले होते हैं? किससे योग लगाते हैं? उनमें ज्ञान होता है? नहीं। तो ज्ञान योग के पंखों की वहाँ तो बात ही नहीं।
 
और फिर बाद में तो द्वापुर आ गया, कलहयुग आ गया। हँ? द्वापुर माने दो-दो पुर, चार-चार पुर। हँ? तो कलह-क्लेश बढ़ता जाता है। हाँ। तो फिर ये जो मनुष्य हैं ना जो देवताएं थे वो फिर क्षत्रीय बने, क्षत्रीय से वैश्य बने, वैश्य से कलियुग में शूद्र बन गए। तो ये मनुष्य सिर्फ फिरते जाते हैं। बदलते जाते हैं। अगर सच्ची-सच्ची परियां बनते हो तभी तुम जानते हो कि हम परिस्तान की परियां बन रहे हैं। कैसे? अब देखो, ऐसे बन रहे हैं। इनसे ऊँचा वेश तो दूसरे का कोई का होता ही नहीं है। इतना धनवान, इतना ये। ये जो इस दुनिया में देखते हो, ये तो कुछ भी नहीं है बच्ची। (क्रमशः)
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नोटः यह केवल एक प्रारूप है। उक्त वीसीडी के संपूर्ण मूल पाठ या मूल आडियो, वीडियो के लिए www.adhyatmik-vidyalaya.com देखिये।
[6:41 PM, 10/25/2020] +91 70216 24279: वार्तालाप प्वाइंट        वार्ता न. 360

स्टूडेन्टः- साकारी, आकारी और निराकारी जो तीन स्टेज हैं उनमें पाप और पुण्य कैसे आका जाएगा? कौन-सी स्टेज में पाप और पुण्य होते हैं?

बाबाः- पाप शरीर से होते हैं या बिना शरीर के भी  पाप होते हैं? शरीर पाँच तत्व का पुतला है। पाँच तत्व जब तमोप्रधान बनते हैं तो तमोप्रधान शरीर से पाप भी होते हैं। सतयुग, त्रेतायुग में भी शरीर होता था; परंतु वहाँ पाप नहीं होते थे। क्यों? क्योंकि पाँच तत्व का बना हुआ पुतला सतोप्रधान था। प्रकृति ही सतोप्रधान थी। भाव-स्वभाव, संस्कार को भी प्रकृति कहते हैं। मानवीय भाव-स्वभाव, संस्कार जब सात्विक होता है तब जड़ प्रकृति भी सात्विक होती है। पाप कर्म नहीं हो सकते हैं। जब मानवीय प्रकृति है, तामसी बनती है तब जड़ प्रकृति भी तामसी बन जाती है। फिर पाप कर्म होने लग पड़ते हैं । फिर साकार से पाप कर्म होंगे या निराकार और आकार से पाप कर्म होंगे? आकार से भी अगर होंगे तो भी कोई न कोई शरीर में प्रवेश करके ही पाप कर्म होंगे।
समय - 26.25- 28.18
[6:41 PM, 10/25/2020] +91 70216 24279: हिन्दी व्याख्या

तुमको हार खिलाने वाला ये रावण कौन है ? क्यों उनको जलाते हैं? ये बात भी कोई नहीं जानते। कोई का पुतला जलाते हैं तो क्यों जलाते हैं? कब जलाते हैं?  जब कोई बहुत दुःख देते हैं तो उनका पुतला बैठ बनाए जलाते हैं। ये रावण भी, द्वापर में तुमको बहुत दुःख देता नहीं है तो द्वापर में तुम बैठ पुतला नहीं जलाते हो।  कलियुग में जब बहुत दु:ख देता है तो पुतला जलाते हैं। वास्तव में रावण ना सतयुग में होता है, ना द्वापरयुग-कलियुग में होता है। कहाँ होता है ?  संगमयुग में रावण भी है तो निराकार राम भी है। अभी ये रावण तुमको बहुत दुःख देता है। रावण राज्य है तब ही उनको जलाते हैं। कौन-सी दुनिया की बात है ? ब्राह्मणों  की दुनिया में असली रावण-राज्य है। तो उनके जी को तुम जलाते हो। अभी तुम बच्चे जानते हो कि कैसे रावण खलास होता है। बाप कितनी सहज रीति समझाते हैं और बाप खुद बैठ पढ़ाते हैं। बताते हैं कि रावण कौन है और राम कौन है।
Vcd- 601

[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 2) यज्ञ की शुरुआत कब(सन्) और कहां(स्थान)से हुई?
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: यज्ञ की शुरुआत सन् 1936 में हुई और सिंध हैदराबाद से हुई है और एडवांस पार्टी की शुरुआत 1976 हुई है।
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 3) राम वाली आत्मा पहली बार अव्यक्त मिलन कब मनाती है?  उस दिन को स्मृति दिवस कहा गया है।
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: स्मृति दिवस- 5 दिसंबर 1969
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: निश्चय है तो लिखकर देना चाहिए- " पहले मुख्य बात है मात-पिता की पहचान देनी है।... मुख्य बात है मात-पिता का परिचय दिया। अब समझा है तो लिखो, नहीं तो गोया कुछ नहीं समझा। हड्डी (दिल से) समझाकर फिर लिखवाना चाहिए। बरोबर यह जगतअंबा, जगतपिता है। वह लिख दे बरोबर बाप से वर्षा मिलता है।"... एक ही त्रिमूर्ति चित्र पर पूरा समझाना है। निश्चय करते हो यह तुम्हारा मां- बाप है। इससे वर्षा मिलना है। (मु. 12.3.87 पृ.2 मध्यांत)
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 4) बाप पर निश्चय है उसकी  निशानी क्या है?
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 5) जब से यज्ञ की शुरुआत हुई तब से लेकर अब तक इस यज्ञ का क्या-क्या नाम पड़ा?
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: भट्टी का लक्ष्य है कि खुद बदलकर औरों को बदलना है।... यह है निश्चय की छाप। (अ. वा. 28/9/69 पृ.111)
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 1936 में ओम मंडळी, राजस्व अश्वमेध अविनाशी रूद्र गीता ज्ञान यज्ञ, 
1951 में ब्रम्हाकुमारी ईश्वरीय विश्व विद्यालय, 
1976 में आध्यात्मिक विश्व विद्यालय
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 6) ईश्वरीय पढ़ाई के 4 सब्जेक्ट कौन से हैं?
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: ज्ञान,योग,धारणा,सेवा
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 8) भगवान कहां आते हैं?(देश,राज्य,जिला और गांव)
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: 8) भगवान कहां आते हैं?(देश,राज्य,जिला और गांव)
[6:05 PM, 10/25/2020] +91 97482 15505: भारत में, मगध देश जो की यू पी में आता है। यूपी  मे भी फर्रुखाबाद जिले मे और कंपिला गांव है जहां भगवान आते हैं।





Saturday, October 24, 2020

Thursday, October 22, 2020

 अभी परमात्मा बाप आ करके बताय रहे हैं कि बच्चे, जो भी देवताएँ हैं, उन सबको पुनर्जन्म लेना है। पुनर्जन्म लेते-2 जब नीचे गिर जाते हैं फिर हम शूद्र सो ब्राह्मण बनते हैं, ब्राह्मण सो सुधर करके फिर देवता बनते हैं, बनेंगे। अभी परमपिता परमात्मा ने ब्रह्मा को एडाॅप्ट करके ब्राह्मण बनाया है। भक्तिमार्ग में शास्त्रों की पढ़ाई पढ़ाने वाले मनुष्य गुरु तो ये समझते हैं कि ब्रह्मा ने मुँह से कोई आवाज़ निकाली होगी, ‘हुआ’ किया होगा और मुख से ब्राह्मण निकल पड़े। इसलिए शास्त्रों में लिख दिया कि ब्रह्मा के मुख से ब्राह्मण निकले। सृष्टि का (जो) विराट पुरुष है उसके मुख से ब्राह्मण निकले, भुजाओं से क्षत्रिय निकले, जंघाओं से वैश्य निकले और पाँव से शूद्र निकले। अब यह तो अंधश्रद्धा की बात हो गई। वास्तव में इसका गुह्यार्थ है। मनुष्य सृष्टि या मनुष्य रूपी जो विराट स्वरूप है, वो चार भागों में बँटा हुआ है- जिसको सतयुग, त्रेता, द्वापर और कलियुग कहते हैं।

Vcd- 148

वार्तालाप प्वाइंट        वार्ता न. 334


स्टूडेन्ट- जब सूर्यग्रहण लगता है तब तो खाना भी भक्तिमार्ग में नहीं खाते हैं।


बाबा:- चन्द्रग्रहण में खाते हैं क्या? 


स्टूडेन्ट- दोनों में क्यों नहीं खाते हैं? हजम नहीं होता है या क्यों?

 

बाबा:- वो खाने की बात नहीं है। जब वो लास्ट पेपर होता है, फाइनल पेपर तो उस फाइनल पेपर के समय, जैसे दुनिया में जो फाइनल पेपर होता है उस समय खाना, पीना सारा भूल जाते हैं। ऐसे ही यहाँ भी जब फाइनल पेपर होगा तो जो भी पुरूषार्थी है वो खाना भी भूल जाएँगे। जो योग का भोजन है, जो याद का भोजन है वो उनको भूलेगा।


समय 20.50


मैं आता हूँ तो मुकर्रर रथ में आ करके आदि से लेकर अंत तक तुमको ज्ञान सुनाता हूँ। जब तक जीना है देह-अभिमान में, तब तक पीना है। तो एक का ही, एक को ही कहना है पतित-पावन। ऐसे नहीं कि ब्रह्मा बाबा भी पतित-पावन, कुमारिका दादी भी पतित-पावन, सरस्वती भी पतित-पावन ऐसे कहेंगे? नहीं। और गंगा? गंगा पतित-पावन? नहीं। तो ज़रूर वो एक आवे तब तो पतित से पावन बनावे ना! तो दुनिया वालों से पूछो, उन दुनिया वालों, भक्तिमार्ग वालों की शूटिंग करने वाली उन ब्रह्माकुमार-कुमारियों से पूछो कि वो एक पावन तुमको मिला? जो एक बार सुनाना-समझाना शुरू करता है तो बंद करता ही नहीं, भले गवर्नमेंट उसका नॉन-वैल्यूएबल वारंट निकाल दे तो बंद कर देगा?  नहीं, वो बंद ही नहीं करता है। तो बताया- और वो आवेगा तुम्हारे पास, आवेगा ना! आवेगा तो कोई एक को पतित से पावन बनावेगा या सारी दुनिया को पतित से पावन बनावेगा? सारी दुनिया को पतित-से-पावन बनावेगा।

Vcd- 2900

वार्तालाप प्वाइंट        वार्ता न. 331


स्टूडेन्ट- बाबा, हमको कोर्स कराने को नहीं आता है।


बाबा - कोर्स कराने नहीं आता है। 


स्टूडेन्ट- दिल्ली में एक माता को बोला।


बाबा - लेकिन फोर्स भर दिया कोई में कि नहीं? भट्ठी कराने के लिए कोई में फोर्स भर दिया कि नहीं? भरा ना। तो बस, फोर्स भरना माना कोर्स करना। कोई को ऐसी - ऐसी बातें सुना दी की उसके अंदर फोर्स भर गया कि हम तो अब नया जन्म लेंगे जाके। भट्ठी जरूर करेंगे।

समय - 44.25

Monday, October 19, 2020

Revised on 18-10-2020

17-02-11   ओम शान्ति    अव्यक्त बापदादा    मधुबन

‘‘मन्सा सेवा द्वारा आत्माओं को अंचली देने की सेवा करते बहुतकाल से तीव्र पुरूषार्थ कर एवररेडी रहो तो माला का मणका बन जायेंगे’’

आज स्नेह के सागर अपने स्नेही बच्चों से मिलने आये हैं। बच्चों ने याद किया मेरे बाबा आ जाओ तो बाप कहते हैं मेरे स्नेही बच्चे स्नेह में ऐसा आकर्षण है जो हर बच्चे ने बाप को अपना बनाया और बाप ने हर बच्चे को मेरे बच्चे कहते अपने में समाया। कमाल है बच्चों ने कहा मेरे बाबा तो मेरे शब्द में इतना स्नेह भरा हुआ है जो बाप ने भी कहा मेरे बच्चे स्नेह क्या से क्या बना देता है। हर बच्चे के मस्तक में आज स्नेह की लहरें लहरा रही हैं यह देख बापदादा हर्षित हो रहे हैं। स्नेह ही दिल को अपना बनाने वाला साधन है। तो हर एक बच्चे के अन्दर आज स्नेह की लहरें लहराती हुई देख-देख बापदादा भी खुश हो रहे हैं।
अभी-अभी 5 मिनट के लिए एक ड्रिल बापदादा सबको करा रहे हैं। अपने मन्सा शक्ति से सृष्टि में जो भी आपके भक्त वा अनेक दु:खी अशान्त आत्मायें आपको याद कर रही हैं हे हमारे पूर्वज हमें थोड़े समय के लिए भी शान्ति दे दो जरा सा सुख की अंचली दे दो बचाओ ऐसी आत्माओं को यहाँ बैठे हुए इमर्ज करो आवाज सुनने आ रहा है! बचाओ बचाओ तो ऐसी आत्माओं को अपने मन्सा शक्ति द्वारा सुख शान्ति की किरणें पहुंचाओ। यह मन्सा सेवा सारे दिन में बार-बार करते रहो क्योंकि बाप के साथ आप बच्चे भी विश्व सेवक हो। सारा दिन वाणी द्वारा जैसे सेवा के निमित्त बनते हो ऐसे ही बीच-बीच में मन्सा सेवा का भी अभ्यास करते चलो। इसमें आपका अपना भी फायदा है क्योंकि अगर आपका मन सदा सेवा में बिजी रहेगा तो आपके पास जो बीच-बीच में माया फालतू संकल्प वा व्यर्थ संकल्प करती है उससे बच जायेंगे। मेहनत नहीं करनी पड़ेगी। अभी बापदादा पूछते हैं कैसे हो? तो क्या जवाब देते हो? पुरूषार्थ है लेकिन कभी कभी...! सदा का पुरूषार्थ नहीं चल रहा है। तो बापदादा अभी सभी बच्चों का यह रिकार्ड देखने चाहते हैं यह कभी-कभी का शब्द समाप्त हो जाए। क्या यह हो सकता है कभी-कभी समाप्त हो जाये? समय पर तैयार हो जायेंगे? हो रहे हैं होना ही है.. इसके बजाए अभी एवररेडी बन सकते हैं? क्यों? एवररेडी रहने का अभ्यास मायाजीत मनजीत जगतजीत यह संस्कार भी बहुत समय से बनायेंगे तब अन्त समय भी यह बहुतकाल का अभ्यास विजयी बनाकर आपको विशेष माला का मणका बनायेगी। पास विद ऑनर बनेंगे। पास नहीं पास विद ऑनर। तो बोलो यह हिम्मत है ना! पास विद ऑनर तो होना है ना? जो द्वापर से लेके अब तक पूज्य बनते हैं अर्थात् माला के मणके बनते हैं तो अपने को माला के मणके बनाने का शुद्ध संकल्प है ना!
बापदादा भी रोज अमृतवेले अपने माला के मणकों को देखते और विशेष मिलन मनाते हैं। तो आप सभी अपने को माला के मणकों में समझते हो। है तो दूसरी माला भी 16 हजार की लेकिन फिर भी सेकण्ड माला हो गई। विशेष माला जो गायन और पूज्यनीय योग्य बनती है वह पहली माला है। तो आज बापदादा उन मणकों को देख रहे थे क्योंकि ब्रह्मा बाप के साथ विशेष राज्य अधिकारी साथी वही बनते हैं। तो आज ब्रह्मा बाप अपने अब के तीव्र पुरूषार्थी और भविष्य के राज्य अधिकारी तख्त पर तो दो ही बैठते हैं लेकिन राज्य के साथी उन्हों की पहली माला है। तो अपने को चेक किया है। बापदादा के साथ तो चलेंगे क्योंकि अभी आप सबकी रिटर्न जरनी है। जब जाना ही है बाप के साथ जाना है अकेला नहीं जाना है। तो साथ जाने वाले नजदीक के मणके कौन होंगे? जो बहुतकाल के तीव्र पुरूषार्थी होंगे। पुरूषार्थी नहीं कब-कब वाले नहीं। बहुतकाल के बाप समान ही राज्य अधिकारी बनेंगे। तो क्या समझते हो? तीव्र पुरूषार्थ है? जो समझते हैं मैं पुरूषार्थी की लाइन में हूँ वह हाथ उठायेंगे। तीव्र पुरूषार्थी बड़ा हाथ उठाओ छोटा हाथ उठाते हैं। अच्छा बहुत उठा रहे हैं। फिर लम्बा हाथ उठाओ ऐसे नहीं। अच्छा।
बापदादा तो रोज बच्चों का चार्ट देखते हैं। मैजारिटी तीव्र पुरूषार्थी भी हैं लेकिन कभी-कभी का शब्द भी साथ में लगा देते हैं। लेकिन बाप क्यों कह रहे हैं? अटेन्शन प्लीज सूक्ष्म संकल्प में भी हलचल नहीं हो। अचल अडोल शुद्ध संकल्पधारी बहुत समय से बनना ही है। कई बच्चे बहुत मीठी-मीठी रूहरिहान करते हैं कहते हैं बाबा हम तैयार हो ही जायेंगे। क्योंकि समय जितना नजदीक आयेगा हालतें हलचल में आयेंगी तो वैराग्य तो आटोमेटिकली आ जायेगा। लेकिन आपका टीचर कौन हुआ? समय या बाप? समय तो आपकी रचना है। तो बाप अभी इशारा दे रहा है कि बहुत समय का तीव्र पुरूषार्थ अन्त में पास विद ऑनर बनायेगा। पास तो सभी होंगे लेकिन पास विद ऑनर बनने वाला बहुत समय का लगातार तीव्र पुरूषार्थ करने वाला आवश्यक है। इसलिए आज की तारीख नोट कर दो अगर अब भी कभी-कभी समाथिंग हो जायेंगे कर ही लेंगे यह शब्द आगे भी चलते रहे... बाप का प्यार तो सदा ही है। लास्ट दाने पर भी बाप का प्यार है। क्यों? दिल से मेरा बाबा तो कहा आज की बड़ीब ड़ी आत्मायें मेरा बाबा नहीं कहती लेकिन वह मेरा बाबा तो मानता है इसलिए बाप का प्यार तो उससे भी है। बच्चों से प्यार तो बाप का सदा ही है लास्ट तक भी है लास्ट वाले तक भी है। स्नेह ने ही आपको बाप का बनाया है। बापदादा ने यह भी कहा है कि स्नेह मैजारिटी बच्चों का है और रहेगा लेकिन सिर्फ स्नेह नहीं शक्ति भी चाहिए। तीव्र पुरूषार्थ भी चाहिए। इसलिए अब तो शिवरात्रि भी आई कि आई बाप के अवतरण के साथ बच्चों का भी अवतरण है ही। तो बापदादा चाहते हैं कि इस शिवरात्रि पर हर बच्चा अपने को साधारण पुरूषार्थ के बजाए तीव्र पुरूषार्थी बनाने का बनने का संकल्प करे। हो सकता है? शिवरात्रि पर दृढ़ संकल्प अपने आपसे करे। लिखे नहीं क्लास में बताने की भी जरूरत नहीं लेकिन बाप से दिल में संकल्प करे कि शिवरात्रि पर हम कभी-कभी शब्द अपने पुरूषार्थ के डिकस्नरी से निकाल देंगे। हो सकता है? जो समझते हैं क्या बड़ी बात है। सोचा और हुआ हिम्मत रखते हैं वह हाथ उठाओ। अच्छा। खुश कर दिया।
बापदादा का तो बच्चों में फेथ है ना। तो अभी से ही पदम पदमगुणा ऐसे बच्चों को मुबारक दे रहे हैं। वाह बच्चे वाह! हिम्मत वाले हैं। आपकी हिम्मत और बाप की मदद तो होगी ही। अभी एक बात करना। जो अपने मन को बिजी रखने के लिए जैसे पहले बाप ने कहा सेकण्ड में स्टाप बिन्दू हूँ बिन्दू लगाना है और सबको बिन्दू रूप में देखना है। जब देखेंगे ही बिन्दू तो और कोई भी संकल्प नहीं चलेगा। मन्सा सेवा का अटेन्शन रखना इतनी दु:खी आत्माओं को चिल्ला रही हैं उन्हों को किरणें देने की सेवा में भी एकस्ट्रा मन को लगाना। मन्सा सेवा बहुत श्रेष्ठ सेवा है। दु:खियों का भी फायदा और आपका अपना भी फायदा। डबल फायदा है। जैसे वाचा से सेवा करते हो और सेवा बढ़ती भी जाती है दिल से करते हो संख्या भी बढ़ती जाती है सेन्टर भी बढ़ते जाते हैं वाचा की सेवा मैजारिटी की ठीक है। सभी की नहीं मैजारिटी की। ऐसे अभी मन से विशेष आत्माओं को अंचली देने की सेवा भी करते रहो। मन को फ्री नहीं छोड़ो। कोई न कोई सेवा में मन से शक्तियां देने की मुख से वाणी की सेवा कर्म में गुणों से सेवा सम्बन्ध सम्पर्क में खुशी देने की सेवा इस भिन्न-भिन्न सेवाओं में मन को बिजी रखो क्योंकि सारे विश्व में रिचेस्ट आत्मायें कौन सी हैं? आप ही हो ना! कितने खज़ाने मिले हैं? तो हर खज़ाने से सेवा करो। खज़ाने को जितना सेवा में लगायेंगे उतने खज़ाने बढ़ते जायेंगे इसलिए अभी जैसे स्व की सेवा का अटेन्शन देते हो ऐसे अपने दु:खी आत्मायें अपने भक्तों की मन्सा द्वारा किरणें देने की सेवा भी अटेन्शन देके सारे दिन में करो बहुत चिल्लाते हैं आपको सुनने नहीं आता। मैजारिटी हर घर में कोई न कोई दु:ख का कारण है। ऐसे दु:खियों को सुख देने वाला कौन? बोलो कौन है? आप ही तो हो। तो इस मन्सा सेवा को सारे दिन में चेक करो कितना समय जैसे स्व के प्रति देते हो वैसे मन्सा सेवा के प्रति कितना समय दिया? रहमदिल हो ना। तो दु:खियों पर रहम करो। आपका गीत भी है ना ओ माँ बाप दु:खियों पर रहम करो। बापदादा को बहुत आवाज सुनने पड़ते हैं। आप लोगों को कम सुनाई देते हैं लेकिन अभी सुनो। कहाँ जायेंगे वह। आपके ही तो भाई बहिन हैं। तो अपना भी फायदा करो मन को बिजी रखो और दु:खियों का दु:ख हरण करो। चिल्लाते हैं दिल चिल्लाती है। बापदादा तो सुनते हैं तो बच्चों को याद करते हैं ओ मेरे लाडले बच्चे सिकीलधे बच्चे अब रहमदिल धारण करो। अपने ब्राह्मणों में भी एक दो के सहयोगी बनो। चाहे कैसा भी संस्कार है लेकिन आपका काम क्या है? संस्कार से टक्कर खाना या उनको भी संस्कार के टक्कर से छुड़ाना। आपका भी टाइटल है ना दु:ख हर्ता सुख कर्ता। बाप के साथी हो ना। बाप के साथी क्या संकल्प किया है? इस विश्व को दु:ख अशान्ति से बदल सुख शान्ति स्थापन करनी ही है। करनी है ना! हाथ उठाओ। करनी है? कि सिर्फ देखना है हो रहा है लेकिन अभी बदलना है। चाहे ब्राह्मण आत्मा हो देखते नहीं रहो यह कर रहे हैं लेकिन उन्हों को भी वाणी और मन्सा संकल्प द्वारा परिवर्तन करो करना नहीं चाहिए! बापदादा सुनता रहता है बापदादा तक बात दे दी जब बात दे दी तो खुद बाप के डायरेक्शन पर चलो जिम्मेवार बापदादा है उनके साथी मुरब्बी बच्चे निमित्त बने हुए बच्चे। तो सदा अपने मन को व्यर्थ संकल्पों के बजाए अब दु:खी आत्माओं को चाहे ब्राह्मण हैं या कोई भी हैं ड्रिस्टर्ब आत्मा को सहयोग दो। सहयोगी बनो। अच्छा।
अभी आज जो पहले बारी आये हैं वह उठो। सभी ने देखा। बापदादा पहले बारी आने वालों का सभा के बीच बर्थ डे मना रहे हैं। फिर भी चाहे कनेक्शन में भी हो लेकिन बाप से मिलन मनाने आये हैं तो यहाँ ब्राह्मण परिवार में बर्थ डे मना रहे हैं। बापदादा को खुशी है जो पहले से कनेक्शन में हैं उनके लिए नहीं कहते लेकिन मधुबन में पहले बारी आये हैं इसके लिए ब्राह्मणों के बीच उन्हों की सेरीमनी कर रहे हैं। इतने सभी ब्राह्मणों की मुबारक मिल रही है। लेकिन आगे के लिए यह सोचना कि स्थापना के समय के बाद तो देरी से यहाँ पहुंचे हैं ना इसलिए बाकी जो समय बचा हुआ है उसमें तीव्र पुरूषार्थ कर समय को व्यर्थ नहीं करना लेकिन एक सेकण्ड में 10 मिनट का काम करना। अटेन्शन देना। अपना पुरूषार्थ तीव्र कर जितना आगे बढ़ने चाहो उतना बढ़ सकते हो। यह आप सभी को सभी ब्राह्मणों की तरफ से बाप की तरफ शुभ भावना शुभ कामना है। अच्छा।
सेवा का टर्न यू.पी. बनारस पश्चिम नेपाल का है:- अच्छा जो पहले बारी आये हैं वह बैठ जाओ। अच्छा। यू.पी. की टीचर्स आगे-आगे खड़ी हैं। अच्छा है। यू.पी. में चारों ओर के भगत बहुत आते हैं। तो यू.पी. वालों को जो भी हो सके भक्तों को सन्देश जरूर दो। सन्देश देना आपका काम है बाकी भाग्य बनाना कितना भाग्य बनाते हैं वह उनके हाथ में है लेकिन आपको उल्हना नहीं दें कि हमको आपने हमारा बाप आया और हमारा बाप वर्सा देने आये हैं यह सन्देश नहीं दिया। हमको कुछ तो वर्सा ले लेते। इसीलिए यू.पी. वालों को जब भी ऐसे करते भी हो बाप के पास समाचार आते हैं लेकिन फिर भी जहाँ तक हो सकता है वहाँ तक सन्देश देने का पाठ आप लोगों के लिए सहज है। और यू.पी. से ब्रह्मा बाप का जगत अम्बा का बहुत प्यार रहा है। जितना ब्रह्मा बाबा यू.पी. में आये हैं इतना बाम्बे में भी आये हैं लेकिन यू.पी. में भी आये हैं। तो जिस जगह ब्रह्मा बाप के पांव पड़े वह स्थान कितना भाग्यवान है। लखनऊ और कानपुर दोनों ही इस भाग्य के अधिकारी बने हैं। बाम्बे भी बना है लेकिन अभी यू.पी. का टर्न है। डायरेक्ट माँ और बाप के शिक्षा की बूंदे यू.पी. में पड़ी हैं। अभी यू.पी. को आगे क्या करना है? वाणी द्वारा मेलों में सेवा तो करते हो लेकिन अभी के समय अनुसार जो बापदादा कहता आया है पहले भी कि वारिस और नामीग्रामी माइक नामीग्रामी का अर्थ यह है कि उनके कहने का प्रभाव सुनने वालों का पड़ने वाला हो ऐसे माइक तैयार करो। ऐसे वारिसों का ग्रुप हर सेन्टर कितने सेन्टर हैं यू.पी. में बहुत हैं ना। तो इतने वारिस निकालने चाहिए। हिसाब करना कितने सेन्टर हैं और कितने वारिस बने हैं। और जितने बनने चाहिए उतने बने हैं या बनाने हैं। अगर बनाने हैं तो समय पर कोई भरोसा नहीं है जल्दी से जल्दी वारिस और माइक जिनकी आवाज से अनेक आत्माओं के भाग्य की रेखा खुल जाए क्योंकि आपने तो बहुत सेवा की जो पुराने हैं उन्होंने तो बहुत सेवा की। अभी सेवा कराओ। करने वाले तैयार करो। कर सकते हैं ना! हाथ उठाओ टीचर्स। अच्छा। टीचर्स भी बहुत हैं। तो इतने ही तैयार करो। हर एक सेन्टर चाहे छोटा चाहे बड़ा सेन्टर की लिस्ट में है उनको जरूर अपना सबूत देना है क्योंकि समय पर कोई भरोसा नहीं है। कब भी क्या भी हो सकता है। इसलिए बापदादा सभी जो भी जोन आते हैं नहीं भी आये हैं सभी जोन को यही कहते हैं कि अभी आगे बढ़ो। क्लासेज तो चलते रहते हैं संख्या भी बढ़ती रहती है लेकिन अभी निमित्त बनने वाले बनाओ और बनाने के लिए बापदादा ने देखा है हर जोन में ऐसी आत्मायें हैं जो निमित्त बन सकती हैं। तो यू.पी. एक तो भक्तों का कल्याण करो भक्त भक्त कहलाने वाले भले थोड़े हैं लेकिन भक्त भी हैं। उन्हों को भक्ति का फल दिलाओ। बहुत मेहनत करते हैं। बाकी अच्छा है। हर एक जोन बापदादा ने देखा कि अपने पुरूषार्थ में बढ़ भी रहे हैं लेकिन अभी भी बढ़ने की मार्जिन हैं। अच्छी- अच्छी बाप की लाडली बच्चियां हैं डायरेक्ट ब्रह्मा बाप की पालना लेने वाली हैं। कर रहे हो ऐसे नहीं नहीं कर रहे हो। कर भी रहे हो लेकिन थोड़ी और स्पीड बढ़ाओ। अच्छा सेवा का टर्न है यज्ञ सेवा अर्थात् अपने भाग्य बनाने की सेवा। क्योंकि आपके पास कितने भी स्टूडेन्ट आवें लेकिन यज्ञ में कितने इकठ्ठे होते हैं। इतने ब्राह्मणों की यज्ञ सेवा करना पुण्य कितना है। तो सेवा करने आते हो लेकिन वास्तव में कहें पुण्य जमा करने आते हो। बापदादा को खुशी होती है कि यह भी चांस पुण्य बनाने का साधन है। तो सेवा अच्छी कर रहे हो ना। वैसे सभी जोन अच्छी करते हैं बापदादा के पास कोई रिपोर्ट नहीं आती है। अच्छे हो और अच्छी सेवा करते हो। सहज हो जाता है। ठीक करते हैं ना सेवा। सभी दादियां भी आप लोगों को मुबारक देती हैं।
पाण्डव भी कितने आते हैं। पाण्डव भी कम नहीं हैं। कई ऐसी सेवायें हैं जो पाण्डव ही कर सकते हैं। इसलिए पाण्डवों को भी बापदादा और सर्व मधुबन निवासी मुबारक दे रहे हैं। अच्छा।
10 विंग्स आई हैं:- अच्छा खड़े रहो। आपके झण्डे और बोर्ड बापदादा ने देखा इसलिए नीचे कर लो। बापदादा ने देखा है कि जो भी वर्ग आये हैं। जब से वर्ग बने हैं तब से सेवा का उमंग हर एक वर्ग में अच्छा है। हर एक ने अपनी जिम्मेवारी समझी है कि हमको करना ही है। इसलिए हर एक वर्ग सेवा करके अपनी संख्या सेन्टरों पर बढ़ा रहे हैं। रिपोर्ट तो बाप के पास आती ही हैं। अभी एक बात कि जो भी वर्ग हैं वह विशेष आत्मायें जो निमित्त बनी हैं जिसको विशेष निमित्त आत्मायें कहते हैं उसकी सेवा करके हर जोन में एक दिन स्थान फिक्स करके सब तरफ के जो निमित्त आत्मायें निकली हैं उनका संगठन करो। पहला जोन में संगठन करो फिर मधुबन में देखेंगे। लेकिन पहले जिस जोन के ज्यादा सेवाधारी करने वाले हैं उस जोन में सब जोन के दिन मुकरर करके विशेष आत्माओं का मिलन करो। एक दो को देख करके भी उत्साह आता है यह भी करते हैं हम भी करते हैं और सेवा को बढ़ायें। तो उमंग उत्साह दिलाने के लिए पहले जिस जोन में विशेष वर्ग की सेवा हो वहाँ हर कोई जहाँ भी राय करके फिक्स करो वहाँ पहले इकठ्ठे करो फिर मधुबन में बुलायेंगे। यह नहीं किया है। तो पता पड़े कितने माइक तैयार हुए हैं। कितने सहयोगी तैयार हुए हैं। और कितने आपस में एक दो को मदद कर सकते हैं। एक जोन वर्ग दूसरे वर्ग में भी सहयोगी बन सकता है। तो उमंग आयेगा एक दो को देख करके समाचार सुनते उमंग आयेगा। मधुबन के पहले वहाँ ही इकठ्ठे करो फिर देखेंगे। ठीक है। यह ठीक लगता है हाथ उठाओ। आप सभी को इकठ्ठा उठाया है बापदादा हर वर्ग को अलग-अलग मुबारक दे रहे हैं। बापदादा खुश है आपके उमंग उत्साह को देख बापदादा खुश है। ठीक है। अच्छा।
(हर वर्ग वालों से बापदादा ने हाथ उठवाये)
बिजनेस विंग:- बापदादा ने आपको देखा भी आपको और मुबारक भी दी और सर्विस का प्लैन भी दिया तो आप सबको स्पेशल मुबारक हो।
एज्युकेशन विंग:- तो खास आप लोगों को भी बापदादा उमंग उत्साह की मिठाई खिला रहा है।
यूथ विंग:- यूथ ऐसा ग्रुप तैयार करो यह बहिनें भी हैं ना। ऐसा ग्रुप तैयार करो जो कुछ समय से या जब से आये हैं तब से जो मर्यादायें हैं उसमें कायदे प्रमाण चले हैं कितने मर्यादाओं पर चले हैं वह एक-एक का रिकार्ड हो। ऐसा छोटा ग्रुप बनाओ जो सरकार के सामने उन्हों को हाजिर करें कि यह यूथ मर्यादा पूर्वक हैं। तो सेवा हो जाए।
धार्मिक विंग पोलिटीशियन विंग:- अच्छा यह भी आये हैं।
स्पोर्टस विंग:- आपने सुना अभी क्या करना है? तो वह करना। फिर बापदादा इसकी रिजल्ट देख फिर मधुबन में बुलायेंगे। बाकी सभी वर्ग बापदादा ने सुनाया कि अच्छी सेवा में आगे बढ़ रहा है और प्लैन अच्छे-अच्छे बना रहे हैं उसकी मुबारक हो।
महिला वर्ग:- महिला वर्ग में कितने कमल पुष्प घर गृहस्थ में रहते कमल पुष्प समान रहने वाले हैं वह कितने निकाले हैं शुरू से लेके। सेन्टर पर कितनी महिलायें सेवा से निकली हैं वह लिस्ट निकाली है? इसकी हेड कौन है? (चक्रधारी बहन) अच्छा। कितने परिवार निकले वह हर जोन से लिस्ट लेकर फिर बताना जरूर क्योंकि लोगों में तो अभी तक यही है कि पता नहीं घर छोड़ना पड़ेगा। अभी पहले से कम है लेकिन कहाँ-कहाँ अभी भी है। तो कितने सेवा से बने हैं उसकी रिजल्ट निकालना क्योंकि गवर्मेन्ट में हर एक वर्ग की अलग-अलग डिपार्टमेन्ट होती है तो वह पूछते भी हैं कि आपके वर्ग ने क्या रिजल्ट निकाली। इसलिए यह रिजल्ट होनी चाहिए निकालनी चाहिए। हर एक जोन अपने-अपने सेन्टर्स में जो भी निकले हैं वह इन्हों को इकठ्ठा करके दे तो इन्हों को मदद मिल जाए। ठीक है।
ग्राम विकास विंग:- ग्राम विकास सबसे अच्छी सेवा है क्योंकि ग्राम वाले इतना ऐश आराम में नहीं होते। अपने काम में ज्यादा बिजी रहते हैं तो आप लोग उन्हों को विशेष खुशी का अनुभव कराओ। भाषण तो करते ही हैं लेकिन ग्राम वाले अनुभव करें तो हमें जो भी ग्राम सेवा में हैं उन्होंने खुशी बहुत दी है। हम सुखी भी रहते और खुश भी रहते ऐसा रिकार्ड निकाले कितने गांव में सर्विस की उसमें कितनों ने अनुभव किया। क्योंकि अनुभव जो करते हैं वह भूलते नहीं हैं। अनुभव करो और कराओ तो यह रिजल्ट निकालना कितने गांव में कितनी आत्मायें खुश हुई और कनेक्शन में रहती हैं। अच्छा है।
कल्चरल विंग:- कल्चरल वाले अपने कल्चरल वालों की सेवा तो अच्छी कर रहे हैं। बापदादा ने देखा कि कई कल्चरल वाली आत्मायें यज्ञ के सहयोग में आई हैं और अपना सेवा का पार्ट भी बजा रही हैं। दूसरे लोगों को भी अपने अनुभवों से लाते रहते हैं। सेवा में आगे बढ़ रहे हैं। तो बहुत अच्छा है। जो बाप ने कहा था स्थापना के समय तो आपके पास कल्चरल वाले भी अनुभवी बन औरों को अनुभव सुनायेंगे। तो वह कर भी रहे हो और आगे भी करते रहना। जो आवाज फैल जाए तो ब्रह्माकुमार-कुमारियां सेवा कर कल्चरल वालों को कैरेक्टर बिल्डिंग बनाने का भी अनुभवी बनाते हैं। अच्छे-अच्छे आ रहे हैं जो आगे बढ़ रहे हैं और दूसरों को भी अनुभव सुनाके आगे बढ़ा रहे हैं इसलिए बढ़ते रहो बढ़ाते रहो।
स्पार्क:- स्पार्क विंग भी अपना-अपना कार्य कर रही है। बापदादा ने देखा कि हर एक अपने वर्ग की सेवा में आत्माओं को अनुभवी बना रहे हैं उनको अच्छे-अच्छे विचारों से उनकी बुद्धि बहुत अच्छी बना रहे हैं और धारणा भी लोगों को कराते हैं इसलिए हर एक विंग के लिए बाबा ने कहा तो सेवा कर रहे हो साथी बना रहे हो और और अधिक साथी बनाके ऐसा ग्रुप तैयार करो संगठन तैयार करो जो संगठन गवर्मेन्ट के सामने जाए और उनको अपना कार्य और रिजल्ट सुनाये। हर एक वर्ग की अपने-अपने गवर्मेन्ट की शाखा है तो उन्हों की भी सेवा हो और लोगों की भी सेवा हो।
अच्छा –
डबल विदेशी भाई बहिनें - 80 देशों के 750 भाई बहिनें हैं:- विदेशियों का बापदादा ने इस समय के प्रोग्रामस देखे तो बहुत एक एक ग्रुप से प्यार से मेहनत बहुत अच्छी की। और मधुबन के वायुमण्डल में कईयों के अनुभव भी अच्छे अपने तीव्र पुरूषार्थ की उमंग-उत्साह वाले थे इसलिए बापदादा ने इस समय का ग्रुप का जो ट्रेनिंग देने वाले और ट्रेनिंग लेने वाले दोनों में उमंग-उत्साह देखा और एक समय में कितने लाभ लिये। एक परिवार का मिलना और कहाँ भी इतने ग्रुप मिले कोई स्थान नहीं मधुबन के सिवाए। तो इन्होंने अच्छी चतुराई की मधुबन में ही प्रोग्राम बना दिया। तो बापदादा खुश है कईयों के परिवर्तन के अनुभव भी बापदादा ने सुनें। यहाँ की धरनी में जो भी कुछ शिक्षा मिलती है उनकी महसूसता जल्दी हो जाती है। वायुमण्डल है ना। तो वायुमण्डल भी मिला संगठन भी मिला कितने समय के बाद एक-एक ग्रुप मिलते हैं सारे। रहना संग बापदादा और अपनी रिफ्रेशमेंट तो यह बापदादा को बहुत अच्छा लगा। लेकिन जितने यहाँ फायदे मिले हैं लाभ मिले हैं उतना ही प्रैक्टिकल में करके आप निमित्त बनो औरों को भी उमंग-उत्साह बढ़ाने के लिए। बन सकते हो क्योंकि प्लैन जो बनाये हैं बापदादा ने थोड़े में सुने हैं अच्छे लगे हैं। करने का तरीक भी अच्छा है। तो बाप को खुशी है कि डबल फारेनर्स अच्छी अपने ऊपर भी अटेन्शन दे रहे हैं और अब तो एक चन्दन का वृक्ष हो गया है। भिन्न-भिन्न देश की टालियां मधुबन में आई लेकिन यहाँ आने से एक चन्दन का वृक्ष बन गये। तो बाप ने देखा जो भी आये हैं उनका ब्राह्मण कलचर बहुत अच्छा बना है चल रहा है और बनता रहेगा यह भी निश्चय है और निश्चित है। ड्रामा में भी निश्चित है ओम् शान्ति। जो मुख्य टीचर्स हैं उन्हों को बापदादा स्पेशल मुबारक दे रहे हैं। तो मुबारक हो मुबारक हो मुबारक हो।
आज मधुबन के जो भी हैं ऊपर वाले नीचे वाले और यह जो बाहर रहते हैं लेकिन मधुबन में पढ़ाई पढ़ते हैं वह सब उठो कितने आये हैं:-
(राजू भाई को मुरली टाइप करते हुए देखकर) आप भी उठो ना। इतना काम करते हैं देखो बड़े में बड़ी सेवा तो यह करते हैं सभी ब्राह्मणों को फौरन पहुंच जाता है। आपको मुबारक हो विशेष मुबारक हो।
मधुबन वाले अगर नहीं होते तो आपकी मेहमान निवाजी कौन करता। आराम से आते हो खाते हो पीते हो रिफ्रेश होते हो तो मधुबन वालों के लिए ताली बजाओ। बापदादा जानते हैं कि जगह कम होने के कारण मधुबन वालों को थोड़ा दूर बैठकर सुनना पड़ता है। यह भी सेवा है मधुबन वालों की यह भी सेवा है। दूसरों को सुख देना सुखदाता हो गये ना। तो मधुबन वालों का काम है सुख देना और सुख लेना। क्योंकि जो भी आते हैं उन्हों के अनुभवों से आप अनुभव सुनाते हो उस अनुभव से एक दो को फायदा हो जाता है। कई फायदे होते हैं लेकिन टाइम कम होने के कारण सुनाते कम हैं। लेकिन मधुबन वालों का टाइटल क्या हुआ? सुख देना और सुख लेना। सुखदाता के बच्चे फालो फादर करने वाले हैं। अच्छा-
मिलन तो सबका हुआ। बहुत तैयारी करके आते हैं। हर वर्ग बहुत तैयारी करके आते हैं बापदादा जानते हैं लेकिन टाइम को भी देखना पड़ता है। तो सभी को अभी तीव्र पुरूषार्थी बनने की एडवांस में बहुत बहुत पदम गुणा मुबारक पहले से दे रहे हैं। अभी शिव रात्रि पर चाहे यहाँ आने वाले चाहे घरों में बैठकर सेन्टर पर बैठ सुनने वाले या मुरली द्वारा सुनने वाले सभी मुरली तो सुनते होंगे ना। इस बारी जो आये हैं उसमें मुरली रेग्युलर जो सुनते हैं कोई हैं जो मुरली नहीं सुनते वह हाथ उठाओ। कोई नहीं। अच्छा। वह उठो जो नहीं पढ़ते या सुनते हैं। थोड़े हैं। कोई बात नहीं लेकिन अभी बाकी जो भी समय मिला है उसमें बाप का महावाक्य परमधाम से बापदादा आता है सूक्ष्मवतन से ब्रह्मा बाबा आता है और आके महावाक्य उच्चारण करते हैं इसलिए मुरली कभी भी एक दिन भी मिस नहीं करना। अपना बापदादा का दिलतख्त छूट जायेगा। इसलिए जो भी मुरली मिस करते हैं वह समझें हम तीन तख्त के मालिक नहीं दो तख्त के मालिक भी यथाशक्ति बनेंगे। इसलिए मुरली मुरली मुरली। क्योंकि मुरली में रोज के डायरेक्शन होते हैं चार ही सबजेक्ट के डायरेक्शन होते हैं तो रोज के डायरेक्शन लेने हैं ना। तो जो भी मिस करता हो कारणे-अकारणे वह अपना प्रोग्राम बनावे कि कैसे मुरली सुनें। कोई न कोई सैलवेशन बनायें। आजकल साइंस के साधन आपके लिए निकले हैं। ब्रह्मा बाप में प्रवेशता के 100 साल पहले यह साइंस निकली है आपके काम में भी आनी है इसलिए उसको यूज करो फायदा उठाओ।
अच्छा सामने बैठे हुए या कहाँ भी सुनने वाले बच्चों को बापदादा की दिल व जान सिक व प्रेम से यादप्यार और नमस्ते।
दादियों से:- (दादी जानकी जी से) सेवा दिल से करती हो विशेष सेवा करती हो। जहाँ दिल होती है ना वहाँ अनुभव होता है। ऊपर ऊपर से वाणी चलाई तो अनुभव दिल से लगना वह कम होता है। आपकी सेवा का फल भी निकलता है। तो यह वरदान है। (गुल्जार दादी बहुत अच्छी है) अच्छे तो हर एक हैं। यह सब अच्छे हैं।
मोहिनी बहन और उनके डाक्टर से:- बापदादा ने सुना। सोचो कम। हंसती हैं लेकिन सोचती भी है। चेहरा तो लाल है लेकिन सोचना थोड़ा-थोड़ा यह तबियत को इफेक्ट करता है। सिर्फ सोचो बाबा अच्छा कर लेगा। अभी डबल डाक्टर बनो। ासिंगल तो बहुत हैं। डबल डाक्टर। प्रेम तो है डबल डाक्टर बनें। आप कार्ड छपाते हो ना उसके पीछे खाली होता है तो आप मन की भी बीमारी का लिखके और उसमें एड्रेस लिखो जो सेन्टर नजदीक हो वहाँ मेडीटेशन वरके मन को दुरूस्त करो। क्योंकि डाक्टर का नाम पढ़के भी उन्हों को आता है कि डाक्टर कहता है तो करना है। तो आप घर बैठे सेवा कर सकते हो डबल डाक्टर बन जायेंगे। आप नहीं करेंगे करायेंगे दूसरे। तो बहुत सहज है। जो भी आवे एड्रेस पूछें तो दे देना। कार्ड छपाके रख दो ऐसे डबल डाक्टर। दवा और दुआ दोनों से अभी फर्क पड़ेगा। दोनों ही मिलेंगी बाबा की तरफ से।
यह डबल डाक्टर बनने की सौगात।
परदादी से:- आपकी विशेषता है जो शक्ल सदा हंसमुख रहती है। (बाबा की बेटी हूँ) डबल बेटी हो। लौकिक भी और अलौकिक भी पारलौकिक भी। तीनों हो।
(तीनों भाईयों से) आपस में तीनों मिलते रहते हो? (थोड़ा-थोड़ा) थोड़ा-थोड़ा नहीं। फोन में भी मुलाकात कर सकते हो। फारेन में यह अच्छा है कोई भी कार्य फोन में बहुत अच्छा मीटिंग पूरी हो जाती है। तो उन्हों की विधि देखो आपस में मिलते रहो। फोन में भी मीटिंग कर सकते हो।
भूपाल भाई से:- चारों तरफ यज्ञ की ठीक रखवाली हो रही है। ध्यान रखो चक्कर लगाते रहो।
इन्दौर के वी.आई पीज से:- अपने घर में आने में मजा आता है ना। अपने घर में आये हो दूसरी जगह नहीं आये हो। यह परमात्मा का घर है तो बच्चे का भी घर हुआ ना। तो अपने घर में आये हो। हमेशा अपने को बेफिकर बादशाह बनाके रखना। फिकर नहीं करना बेफिकर बादशाह। काम तो होते ही रहेंगे लेकिन खुद को बेफिकर बादशाह बनाना। सवेरे उठकर बाप को याद करेंगे ना तो सारा दिन अच्छा बीतेगा। उठते आंख खुलते मेरा बाबा याद करना।
धार्मिक नेताओं से:- आप लोगों को देख औरों में भी उमंग आयेगा। क्यों इन्हों को क्या मिला। और आपका अनुभव अनेकों को अनुभव करायेगा। निमित्त बनेंगे। (ट्रिनीडेड के ब्रह्मदेव स्वामी जी गीता का भगवान सिद्ध करेंगे) अभी मुरली पढ़ना।
सोलार प्रोजेक्ट का नक्शा बापदादा को दिखाया:- निश्चयबुद्धि होकर करो। सभी मिलकर एक ही संकल्प करो होना ही है। (रमेश भाई से) आपको कहा था ना कि यह सभी ब्राह्मणों को पता हो। आर्टिकल सब नहीं पढ़ते हैं।

Sunday, October 18, 2020

अपन को शरीर से न्यारा समझना है। इसको ही जीते जी मरना कहा जाता है। तुम इस शरीर में जन्म-जन्मान्तर रहते आए हो तो तुमको ये हेर पड़ जाती है। मैं तो इसमें आता ही हूँ टेम्पररी । तो मर कर चलना अर्थात अपन को आत्मा समझकर चलने से कोई भी देहधारी से ममत्व नहीं रहेगा।  सभी सेन्टर्स पर अकसर कर के किसी- ना-किसी का किसमें मोह हो जाता है। सबका नहीं हो जाता लेकिन किसी-ना-किसी का मोह सभी सेन्टर्स पर हो जाता है। फिर उसका रिजल्ट क्या होता है ? बस उसको देखे बिगर रह नहीं सकेंगे। ये देहधारी की याद एकदम नीचे गिरा देगी। बड़ी ऊँची मंजिल है। खाते- पीते जैसे कि मैं इस शरीर में हूँ ही नहीं। वो अवस्था पक्की करनी है। तब ही आठ रत्न की माला में जा सकते हैं। मेहनत बिगर थोडे़ ही ऊँच पद मिल सकता है। जीते जी देखते हुए समझो मैं तो वहाँ का रहने वाला हूँ।  जैसे बाबा इसमें टेम्पररी बैठा है, हम भी इस शरीर में टेम्पररी हूँ। हमको  भी अभी फिर घर जाना है। घर भी प्यारा लगता है, राजाई भी प्यारी लगती है। जब तक देह का भान नहीं टूटा है तब तक मुक्ति कैसे पावे ? शरीर का भान एकदम छोड़ दो क्योंकि तुमको मेरे साथ जरूर चलना है।
Vcd- 803
वार्तालाप प्वाइंट       वार्ता न. 326

स्टूडेन्ट - तप कर राज, राज कर नर का। तो क्या हम सेवा कर सकते हैं सभी को बताने के लिए कि जो आत्मा तप कर रही है वही आत्मा से सावधान रहना है कि वही आत्मा हमारी दुनिया को नर्क बनाने के लिए निमित्त बनी है?
 
बाबा - वो जब द्वैतवादी युग द्वापर/कलियुग की शूटिंग होती है तब की बात है। अद्वैतवादी युग की शूटिंग करने वाला तो प्यार में रहेगा। तपस्या में क्यों तपेगा? प्यार में रहना माना तपस्या आटोमेटिक होती है। तपस्या माने आत्मिक स्थिति। जितना ईश्वरीय सेवा में लगे रहेंगे उतना आटोमेटिक बाप हमको प्यार करेगा। बाप सर्विसएबुल बच्चों को याद करते हैं।तो बाप की याद की पावर उन बच्चों को मिलेगी और वो आटोमेटिक आत्मिक स्थिति में स्थित हो जाएँगे। उन्हें तपस्या महसूस ही नहीं होगी।

समय-53.27
[18:01, 10/18/2020] +91 6260 266 924: भारी संकट आने हैं, जब विनाश शुरू हो जायेगा फिर समझेंगे जरूर कहीं भगवान गुप्त वेश में है। कृष्ण अगर होता तो सारी दुनिया में ढिंढोरा पिट जाता। कृष्ण तो आ न सके। यह तो बाप को आना पड़ता है। अन्त तक बाप को ज्ञान सुनाना है। आते ही गुप्त रूप में हैं। कृष्ण तो हो न सके। निराकार बाप सभी का एक है।  ज्ञान मुरली 10-8-2017
[18:03, 10/18/2020] +91 6260 266 924: बाप गरीब-निवाज़ है ना। गरीबों से ही मिलने आते हैं। साहूकार लोग तो नामीग्रामी मनुष्यों से ही मिलते हैं। इनको तो गरीब ही प्यारे लगते हैं। गरीबों पर ही तरस पड़ता है। तो बाप गरीबों पर तरस खाते हैं। ज्ञान की मुट्ठी भर देते हैं तो तुम साहूकार बनो। साहूकारों का ठहरना मुश्किल है। दरकार ही नहीं है इस ज्ञान मार्ग में। गवर्मेन्ट को तो धनवान लोग बहुत मदद करते हैं ना। नामीग्रामी हैं ना। मु 11-9-17
[18:40, 10/18/2020] +91 6260 266 924: गायन क्या है-- ज्ञान से सद्गति या  योग से सद्गति?? योग से सद्गति होती है, लेकिन संपूर्ण गति सच्ची गति होती है या कुछ ना कुछ अपूर्ण सदगति होती है??अपूर्ण कहेगें।
जो भी देवताएं जन्म लेते हैं कृष्ण से लेकर आठवीं नारायण तक, उनकी संपूर्ण सद्गति कहें??नहीं*फिर कृष्ण की??वह तो 16 कला संपूर्ण होता है। उसकी भी संपूर्ण सद्गति नहीं कह सकते। क्योंकि वह कलातीत नहीं बनते।कलातीत तो एक ही सूर्य है। वह सूर्य कभी भी कलाओं के बंधन में नहीं बंधता। उस का नारा है-- स्वतंत्र रहो, स्वतंत्र रहने दो। कोई के बंधन में ना रहो। ना कोई को बंधन में बांधो।त्रिमूर्ति में कौन है बंधन काटने वाला?? उसको कहते-- देव देव महादेव। ब्रह्मा को नहीं कहेंगे, विष्णु को भी नहीं कहेंगे। शंकर को ही क्यों??क्योंकि वो एक ही आत्मा इस सृष्टि में ऐसी है, जो आप समान सभी बीज रूप आत्माओं को पैदा करती है। वृक्ष में सबसे पावरफुल बीज होता है।* जड़ें भी सड़ जाती हैं। जड़ों से जो तना निकलता है, वह भी सड़ जाता है। टहनियां फूल पत्ती डाल डाली सब सड़ जाते हैं।लेकिन मनुष्य सृष्टि के बीज अविनाशी है।Vcd 2635(9-9-18)1.09मि
[18:41, 10/18/2020] +91 6260 266 924: शिवलिंग किस रूप की यादगार हैं? साकारी है या निराकारी??


देहधारी उन्हें कहा जाता है जिनकी देह में बुद्धि धरी रहे, और देह से बुद्धि परे हो जाए तो निराकारी।
 तो शिवलिंग जो यादगार है वह किस रूप की यादगार है?? वो साकार है या निराकार? लिंग तो बड़ा रूप है, साकारी होगा ना?
 *निराकारी ही  कहेंगे, क्योंकि बड़ा भल है, लेकिन हाथ, पाँव, आंख, नाक, कान का ध्यान नहीं है। इसीलिए निराकारी कहा जाता है।देहधारी नहीं कह सकते। लिंग भी निराकारी स्टेज और उसमें जो बिंदु आत्मा है, वह तो निराकार होती ही है। क्योंकि निराकार बाप को देह तो है ही नहीं। वो प्रवेश तो करते हैं, लेकिन देह में उनकी आसक्ति होती ही नहीं।

Vcd 2566(38min.)

Saturday, October 17, 2020

वार्तालाप प्वाइंट       वार्ता न. 322

स्टूडेन्ट- बाबा, वायब्रेशन का आध्यात्मिक अर्थ क्या है?

बाबा - हर आदमी के चारों ओर उसके संकल्पों का, वायब्रेशन का एक वृत्त घूमता रहता है। जैसे-जैसे संकल्पों का, दुष्ट संकल्पों का व्यक्ति होचगा तो उसके वायब्रेशन का वृत्त चारों तरफ उसी तरह का घूमेगा और श्रेष्ठ संकल्पों का व्यक्ति होगा तो उसके चारों तरफ वैसे ही वृत्त घूमेंगे। तो जो आत्माएँ उनके कनेक्शन में आती हैं उनके ऊपर उसका संग का रंग लगता है। इसलिए कहते हैं कि - जैसे आत्मा रूपी बैटरी होती है वो बैटरी दूसरी बैटरी से जोड़ दी जाए तो एक बैटरी खाली होने लगेगी और दूसरी भरने लगेगी। ऐसे ही ये संग का रंग लगता है।
समय - 33.21
बच्चों को ख्याल आना चाहिए कि हम श्रीमत पर क्या कर रहे हैं? स्वच्छ रहना है। दिल के अन्दर भी कोई बात नहीं रहनी चाहिए। अगर दिल के अन्दर भी कोई मैल रह जाता हैं, तो दूसरों के वायब्रेशन को भी खराब करता है। बच्चों को समझाया जाता हैं अशरीरी भव! यहाँ पार्ट बजाने आए हो। और ये आत्मा में अविनाशी पार्ट है जो बजाते  ही रहते हो। जो भी है सभी को अपना पार्ट बजाना है। तो ये नालेज बुद्धि में रहनी चाहिए, क्या नालेज ? कि हम आत्मा है , हम देह नहीं है। आत्मा अभिमानी होकर के रहेंगे तो शूटिंग कैसी होगी? सुख की शूटिंग होती रहेगी। और देहअभिमानी होकर रहेंगे तो दुख की शूटिंग होती रहेगी। रिहर्सल होती है ना।

Vcd- 786
वार्तालाप प्वाइंट         वार्ता न.322


स्टूडेन्ट - बाबा, जब अपन (हम) याद में बैठते हैं ना। तो जो सांग्स है ना, भगवान के गाने।वो लगाना अच्छा है या नहीं लगाना अच्छा है?
 
बाबा - पहले बाबा बोलते थे कभी अवस्था खराब हो जाती है, चित्त अच्छा नहीं होता है, माया बहुत प्रकोप करती है तो अच्छे-अच्छे गीत रिकार्ड रखना चाहिए अपने पास। एक-दो रिकार्ड लगा लिए बाबा की याद में बैठ गए तो चित्त अच्छा हो जाएगा। वो तो बचपन की बात बताई। अभी हम बचपने में नहीं है एडवान्स पार्टी के हैं। क्या? एडवान्स के लिए अभी डायरेक्शन निकला है - गीत गाना नहीं है वास्तव में गीत सुनना भी नहीं है। क्यों? क्योंकि अब हम मनन-चिंतन-मंथन कर रहे हैं। हम दुनियाँ वालों को सुनाते हैं विनाश सामने खड़ा हुआ है। अब आया की अब आया। और हम ढोल मंज़ीरा बजाने में लगे हुए हैं। तो दो बातें हो जाती है ना। तो ऐसी दो बातें जो सुनेंगे तो ज्ञान के ऊपर विश्वास ही नहीं करेंगे।
समय - 55.25
बाप ने कहा है - अब अपन को आत्मा समझ मुझे याद करो, तो तेजी से तुम्हारे सारे पापकर्म भस्म हो जावेंगे। अगर कोई दूजम को याद किया तो पाप कर्म कम नहीं होंगे। ये रूहानी यात्रा है। बाप की याद से विकर्म विनाश होते हैं। क्यों विनाश होते हैं ? बाप की याद में ऐसी क्या चीज समाई हुई है ? सतयुग-त्रेता में विकर्म नहीं होते । यहाँ पापकर्म बन जाते हैं। सतयुग-त्रेता में आत्मिक स्थिति रहती है, इसलिए पापकर्म होने का सवाल ही नहीं। क्योंकि देहभान होता ही नहीं। और यहाँ, यहाँ घड़ी-घड़ी देहभान खींचता है तो पापकर्म बन जाता है। बाप की याद भूल जाती है। बाप की याद के लिए ये शर्त है; क्या ? कि अपन को आत्मा समझो। अगर देहभान में रहकर के बाप को याद करना चाहेंगे तो याद आवेंगी ही नहीं।उन जिस्मानी यात्रा से तो और ही विकर्म बनते हैं। तुम्हारी तो है रूहानी यात्रा। तो तुम बच्चों को सदैव कुछ ना कुछ सर्विस करनी चाहिए। क्या ? देहभान में आने से बचने कि लिए क्या करना चाहिए ? सदैव कुछ-ना-कुछ सेवा करनी चाहिए। ईश्वरीय सेवा करेंगे तो ईश्वर बाप खुश होंगे। लौकिक दुनिया में भी कोई बच्चा बाप की दुकान में बहुत सहयोगी बनता है तो बाप  उस बच्चे पर खुश होता है, दुआएँ मिलती हैं। यहाँ तो बाप से कितनी ताकत मिलती है ? हम बच्चे याद करते हैं और बाप सर्विसएबुल बच्चों को याद करते हैं। तो हमारी याद में ज्यादा ताकत  या बाप की याद में ज्यादा ताकत ?( किसी ने कहा- बाप की याद मेें ज्यादा ताकत) तो सर्विस करना छोड़ना नहीं है। सर्विस करने से ही कल्याण होगा। सर्विस नहीं करते हैं तो जरूर डिसर्विस करते हैं। देहभान आता है, कहीं-न-कहीं लगाव होता है, तो जिसका लगाव होता है वो सर्विस  कर नहीं  सकता।
Vcd- 786
वार्तालाप प्वाइंट           वार्ता न. 326


स्टूडेन्ट - ग्लानि की परिभाषा क्या है?

बाबा - ग्लानि की परिभाषा ये हैं- जो गायन योग्य चीज़ है, जो गायन योग्य व्यक्ति है उसका गायन न करना, उसकी महिमा न करना ,वो महिमा को ग्लानि में बदल देना, उल्टा कर देना, सत्य को असत्य कर देना, असत्य को सच्चा साबित कर देना। जैसे-आज के काले कोट वाले वकील होते हैं।

समय - 41.27
वो महारथी कहेंगे जिनकी सद्गति मार्ग की दशा है, अपने दिल से पूछना चाहिए हम महारथी हैं ? फलाने मिसल सर्विस करते हैं ? जो प्यादे होंगे वो कब किसी को ज्ञान सुना नहीं सकेंगे, कोई का कल्याण कर नहीं सकेंगे। तो कल्याणकारी बाप  का बच्चा क्यों कहलाना चाहिए ? बाप तो पुरूषार्थ करावेंगे ना। पुरूषार्थ करावेंगे या स्वार्थी  बनावेंगे ? पुरूषार्थ करते हैं तो बाप के बच्चे हैं । पुरूषार्थी माना ही आत्मा के अर्थ करने वाला। जो भी वाणी बोले आत्मा के अर्थ, जो भी कर्मेन्द्रियों से कर्म करे आत्मा के कल्याण के अर्थ, जो भी संकल्प चलावे आत्मा के  कल्याण के अर्थ तो कहेंगे कल्याणकारी बाप का बच्चा। बाप अपने बच्चों को ठंडा थोडे़ ही छोड़ेगे। अगर  उनको ठंडा छोड़ दे तो और ही डिसर्विस करेंगे। इस ज्ञान यज्ञ की सर्विस में तो हड्डियाँ भी स्वाह कर देनी चाहिए। बाकी सिर्फ खाना , पीना, सोना ये क्या सेवा हुई ? समझना चाहिए हम जाए प्रजा में जावेंगे। राजाई में तो आने की बात  नहीं दिखाई पड़ती  या तो दास-दासी बनेंगे। बाप तो कहते हैं पुरूषार्थ करके नर से नारायण बनो। सपूत बच्चों को देखकर के बाप भी खुश होंगे।
Vcd- 790

Thursday, October 15, 2020

ब्राह्मणों का धंधा क्या है?  ज्ञान लेना है और ज्ञान देना है। ये ही मुख्य धंधा है।  तो भगवान बाप के हम सब बच्चे हैं। अभी यहाँ बैठे हैं, वातावरण में बैठे हैं, तो उमगं-उत्साह आता है,हम ज़रूर ऐसा पुरूषार्थ करें! फिर बाहर की दुनिया में गए, 'गंगा गए गंगानाथ, जमुना गए जमनुानाथ।' जो दृढ़ता क्या धारण करनी है?  क्या धारणा धारण करनी है? ये शरीर रूपी धनुष है, कैसा बनाना है ? एकदम ऐसा लचीला बनाना है, इस दुनिया में चाहे जैसी परिस्थिति आ जाए, लेकिन हम हिलने वाले नहीं हैं। हम वैसा ही लचीला पुरूषार्थ  करके दिखाएँ जैसा भगवान बाप हमसे चाहते हैं। क्या चाहते हैं? भगवान बाप हमसे चाहते हैं, चैलेंज देते हैं, बापदादा ने जो बोला हुआ है- "राख कौन बनते हैं और कितने बनते हैं और कोटों में से, लाखों में से एक कौन निकलते हैं, वह भी देखेंगे।" अपने दहेभान को क्या बना दें? राख बना दें।
Vcd- 2238
वार्तालाप प्वाइंट       वार्ता न. 322

स्टूडेन्ट- बाबा, एक छोटा-सा क्वेश्चन और है। जैसे आपने आज बताया ना कि जितना याद करेंगे उतना विकर्म विनाश होंगे। ये तो हो गई याद में विकर्म विनाश होने की बात। जो आप से मिलना तीन घंटे का हुआ उसमें कितना विकर्म विनाश होंगे?
 
बाबा - मिलने से, जुलने से विकर्म विनाश नहीं होते हैं; लेकिन मिलने के बाद जो स्मृति आती रहती है। स्मृति आएगी या नहीं आएगी? कोई भी हमको सुख देता है तो सुख देने वाला याद आता है या नहीं आता है? तो जो याद आती रहती है वो याद से हमारे पाप कर्म भस्म होते जावेंगे। और फस्र्ट इम्प्रेशन इस दी लास्ट इम्प्रेशन। पहली बार मिलने में जो बात होती है, गहराई होती है वो बाद में उतनी नहीं होती है। इसलिए फायदा ही फायदा है।
समय-31.16
भगवान जो नई दुनियाँ रचता है उसमें कोई भी बीमारी नहीं होती। कोई भी प्रकार का दुःख नहीं होता। कोई भी प्रकार का भय नहीं होता। कोई भी प्रकार की अशांति नहीं होती। सुख-शांति से भरपूर दुनियाँ बनाकर के जाता है। कोई कहते हैं- ऐसा न कभी हुआ है, न होगा। अरे, जब दिन का सोझरा हो सकता है और रात का घोर घुप्प अंधेरा हो सकता है। दोनों बातें विपरीत हो सकती हैं कि नहीं? होती हैं। तो फिर दुनियाँ में घोर सुख और घोर दुःख भी हो सकता है। ये सतयुग की जो दुनियाँ थी, जहाँ लक्ष्मी-नारायण का राज्य था, उन लक्ष्मी-नारायण के राज्य में कोई भी दुःख नहीं था। इसलिए 33 करोड़ देवताओं में से एक भी ऐसा देवता नहीं है जिसकी ग्लानि न हो। एक लक्ष्मी-नारायण ही ऐसे हैं जिनकी दुनियाँ में कोई ग्लानि नहीं है। शास्त्रों में भी कहीं कोई ग्लानि नहीं है। ऐसे लक्ष्मी-नारायण का राज्य भगवान आकर के स्थापन करता है। इसलिए गीता में लिखा हुआ है- हे! अर्जुन, मैं ऐसा ज्ञान देता हूँ जो तू नर अर्जुन नारायण बने और हे! द्रोपदी नारी, तू इस ज्ञान को पाकर के नारायणी बनेगी। मनुष्य को देवता बनाना ये भगवान का काम है। नर से नारायण और नारी से लक्ष्मी बनाना मनुष्य गुरुओं का काम नहीं है।
Vcd- 1387
वार्तालाप प्वाइंट        वार्ता न. 322


स्टूडेन्ट- बाबा, जो शरीर छोड़ते हैं उनकी आत्मा भटकती है और बाबा कहते हैं कि आत्मा तो उसी शरीर में प्रवेश करती है। तो यही समझ में नहीं आ रहा है।

बाबा - जो अकाले मौत में शरीर छोड़ते हैं उनकी आयु पूरी नहीं होती है। आयु पूरी न होने की वजह से वो आत्मा भटकती रहती है। उसका और एक कारण ये है कि जिनकी अकाले मौत होती है उन आत्माओं के ऊपर पाप का बोझा जास्ती चढ़ जाता है। वो बोझा और जास्ती न चढे़ इसलिए उनको अपना शरीर नहीं मिलता है। वो दूसरे के शरीर में प्रवेश करके उल्टा-पल्टा कार्य करते रहते हैं। इसलिए ऐसी आत्माएँ भटकती रहती है; तुरन्त जन्म नहीं लेती। जब उनका पापों का बोझा हल्का हो जाता है तब उन्हें जन्म मिल जाता है।
समय- 29.10
शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2808, दिनांक 03.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
VCD-2808-extracts-Hindi
समय- 00.01-18.58
 
आज का प्रातः क्लास है – 14.11.1967. मंगलवार को रिकार्ड चला – ये कौन आया आज सवेरे-सवेरे, हँ, कि दिल चौंक उठा सवेरे-सवेरे? किसका दिल चौंक उठा? हँ? दिल चौंक उठा माने दिल प्रभावित हुआ। पहले-पहले किसका दिल चौंक उठा? हँ? अरे, किसी का तो चौंक उठा होगा ना? हं? (किसी ने कुछ कहा।) मुकर्रर रथ चौंक उठा? वो पत्थर दिल, उसका दिल चौंक उठा? हँ? पत्थरबुद्धि का दिल भी कैसा होगा? पत्थरबुद्धि का दिल भी पत्थर। हँ? हाँ। वो गीत गाते हैं ना – पत्थर के सनम तुझे हमने क्या जाना? बड़ी भूल हुई। क्या? हाँ। तो ये गीत है; (किसी ने कुछ कहा।) लक्ष्मी का गीत है? अच्छा? किस समय का गीत है लक्ष्मी का? हँ? अरे? कोई को तो लक्ष्मी ही लक्ष्मी दिखाई पड़ती। हँ? दिखाई पड़ना चाहिए नारायण को। हँ? बताओ। कब? लक्ष्मी का दिल अगर चौंक उठा तो कब? सो पता नहीं। ये पता है कि लक्ष्मी का ही चौंक उठा होगा। हँ? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 5 दिसम्बर को दिल चौंक उठा? अच्छा? और सवेरे-सवेरे आया कौन? 5 दिसम्बर को सवेरा हुआ? हँ? कब कहें सवेरा हुआ? और किसका दिल चौंक उठा?
 
अरे, अरे, पहले-पहले तो दिल चौंक उठा दादा लेखराज ब्रह्मा का जिनको साक्षात्कार हुए। हँ? और उन साक्षात्कारों का अर्थ उनको कहीं से भी पता नहीं चला। न अपने गुरु से, न दुनिया के या बनारस के विद्वान, पंडित, आचार्य या कोई से भी नहीं पता चला। फिर जब अपने अनुभव के आधार पर जिस विद्वान व्यक्ति को समझा कि सच्चा व्यक्ति है, उस अपने भागीदार के पास पहुँचे। तो उसने जो बताया तो दिल चौंक उठा। चौंक उठा कि नहीं चौंक उठा? हाँ। फिर भी जाना तो नहीं ये कौन आया। हँ?
 
ओमशान्ति। तो ये कौन आया? भगवानुवाच। सुना - कौन आया? हँ? किसने पूछा? शिव बाप ने पूछा – सुना - कौन आया सवेरे-सवेरे? हँ? और किसमें आया? सुना? कुछ जाना तुमने? पहले किससे पूछा? पहले तो दादा लेखराज ब्रह्मा से ही पूछा। कौन आया? अरे, भगवानुवाच। देहधारी को भगवान नहीं कहा जाता। क्या? जो देह में जिसकी बुद्धि धरी हुई हो, उसको भगवान कहा जाता है? नहीं। भगवान तो न देह लेता है, न देह का जन्म लेता है, हँ, और न देह में आसक्त होता है। वो तो देहधारी है ही नहीं। तो देहधारी नहीं है, विदेही है, तो फिर ये भक्तिमार्ग में जो अर्जुन का रथ दिखाया है वो किस बात की यादगार? हँ? वो इसी बात की यादगार है कि देह ली ना अर्जुन की। ये शरीर रूपी रथ लिया। हँ? तो शास्त्रों में ही लिखा हुआ है, हँ, शरीरं रथं विद्धि इन्द्रियाणि हयान्याहू। हँ? ऐसे बोला है ना? तो ये शरीर जो है अर्जुन का जो ज्ञान धन अर्जन करने में सबसे आगे है। तो भगवान के पास क्या है? हाँ? उसके पास तो अखूट ज्ञान धन की संपत्ति है। तो उसकी वैल्यू जो देता होगा उसी के रथ में आएगा ना। हाँ। लेकिन जिसके रथ में आया उसकी बुद्धि तो देह में धरी हुई है या विदेही में धरी हुई है? विदेही को तो जानता ही नहीं। जानता है? हँ? जानता है? नहीं। वो तो कब आता है कब जाता है किसी को पता भी? पता भी नहीं चलता। तो जो रथधारी अर्जुन है वो तो देहधारी है। उसको तो भगवान नहीं कहा जा सकता। हँ? किसको कहा जा सकता है भगवान?
 
भगवान तो उसे कहा जा सकता है जो देह में जिसकी बुद्धि एक सेकण्ड भी न टिके। क्या? कहाँ टिके? या तो अपनी आत्मा ज्योति में टिके या तो, हँ, किसमें टिके? वो मन-बुद्धि रूपी आत्मा है वो आत्माओं के बाप की याद में टिके। हँ? और किसी की याद में दुनिया में न टिके। तो, तो कहेंगे उसको भगवान। (किसी ने कुछ कहा।) मंथन? अरे? मंथन भी तो अधूरी स्टेज है ना। हँ? कि भगवान की स्टेज है? हँ? मंथन करता है, मनन-चिंतन-मंथन करता है तो मन का उपयोग करता है ना। हँ? हाँ। और भगवान को मन होता है क्या? हँ? भगवान को तो मन ही नहीं होता, हँ, जो मनन-चिंतन-मंथन करे। और उसे मनन-चिंतन-मंथन करने की दरकार भी? दरकार भी नहीं है। क्यों? क्योंकि वो तो अजन्मा है, अकर्ता है, अभोक्ता है, त्रिकालदर्शी है। हँ? जन्म-मरण के चक्र में न आने से वो तो सब कुछ जानता है पहले से ही। तो किस बात का मनन-चिंतन-मंथन करेगा? करेगा? हाँ, जिसमें प्रवेश करता है, हँ, देहधारी में तो उसके लिए बताया कि वो जिस देहधारी में प्रवेश करता है उसको पहले-पहले आप समान बनाता है। कैसा आप समान? हँ? निराकारी, निरहंकारी, हँ, निर्विकारी। अभोक्ता बनाता है कि नहीं? हँ? अरे? हाँ, अभोक्ता। जब आत्मा संपन्न बनेगी तो देहभान होगा तो भूख लगेगी? हँ? देहभान होगा तो कोई भी इन्द्रियों की भूख लगेगी कि नहीं? तो भूख लगेगी। और देहभान है ही नहीं, आत्मिक स्थिति है सदाकाल, तो भूख लगेगी? न कोई भूख, न कोई प्यास।
 
तो बताया – जैसे सुप्रीम सोल बाप हैविनली गॉड फादर कहा जाता है कि वो हैविन बनाने का रास्ता बताता है, हँ, ज्ञान बताता है, जानकारी देता है। और जिसको जानकारी पहले-पहले देता है वो ही इस संसार में क्या कहा जाता है? भगवान। भगवान माने? भग का अर्थ भाग्यवान भी है। हँ? कहते हैं ना जिस घर में कन्या पैदा होती है तो कन्या अपना भाग्य लेके आती है। हँ? तो कन्या भग वाली है। हाँ। तो ज़रूर जो भाग्य है वो काहे से बनता है? सन्यासियों का भाग्य बनता है क्या? हँ? वो तो, वो तो घृणा के मारे छोड़छाड़ के भाग खड़े होते हैं। तो उनका भाग्य कहेंगे? कोई भाग्य नहीं। तो भाग्य तो कहा जाता है किसका ऊँचे ते ऊँचा? ऊँचे ते ऊँचा भाग्य उसका कहा जाता है जो विश्व का मालिक बने। हँ? कौनसी ताकत से? हँ? भगवान की, जो सुप्रीम सोल गॉड फादर है, उसकी याद की पावर से, हँ, योग की पावर से, हँ, विश्व का मालिक बन जाए। माने राजाई राजयोग से मिलती है ना। तो इसलिए; फिर उसे देहधारी थोड़ेही कहेंगे? क्या? देह में बुद्धि धरी रहेगी या विश्व कल्याण में बुद्धि धरी रहेगी? हँ? स्वार्थ में बुद्धि लगेगी, रथ माना शरीर के कल्याण में बुद्धि लगेगी या सारे विश्व के कल्याण में बुद्धि रमण करेगी? सारे विश्व के कल्याण में बुद्धि रमण करेग। क्योंकि ये भी देहधारी है ना। ये भी कौन? ये भी है और फिर वो भी है। ‘ये’ किसके लिए कहा? हँ? हाँ, दादा लेखराज ब्रह्मा के लिए कहा जिसके तन में ये वाणी चलाई जा रही थी कि ये भी है देहधारी। ये ‘भी’ का मतलब क्या है? कि ये भी है और कोई दूसरा भी है देहधारी। तो इनको; इसको भी और जो दूसरा है उसको भी। हँ? मुकर्रर रथधारी भी है ना। ये तो टेम्परेरी रथ है। आज है, सन् 67 में है और पता नहीं एक साल के बाद रहे या, या न रहे। हाँ।
 
तो इनको तो भगवान नहीं कहा जा सकता। हँ? दोनों को नहीं भगवान कहा जा सकता। कब? हँ? माने 1967 की बात बताई कि वो देहधारी हैं कि विदेही हैं? भगवान तो विदेही होता है। देह के विपरीत होता है। देही माने देह को धारण करने वाली आत्मा। और आत्माएं सब भोगी होती हैं। इस दुनिया में सब आत्माएं भोगी कि संपूर्ण योगी? सब भोगी। तो भगवान तो विदेही है। वो भोग वासना से बिल्कुल न्यारा है। तो इनको भगवान नहीं कहा जा सकता। दोनों को नहीं। न मुकर्रर रथधारी को और न टेम्परेरी रथधारी दादा लेखराज ब्रह्मा को।
 
बाकि बच्चे जानते हैं। कौनसे बच्चे? रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाबा आया हुआ है। कौन बच्चे जानते हैं? हँ? रूहानी बच्चे जानते हैं। तो वो रूहानी बच्चे जिस्मानी नहीं हुए? हँ? जिस्मानी हुए तो। लेकिन फिर भी कुछ न कुछ रूह की स्थिति में टिकने वाले हैं या नहीं हैं? हाँ, जरूर कुछ न कुछ रूह की स्थिति में टिकने वाले हैं। तो रूहानी बच्चे जानते हैं कि बाबा आया हुआ है। कि ये पहले ही से बताया जाता है। क्या? अभी की बात नहीं है 1967 की। ये तो पहले से ही बताया जाता है कि देहधारी को कभी भी भगवान नहीं कहा जा सकता है। हँ? न आज और न भविष्य में कभी और न पास्ट में कभी देहधारी को भगवान कहा गया हो ऐसे तो होता ही नहीं। और ये भी पहले से बताय दिया। क्या? कि रूहानी बच्चे कब कहे जाएं? जब रूह की पहचान हो।
 
तो रूह की पहचान, रूह की पहचान कब से कहें? हँ? कबसे कहें? (किसी ने कुछ कहा।) 1936 से रूह की पहचान हो गई? हँ? (किसी ने कुछ कहा।) 5 दिसम्बर को रूह की पहचान हुई? माने 5 दिसम्बर को रूह की स्थिति में टिका नहीं, सिर्फ पहचान हुई? हँ? टिका या पहचान हुई? हँ? टिका भी। तो वो टिकने की बात नहीं है। पहचान कबसे हुई जो रूहानी बच्चा कहा जाए? एक पहचान होना अलग बात है। और उस स्थिति में टिकना अलग बात है। तो पहचान 1936 से हो गई? अच्छा? हँ? कैसे? हाँ। 36-37 में जब दादा लेखराज को उनके साक्षात्कारों का अर्थ बताया गया, हँ, तो फिर भगवान ने तो, जो भगवान ऊँच ते ऊँच आत्मा कही जाती है, सुप्रीम सोल गॉड फादर, वो तो कुछ न कुछ आकरके सुनाएगा ना। तो उसने तो पहले-पहले ये ही बात सुनाई होगी। क्या? क्या? गीता का पहले ओम मंडली में क्या किया जाता था? क्लेरिफिकेशन दिया जाता था, व्याख्या दी जाती थी। तो गीता में तो ये श्लोक आया हुआ है। क्या? अणोणीयांसम् अनुस्मरेत यः। आत्मा या आत्माओं का बाप क्या है? अणु रूप है। लेकिन किसी को समझ में नहीं आया। ये समझ में तो आया कि अणु रूप, अणोणीयांसम् माने अणु से भी अणु रूप छोटी से छोटी अति सूक्ष्म आत्मा, ये भृकुटि के मध्य में है, ये इतना समझ में आया। तो जिनको समझ में आया वो तो थोड़ा बहुत तो प्रैक्टिस करेंगे ना। तो बताया कि ये सभी देहधारी बच्चों को भगवान नहीं कहा जा सकता क्योंकि ये इनकी देह तो है ही नहीं। किनकी देह? शिव बाप की देह तो है ही नहीं। ये तो बच्चे सभी जानते हैं ये पराई देह है।          
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शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2809, दिनांक 04.03.2019
प्रातः क्लास 14.11.1967
VCD-2809-extracts-Hindi
समय- 00.01-22.18
 
14.11.1967. मंगलवार को पहले पेज के मध्य में बात चल रही थी – अभी इनको आत्माभिमानी बनाय; हँ? किनको? इन ब्रह्मा नामधारियों को आत्माभिमानी बनाय और बैठकरके आय समान बनाय रहे हैं। हँ? आप समान माना? हँ? निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, अकर्ता, अभोक्ता। हँ? तो क्या चारों ही, पांचों ही ब्रह्मा नामधारी निराकारी, निर्विकारी, निरहंकारी, अकर्ता, अभोक्ता की स्टेज पर पहुंचेंगे कि सारे संसार का विनाश भी कर दें फिर भी, हँ, जैसे कुछ भी नहीं किया? अकर्ता की स्टेज पर टिके रहें। हँ? पांचों ब्रह्मा नामधारियों को ऐसी स्टेज धारण कराय देते हैं आप समान बनाने की? हाँ, क्योंकि जिसको कहा आप समान, वो तुरीया तो एक ही है। तो तुरीया एक ही तुरीया को तुरीया बनाता है।
 
तो आत्मा की महिमा गाई जाती है। हँ? कब? हाँ, शरीर की तो कोई महिमा नहीं गाई जाती है। हँ? वास्तव में हर एक की आत्मा की महिमा गाई जाती है। भई, फलाना था। हरेक की आत्मा की? हाँ। हर एक आत्मा इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर जब पहले-पहले जनम में पार्ट बजाती है तो उसकी महिमा; सात्विक स्टेज में पार्ट बजाती है या राजसी या तामसी? सात्विक स्टेज में पार्ट बजाती है तो उसकी महिमा गाई जाती है। कहते हैं भई फलाना था, बहुत अच्छा था। हँ? तो सतोप्रधान था ना, सात्विक था ना, तभी तो अच्छा था ना। हाँ। अब शरीर तो नहीं कहेंगे। क्या? अब। हँ? शरीर तो नहीं। बाकि आत्मा के लिए कहा जाता था कि फलाने की आत्मा बहुत अच्छी। अच्छी तरह से पार्ट बजाया। और आत्मा के पार्ट का तो किसको मालूम भी नहीं है बच्चे। बाकि ये ज़रूर महिमा करेंगे उस जीव आत्मा की। हँ? किस जीव आत्मा की? हँ? किधर इशारा किया? बाबा तो मिसाल देते हैं; भक्तिमार्ग की दुनिया का मिसाल देते हैं।
 
तो मिसाल दिया भई नेहरू बड़ा अच्छा था। क्या? क्या नाम दिया? नेह का रूह। नेह माने? स्नेह, हँ, का रूह बड़ा अच्छा था। तो कहेंगे कि जिसका मिसाल दिया, नेहरू बड़ा अच्छा था। बच्चों को बहुत प्यार करता था। हँ? तो हद का नेहरू या बेहद का नेहरू? हँ? क्या कहेंगे? हद का नेहरू अपन को आत्मिक स्थिति में स्थित करता था? नहीं। तो जो आत्मिक स्थिति में स्थिर करे उसकी बात है कि सबको आत्मा-आत्मा भाई-भाई के रूप में उस दृष्टि से देखे तो कहेंगे कि रूह अच्छी। और देह की दृष्टि से देखा, हँ, और दैहिक प्यार किया तो अच्छा कहेंगे क्या? नहीं। तो मिसाल दिया बाहर की दुनिया का लेकिन तुम बच्चों के मिसाल दिया क्योंकि तुम बच्चे तो आत्मा हो ना। आत्मा अपने को समझ लिया ना। हाँ। जैसे नेहरू के लिए कहते हैं वैसे शास्त्री भी बड़ा अच्छा था। हँ? अभी शास्त्री का तो शरीर नहीं है। हँ? बाकि कहेंगे कि शास्त्री की आत्मा बड़ी अच्छी थी।
 
तो बाप बैठकरके समझाते हैं कि मैं आया हूँ सवेरे-सवेरे। हँ? कौन आया हूँ? आत्मा आया हूँ या शरीर आया हूँ? हँ? मैं आया हूँ सवेरे-सवेरे। माना इसको कहा जाता है प्रभात। क्या? प्रकष्ट रूपेण ‘भा’ माने रोशनी देने वाला। प्रभात। हाँ। सवेरे को सूर्य निकलता है ना। तो सवेरे की सूर्य की किरणें जो हैं वो ज्यादा फायदेमन्द होती हैं या दोपहर और शाम की किरणें ज्यादा फायदेमन्द होती हैं? हँ? कौनसी ज्यादा फायदेमन्द? दुनिया में तो शरीर को हिसाब से देखते हैं तो वो स्थूल सूर्य को कहते हैं सवेरे 7-8 बजे की सूर्य की किरणें लेना चाहिए। लेकिन वो तो स्थूल सूर्य है ना। हँ? यहाँ तो बात किसकी है? ज्ञान सूर्य चैतन्य आत्मा की बात है ना। कहते ही हैं सत, चित, आनन्द। चैतन्य है ना? तो वो, वो जब आता है तो ज्ञान की रोशनी का प्रभात, हँ, सवेरे को कहा जाता है। हँ? उसको कहेंगे अंग्रेजी में ए.एम.। ए.एम. की शुरुआत, माना एकदम फर्स्टक्लास या सेकण्ड, थर्ड क्लास? हाँ, एकदम फर्स्टक्लास ए.एम. प्रभात; प्रभात हो गई। हँ? फिर बाद में कहेंगे पी.एम. हो गई। हँ? क्या हो गई? पहले ए.एम. हो गई। बाद में पी.एम. हो गई। तो प्रभात तो ए.एम. हो गई ना। सवेरे में। बारह बजे के बाद फिर दिन हो जाता है। कौनसे बारह बजे के बाद? दोपहर के या रात के? हँ? हँ? वो स्थूल सूर्य हो या ये चैतन्य सूर्य हो। हँ? इसका जो प्रत्यक्षता रूपी जन्म है वो कबसे शुरु होता है? हँ? भारत में भी मनाते हैं। क्या मनाते? घोर अज्ञान अंधकार की रात्रि शिवरात्रि मनाते हैं ना। मनाते हैं। हाँ। तो ये किस आधार पर मनाते हैं? भारत में तो सवेरे को जब सूर्य निकलता है; हँ? जो इन आँखों से देखे, जो इन कानों से दूसरों से सुने बस सूर्य निकल आया, हँ, तब मानते हैं दिन की शुरुआत। भारतवासी दिन की शुरुआत कै बजे मानते हैं? हँ? स्थूल सूर्य निकलता है, देखने में आता है तब मानते हैं, सुनने में आता है तब मानते हैं या रात के 12 बजे से मानते हैं? हँ? कब मानते हैं? सवेरे 6 बजे से 5 बजे से, हाँ, दिन की शुरुआत मानते हैं।
 
तो बाबा ने यहाँ जो 12 बजे से बोला 12 बजे के बाद फिर दिन हो जाते हैं। ये किस हिसाब से बोला? दोपहर के 12 बजे के बाद या रात के 12 बजे के बाद? हँ? हाँ, क्योंकि बाप विदेशी बनकरके आया है ना। हँ? तो विदेशी बनकरके आया है तो विदेशियों की बात पहले करेगा या पहले स्वदेशियों की बात करेगा? हँ? क्यों? विदेशियों की क्यों? क्योंकि स्वदेशी तो कुंभकर्ण बनके पड़े हुए हैं। और विदेशी? विदेशियों को कोई कुंभकर्ण कहेगा? हँ? सोते हैं? नहीं। वो तो ज्यादा बुद्धिमान हैं, बाप को पहचान लेते हैं। क्या? जब बाप आते हैं तो विदेशियों के द्वारा प्रत्यक्षता होती है कि भारतवासी कुंभकर्णों के द्वारा प्रत्यक्षता होती है? हँ? भारतवासी कुंभकर्ण तो नींद में, अज्ञान की नींद में सोए पड़े हैं। हाँ। मनाते हैं। क्या? क्या मनाते हैं? कि भारत में, नार्थ इंडिया में भगवान का जनम हुआ। चाहे वो कृष्ण के रूप में मथुरा में हुआ हो, चाहे वो विश्वनाथ शंकर के रूप में बनारस, काशी में हुआ हो। और चाहे राम भगवान के रूप में अयोध्या में हुआ हो। भक्तिमार्ग में तो ये मानते हैं; क्या? भगवान का जन्म तो नार्थ इंडिया में होता है, हँ, लेकिन जब भगवान प्रैक्टिकल में आते हैं तो क्या पहचान पाते हैं? हँ? वो नहीं पहचान पाते। जो भी प्रत्यक्षता होती है जो भारत का विदेश, दक्षिण भारत बताया है जिनकी भाषा भी अलग, कि नहीं? भाषा भी अलग। और परंपराएं भी नार्थ इंडिया वालों से अलग। परंपराएं भी। और धनाढ्य भी? नार्थ इंडिया में ज्यादा धनाढ्य कि दक्षिण भारत में ज्यादा धनाढ्य? कहाँ ज्यादा धनाढ्य? हाँ, दक्षिण भारत में धनाढ़्य भी।
 
तो देखो हाँ, दक्षिण भारत की आत्माएं पहले आती हैं बाप के सन्मुख। हँ? आती हैं? हाँ। भले अंदर से नहीं समझ पातीं लेकिन शरीर से तो आती हैं ना। आती हैं। तो बताया 12 बजे के बाद जो दिन हो जाते हैं, वो विदेशियों के हिसाब से बताया रात के बारह बजे से सूर्य निकलना शुरू होता है स्थूल सूर्य या सवेरे को जब दिखाई पड़ता है तब सूर्य उदय होता है? वास्तविकता क्या है? हँ? कहेंगे रात के बारह बजे तक सूर्य डूबता रहता है। और रात के बारह बजे से, हाँ, उदय होना शुरू होता है। तो पहले-पहले जो पश्चिम में जाता है ना सूर्य तो पश्चिम में जाता है, तो पश्चिम में कौनसे देश हैं? कहेंगे अमेरिका है, यूरोप है। है ना? तो, जो अमेरिका, यूरोप कनाडावासी हैं वो पहले पहचानते हैं। हाँ। और इधर जो पूरब साइड के हैं वो अज्ञान की नींद में सोए पड़े रहते हैं।
 
तो बताया – उनके भी जो बीज हैं वो कहाँ हैं? हँ? कहाँ हैं? बताया – वो हैं दक्षिण भारत में। हँ? जो बताया ना जो मूल रूप में बीज दिखाए जाते हैं, आठ हैं ना। हाँ। वो आठ बीजों की पूजा कहाँ होती है? हँ? मूर्तियां कहाँ बनती हैं? मंदिर कहाँ बनते हैं? कहां बने हुए हैं? दक्षिण भारत में। तो बताया कि ये पहले पहचान लेते हैं। तो जब पहचानते हैं तो क्या कहेंगे? कि जो देखे, जो सुने, हँ, वो स्थिति आ गई? वो स्थिति नहीं आई। माना देखने की इन आँखों से और इन कानों से दो शब्द वो ध्यान देकरके, जैसे, हँ, जैसे सुना जाता है बड़ा आदमी आता है ना एरिया में, जैसे प्रधान मंत्री आता है, राष्ट्रपति आता है तो कितनी भीड़ लगती है। हँ? कितने चाव से सुनते हैं! क्या बोल रहा है? कैसा है? क्या है? आँखें फाड़-फाड़ के देखते हैं। देखते हैं या नहीं? हाँ। तो इससे तो ज्यादा बेहद का, बड़ा और कोई पार्ट बजाने वाली आत्मा संसार में है ही नहीं। लेकिन भारतवासी क्या करते हैं? हँ? भारतवासी सोए पड़े रहते हैं। और वो जिनको बोला कि बाप विदेशी बनकरके किसके लिए आते हैं? भारतवासियों के लिए पहले आते हैं या विदेशियों के लिए आते हैं? हाँ, विदेशियों के लिए आते हैं क्योंकि विदेशी ही बाप को पहले पहचानते हैं। पहचानते हैं और डम-8 चारों तरफ क्या होता है? हाँ, नगाड़ा बजाय देते हैं बाप आ गया। बेसिक में भी ऐसे ही होता है। पश्चिम में आवाज़ निकली, चलो इंडिया से ही निकली, तो कहाँ से निकली? दक्षिण हैदराबाद? हँ? पश्चिम हैदराबाद से या दक्षिण हैदराबाद से? पश्चिम हैदराबाद से निकली ना। तो पश्चिमी देश हुआ ना। भारत का पश्चिमी देश हुआ। ऐसे तो नहीं कहेंगे पूर्वी देश हुआ। हँ? आता तो है पूरब में वास्तव में। क्या? कहते हैं ना कि इस रथ को कहाँ से पकड़ा? कहते हैं, हँ, कलकत्ते से पकड़ा। क्यों? क्योंकि कलकत्ते में ही यादगार है। क्या? इस मनुष्य सृष्टि का बीज कहाँ पड़ा हुआ है जो बड़े वृक्ष के रूप में दिखाया जाता है? बनियन ट्री। है ना।
 
तो लेकिन वो पहचाना किसी ने नहीं। क्या? पहचाना किसी ने? जो चार मुख वाले ब्रह्मा हैं चार दिशाओं के, हँ, वो उन्होंने पहचाना? उन्होंने भी नहीं पहचाना। और पांचवां मुख जो है ऊर्ध्वमुखी मुख कहा जाता है ब्रह्मा का उसने पहचाना? उसने भी? उसने भी नहीं पहचाना। तो ब्रह्मा तो विदेश में नहीं होता है। ब्रह्मा विदेश में होता है कि स्वदेश में होता है? ब्रह्मा सो विष्णु। हँ? ब्रह्मा कहेंगे मुख वालों को जिनके मुख इकट्ठे होकरके बोलते हैं। हँ? और तो जैसे रावण के मुख होते हैं तो मुख से बोलते हैं। हँ? सहयोग देते हैं? रावण राम राज्य की स्थापना में सहयोग देता है? कि विरोध करता है? हाँ, विरोध करता है। वो जो दिखाया गया है ना कि सागर मंथन हुआ, हँ, तो जो सांप था ना जिसकी रस्सी बनाई गई मथानी, वो मथानी, वो घुमाने के लिए तो मुख किसकी तरफ रहा? मुख रहा किसकी ओर? हाँ, असुरों की ओर मुख रहा। और भारतवासियों की ओर, देवताओं की ओर? हाँ, पूंछड़ी। इसका मतलब क्या हुआ? कि भारतवासी पूंछ माने फालो करते हैं पूंछ को पकड़ते हैं। और जो विदेशी हैं वो क्या करते हैं? हँ? पूंछ को नहीं पकड़ते, मुँह पकड़ते हैं। तुमने ये ऐसा किया, ये हमें समझाओ, वो ऐसा किया, वो समझाओ, ये कैसे हो सकता है? वो कैसे होता? ये हमारी समझ में नहीं आता। वो हमारी समझ में नहीं आता। ऐसे-ऐसे करते रहते हैं। सामना ज्यादा करते हैं। हँ? तो उनको फिर क्या होता है? उनको वा सांप की जो विषैली फुंकार है ना वो सहन करनी पड़ती है।
 
तो बताया – बाप किसके लिए आए? बाप ये देखते हैं; क्या? बाप ये बात देखते हैं कि कौन अपोजिशन कर रहा है, कौन अपोजिशन नहीं कर रहा है? हर बात में, हँ, कोई को तो हर बात अच्छी लगती है। और कोई को हर बात में, क्या, संशय पैदा होता है। तो बाप को दोनों प्रिय हैं या कोई एक प्रिय है एक प्रिय नहीं है? हँ? बाप को तो दोनों प्रिय। हँ? क्योंकि जानते हैं कि ये जो भी मेरे बच्चे हैं वो सब मेरे से वर्सा लेने वाले हैं। कौनसा वर्सा? हँ? पहले जनम का पहले-पहले सुख का वर्सा सबको मिलना है। हाँ। और उसमें भी जितने जनम पार्ट बजाएंगे इस सृष्टि रूपी रंगमंच पर, आधा समय सुख और आधा समय दुख। ये तो सबको है। बाकि हाँ, कि जो मेरे डायरेक्ट बच्चे बनते हैं, हँ, पहचान करके बनते हैं; पहचान करके माने? निराकार सो साकार तो पहचाना या सिर्फ निराकार को पहचाना और साकार के ऊपर विश्वास नहीं बैठा तो पहचाना? नहीं। साकार सो निराकार भगवान को अच्छी तरह से पहचान करके, हँ, जो आँखों से भी देख लेते हैं और कानों से भी दो शब्द सुनते हैं, तो ऐसे बच्चों के लिए बताया कि मैं बाद में प्रत्यक्ष होता हूँ। क्या? पहले-पहले किसके सामने? प्रिफरेंस किसको देता हूँ? प्रिफरेंस विदेशियों को देता हूँ या स्वदेशियों को? विदेशियों को देता हूँ। क्यों? क्योंकि अगर बाप विदेशी बनकरके न आते तो इन बच्चों से मिल भी नहीं, हँ, मिल पाते? नहीं मिल पाते। तो बताया कि रात के बारह बजे वास्तव में दिन होना शुरू होता है। हाँ, और उस बात की गहराई को विदेशी जो बुद्धि में ज्यादा तीखे होते हैं या कहो बुद्धि का जिनको ज्यादा अभिमान होता है वो ही पहचान पाते हैं। दूसरे पहचान पाते हैं? नहीं।           
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एक-2 से पूछा जाए कि तुम कौन हो? तो कोई बताएगा हम किसान हैं, कोई बताएगा हम बूढ़े हैं, कोई बताएगा हम आदमी हैं, कोई बताएगा हम औरत हैं, कोई बताएगा हम बच्चा हैं, कोई कहेगा हम डॉक्टर हैं, कोई कहेगा मास्टर हैं; लेकिन उनसे पूछा जाए कि तुम हमेशा यही हो जो तुमने बताया? जब पैदा हुए थे तब डॉक्टर और मास्टर थे क्या? नहीं थे। आखिर क्या हैं वह कोई नहीं जानता। सब अपनी देह के बारे में बताएँगे, देह का ऑक्युपेशन बताएँगे, देह की उम्र के हिसाब से बताएँगे, स्त्री या पुरुष के हिसाब से बताएँगे। ये कोई नहीं जानता कि हम सदाकाल में क्या हैं। यह बात इस सृष्टि का मालिक, एक ही 
परमपिता-परमात्मा आकर के बताते हैं। कहते हैं कि तुम सब बिंदु-2 आत्माएँ हो। इसलिए भारतवर्ष में माथे पर बिंदी लगाते हैं। तुम आत्मा हो, आत्मिक स्थिति में टिकी रहने वाली हो तो टीका लगाते हो। तुम देह नहीं हो। बूढ़ा कहेगा मैं बूढ़ा हूँ। वह बूढ़ा तो अब हुआ, पहले तो जवान था, उससे पहले तो बच्चा था ना। तो तुम बदलने वाले तो नहीं हो। बच्चा था तब भी आत्मा था, बूढ़ा हुआ तब भी आत्मा है, पैदा हुआ था तब भी आत्मा है और सदा ही आत्मा है। आत्मा ये शरीर छोड़ देगी तो भी आत्मा रहेगी। किसी माता के गर्भ से जाकर जन्म लेगी। तो आत्मा सदाकाल है। आत्मा कभी मरती नहीं है। आत्मा अजर, अमर, अविनाशी है। हाँ, आत्मा जन्म-मरण के चक्र में आती है और हरेक आत्मा में अपना-2 पार्ट भरा हुआ है। जन्म-जन्मान्तर जो पार्ट बजाया है, वो आत्मा के अन्दर भरा हुआ है। इतनी छोटी-सी आत्मा स्टार मिसल, बिंदी मिसल वह ऐसा वण्डरफुल रिकॉर्ड है, जिसमें जन्म-जन्मान्तर का पार्ट भरा हुआ है। आत्मा कभी स्त्री चोला लेकर के पार्ट बजाती है, कभी पुरुष चोला लेकर के पार्ट बजाती है। ये पार्ट सदैव चलता ही रहता है।
Vcd- 1387

वार्तालाप प्वाइंट         वार्ता न. 322

स्टूडेन्ट - बाबा, नवरात्रि में जगदम्बा को डुबाते हैं।

बाबा - हाँ, नवरात्रि में पूजा करके देवियों को डुबाते हैं। यहाँ जब एडवांस में आते हैं तो एडवांस में आने से पहले बेसिक नाॅलेज में जिनको देवियाँ समझते थे उनके ऊपर बहुत धन अर्पण करते हैं। मकान देते हैं, कपड़े देते हैं, खाने-पीने की वस्तुएँ देते हैं। अपने बच्चों को भले न दें ; लेकिन उनको अर्पण करते हैं। फिर जब एडवांस में आ जाते हैं तो जो डुबीजा-डुबीजा कर देते हैं। तो ये भक्तों की बातें हैं। जैसा बेसिक में हुआ है ऐसा आगे चलकर एडवांस में भी हो सकता हैे; क्योंकि जब एक बाप सच्चा प्रत्यक्ष होता है तो चाहे गणेश हो, चाहे हनुमान हो, चाहे देवियाँ हो उन सबकी देहधारियों की पोल पदरी हो जाती है। पोल पट्टी सब की खुल जाती है। सब में कमजोरियाँ समाई हुई हैं। एक बाप ही सच्चा है और बाकी सब? सब देहधारी मनुष्य झूठे साबित हो जाते हैं।
समय- 21.25
मैं बहुत रास्ता बताता हूँ और मोस्ट इजी, क्या करो? अभी ये जो देह जो धारण की है ना इस दुनिया में आकर, क्या करो अब? देह को भूल जाओ। अपन को आत्मा समझो और इतना ही नहीं आत्मा समझ करके आत्मा के बाप को पहचानो। कैसे पहचानेंगे? पहचान दिए कि आत्मा ज्योतिबिन्दु है, भृकुटि के मध्य में है। तो आत्मा के बाप को पहचान लेंगे? नहीं। कैसे पहचानेंगे? मुकर्रर रथ को पहचानेंगे; क्योंकि बाप आते हैं तो जिस तन में भी प्रवेश करते हैं- उसका नाम ब्रह्मा रखते हैं; क्योंकि बाप है ना! बाप को क्या चाहिए? बाप को बाप ही चाहिए सृष्टि रचने के लिए? माँ चाहिए। तो जिसमें भी प्रवेश करते हैं, नाम रखते हैं ब्रह्मा तो पहले-2 जिसमें प्रवेश करते हैं। तो एक में प्रवेश करते हैं या दो में करते हैं? एक में? अच्छा! जिस एक में प्रवेश करेंगे वो कैसे जानेगा? जानेगा? तो वो भी नहीं जानेगा, मैं तो बिन्दी हूँ। ज़रूर दो चाहिए ना!
Vcd- 2899

Sunday, October 11, 2020

वार्तालाप प्वाइंट         वार्ता न. 307

 स्टूडेन्ट - साकार में धर्मराज का पार्ट बजाने वाली आत्मा ईश्वरीय संविधान में किस श्रेष्ठ...में पारंगत होनी चाहिए? वो श्रेष्ठ वकील कौन हैं और कितने हैं ? 

 बाबा  - यहाँ संविधान कौन-सा है? ब्राह्मणों की दुनियाँ का संविधान कौन-सा है? ब्राह्मणों की दुनियाँ का संविधान है - ”मुरली“, और मुरली के महावाक्यों में जो जितना पारंगत होगा, वो उतना ही बड़ा वकील है। पहले तो अपने को छुटकारा दिलावे। 
हम सब जेल में पड़े हुए हैं। रावण की जेल है, कंस की जेल है। उस कंस की जेल में पहले खुद का छुटकारा हो। साथ-साथ दूसरों का भी छुटकारा करने वाला बने। वकील लोग होते हैं , उनका धंधा ही क्या होता है? फँसे हुए को छुड़ाना। वो तो हद के वकील 
हैं। हद की कमाई करते हैं और यहाँ तो बेहद की कमाई है अनेक जन्मों की। जितना-जितना अपने को छुड़ाते जावेंगे, औरों को भी छुड़ाने में समर्थ बनते जावेंगे। उसके लिए चाहिए ईश्वरीय ज्ञान की पराकाष्ठा। जो ज्ञान में जितना तीखा होगा, उतना 
बड़ा वकील बनेगा। धर्मराज बाप का सहयोगी बनेगा।
समय- 3.52
दु;ख का मूल कारण क्या हुआ? स्व की विस्मृति होती गई और जो देह है, जो अपनी चीज़ नहीं है, आज हमें देह दिखाई पड़ रही है और कल ये देह खलास हो जाएगी, तो देह, देह के पदार्थ, देह के संबंध वो याद आने लगे। तो जो असली स्मृति है उससे हम विस्मृत हो गए। असली स्मृति क्या है? आत्मा की याद। वो आत्मा की याद से हम महरूम होते गए, होते गए, होते गए, आज सारी दुनियाँ भौतिक बन गई। सब मनुष्य मात्र किसके पीछे पड़े हुए हैं? भूत। पाँच तत्वों से बने हुए पदार्थों के पीछे पड़े हुए हैं। बुद्धि 24 घण्टे कहाँ लगी रहती है? देह के संबंधों में लगी रहती है। देह की परवरिश में लगी रहती है। देह के पदार्थों को इकट्ठा करने में लगी रहती है। तो इन चीज़ों की याद का ये जो लगाव पैदा हो जाता है, यही फिर हमको जन्म-मरण के चक्र में लाता है और ऐसे चक्र में लाता है जिससे हमको दुःख मिलता है, सुख नहीं मिलता है। अभी भौतिकवाद बरहा है कि कम हो रहा है? भौतिकवाद मतलब भौतिक चीजें़। पाँच तत्वों से बनी हुई वस्तुएँ हमको इतना आकर्षित करती जा रहीं हैं और आत्मा की विस्मृति होती जा रही है। तो परमात्मा बाप आकर के मुख्य बात यही सिखाता है कि अपने को आत्मा समझो। दूसरे को भी देखो तो आत्मिक रूप में भृकुटि के मध्य में चमकता हुआ सितारा देखने की प्रैक्टिस करो। प्रैक्टिस पक्की हो जाएगी तो वो सितारा ही याद पड़ेगा। फिर ये देह याद नहीं पड़ेगी। देह जब याद नहीं पड़ेगी तो देह का आकर्षण भी आकर्षित नहीं करेगा। जब देह का आकर्षण नहीं होगा, आत्मा की ही स्मृति रहेगी तो उसका रिज़ल्ट ये होगा कि हम स्वस्थिति में रहने के कारण स्वर्ग का अनुभव करेंगे। इस दुनियाँ में भी स्वर्ग का अनुभव कर सकती हैं आत्माएँ। अगर अनुभव नहीं कर सकतीं तो मुसलमानों की कुरान में ऐसे (क्यों) लिखा हुआ है कि जब दुनियाँ का विनाश होगा/कयामत होगी तो भगवान के बंदे बड़े मौज में रहेंगे? दुनियाँ का विनाश होना है तो दुनियाँ दुखी होनी चाहिए। भगवान के बंदे क्यों मौज में रहेंगे? कोई कारण होगा? हाँ, भगवान ने उनको पहले से ही गुप्त रूप में ये पाठ पढाया कि तुम ये पढाई पढो। क्या पढाई पढो ? कि तुम देह नहीं हो, तुम ज्योतिबिन्दु आत्मा हो।
Vcd- 783
वार्तालाप प्वाइंट         वार्ता न. 315

स्टूडेन्ट- बाबा, गीता पाठशाला खोलने के लिए कौन सी फाॅरमैलिटी पूरी होनी चाहिए?

 बाबा - एक तो भट्ठी किया हुआ हो। जो मुरली में बोला है महत्व भट्ठी का, सात दिन की एडवान्स कोर्स की भट्ठी हो और दूसरा हिन्दी जानने वाला हो और तीसरी बात है कि ब्राह्मण बना है तो प्रवृत्तिमार्ग का धर्म स्थापन हो रहा है। तो प्रवृत्तिमार्ग वाला हो। कम-से -कम ऐसा अन्दर से यह भाव रहे कि हम गीता पाठशाला खोलके बैठे हैं तो आने वाले स्टुडेन्ट कहीं ये न जाने की इनकी दो मतें हैं। गीता पाठशाला में निमित्त टीचर तो माता हेागी। तो जिसको निमित्त टीचर बनाया जाएगा उस टीचर की अवहेलना नहीं होनी चाहिए। कोई बात में अगर क्राॅस होता भी है तो बाबा के सामने रखकर उसका सोल्युशन लेवें। ये तीन बातें है। कोई भी गीता पाठशाला खोल सकता है इसके लिए ये भी जरूरी नहीं है कि बड़ा मकान हो। कोई के पास एक कमरा है तो मुरली में बोला है - उसमें सफाई करके क्लास चलाओ, उसी में खाना बनाओ और उसी में सफाई करके फिर रात में सो जाओ।
समय-10.29
जो मीठे-ते-मीठे बाप है; सबसे मीठा बाप सुप्रीम सोल हैविनली गाॅड फादर वो ही हम आत्माओं को आकर के समझाते हैं कि बच्चों अब भले तुमने अपने-2 84 जन्मों के पार्ट की बीच कोई भी बाप को याद किया हुआ हो, क्रिश्चियन्स के रूप में कनवर्ट हुए या नहीं कनवर्ट हुए, पक्के क्रिश्चियन हुए या बौद्धी हुए या इस्लामी हुए तो तुमने अपने धर्मपिता को याद किया। कनवर्ट होने वालों ने भी याद किया और जो कनवर्ट नहीं होते हैं उन्होंने भी याद किया ना ? नहीं समझ में आ रहा है ! हा। तो भले तुमने अपने 84 के चक्कर में उन बापों को याद किया लेकिन अब ? अब मुझे याद करो। तो क्या होगा ? कि तुम्हारे मेें जो भी ये दूसरे-2 धर्म के धर्मपिताएँ आए अधूरे -2 उनहें आकर के जो तुम्हारे अन्दर खोट डाल दी ना, विकारों की खाद डाल दी ना। वो विकारों की खाद कहो, जंक कहो, वो जो लगी हुई है वो खाद सारी निकल जाएगी। खत्म हो जाएगी और फिर तुम बच्चे फिर सतोप्रधान बन जावेंगे।
Vcd- 3306
वार्तालाप प्वाइंट          वार्ता न. 322

स्टूडेन्ट- बाबा, त्रिमूर्ति में बी.के. वाले बताते हैं कि शंकर का पार्ट कुछ भी नहीं है वो सिर्फ विनाश करता है। ऐसे क्यों?

बाबा - क्योंकि उनके धर्म का विनाश होता है। उन्होंने जो प्रजा रची है जो इतनी अभी तक मेहनत की है वो सब खलास होने वाली है। तो अपना विनाश कौन चाहेगा? जैसे बिल्ली है,कबूतर है। कबूतर के सामने जब बिल्ली आती है तो कबूतर अपनी आँखे बंद कर लेता है। बिल्ली आई नहीं। ऐसे ही ब्रह्माकुमारियाँ कहती है शंकर होता ही नहीं। जबकि सारी दुनिया शंकर को और विष्णु को मानती है। सारी दुनियाँ में शंकर और विष्णु की भगवान के रूप में मान्यता है। मंदिर बने हुए हैं, मूर्तियाँ बनी हुई हैं तो मानना ही पडे़गा। और वो क्या कहते हैं - शंकर और विष्णु प्रैक्टिकल में होता ही नहीं। उनको कहने दो।
समय - 17.48

 शिवबाबा की मुरली

वीसीडी 2807, दिनांक 02.03.2019

रात्रि क्लास 13.11.1967

VCD-2807-extracts-Hindi

समय- 00.01-20.17

 

रात्रि क्लास चल रहा था – 13.11.1967. पहले पेज के अंतिम चौथी लाइन में बात चल रही थी  वो दुनियावी वैष्णवपंथियों की और तुम बच्चे जो कहते हो कि हम भी वैष्णवपंथी हैं, परंतु विष्णु तो चाहिए ना। विष्णु माने संपन्न स्टेज। संपन्न स्टेज माना? हँ? स्त्री और पुरुष, मेल, फीमेल, दोनों के संस्कार-स्वभाव मिलकरके एक हो जाएं। वो तो नई सृष्टि में सतयुग के आदि में ही थे। इस सृष्टि का जब अंत होने का होता है तब तो कोई के संस्कार आपस में मिलते ही नहीं। तो बताया - अपने पास वो दुनियावी वैष्णवों का वैष्णवपना बुद्धि में नहीं है। अपने पास तो बिल्कुल ही एकदम आत्मा को पक्का वैष्णव बनना है, ये बुद्धि में है। विष्णुवंशी बनना है। जैसे विष्णु की स्टेज कम्बाइंड ऐसे हमारी भी स्थिति बने। बुद्धि में पक्का बैठ जाए कि 21 जन्म का साथी हमारा नई दुनिया में कौन बनेगा? उसके साथ हमारे स्वभाव-संस्कार मिलकरके कम से कम 21 जन्म के लिए तो, हाँ, एक हो जाएं। फिर नंबरवार पुरुषार्थ अनुसार। तो बनना तो है विष्णुवंशी। परन्तु उसमें फिर वो सभी चल नहीं सकते हैं। वो सभी कौन? हँ? वो सभी जो दूसरे धर्म की आत्माएं हैं, या उन दूसरे धर्मों के प्रभाव में आकरके कन्वर्ट होने वाली देवी-देवता सनातन धर्म की आत्माएं हैं, हँ, नई दुनिया में जाने वाली, वो भी सभी एक जैसा पुरुषार्थ तो कर ही नहीं सकती। तो सभी चल भी नहीं सकते हैं।

 

अगर कहें वो चमड़ा; तो चमड़ा तो वो गाय का है, हँ, शरीर का है। एक तो शरीर मनुष्यों का भी होता है, देवताओं का भी होता है और फिर जानवरों का भी। हाँ। और बताया गाय। कृष्ण को गऊएं दिखाई हैं। तो वो भी तो चमड़ा ही है ना। भले गाय सीधी-सादी पशु है। ये चमड़ा कहते हैं ना इनको। हँ? किसको? इनको माने? देह अभिमान को चमड़ा कहते हैं। तो वास्तव में ये कोई ज़रूरत नहीं है। हँ? किस बात की जरूरत नहीं है? हँ? क्या ज़रूरत नहीं है? देह भान में रहने की ज़रूरत नहीं है? हँ? अच्छा? देह में आत्मा रहेगी तभी तो पुरुषार्थ करेंगे। हाँ, पुरुषार्थ करें, लेकिन देह के अर्थ, देह के अर्थ न करें।

 

13.11.1967 की रात्रि क्लास का दूसरा पेज। बाकि उनकी भावना शुद्ध है अच्छी। वो करके मंगाकरके देवें; क्या? क्या मंगाय के देवें? अरे, चप्पल की बात हो रही थी ना। तो भी चप्पल बिगर रह नहीं सकते। क्या मंगाय कर देवें? वो ही लांग बूट वाली बात। याद आई? हाँ। वो उनकी बुद्धि में बैठाएंगी तो भी क्या होगा? वो दूसरे धर्म में कन्वर्ट होने वाली या जो भी दूसरे धर्म वाले हैं अपने धर्म के पक्के वो फिर चप्पल के बिगर रह नहीं सकते। और फिर उनको चाखरी में थोड़ा डर भी है। क्या? क्या डर है? तुम बच्चों को तो पता है। हँ? वो जो चाखरी बताई; कैसी चाखरी बताई? चाखरी कहो; वस्त्र भी बताया। खादी का वस्त्र। कैसी चाखरी है? खादी का कपड़ा है। खादी का कपड़ा? आजकल वो जूते मिलते हैं वो भी तो मजबूत कपड़े के मिलते हैं कि नहीं? हँ? मिलते हैं। तो बताया वो चाखरी में भी थोड़ा डर है। क्या? कि सर्दियों में तो ठंडक देता है, वो सर्दियों में तो गर्मी देता है और गर्मियों में ठंडक देता है लेकिन बरसात में? बरसात में सबके लिए बहुत भारी पड़ जाता है। हँ? हाँ। तो भारी पड़ जाता है तो गिरने का डर है। हँ? उथलने का डर है।

 

तो वो चमड़ा भी पहना हुआ हो। तो बुद्धि रूपी पांव में तो पहना हुआ है। हँ? पर अंदर में अगर बाप को याद करते हो; अंदर माने मन-बुद्धि में। तो फिर तो कोई हर्जा नहीं है। उस बाप की पहचान लिया, जान लिया, मान लिया और फिर याद करके, हँ, हाँ, वो पहना हुआ भी है तो कोई हर्जा नहीं है। क्यों? क्योंकि वो चमड़ा भी कोई पाप नहीं चढ़ाते। कौनसा चमड़ा? लांग बूट का? क्यों? हँ? चमड़ा माने देह भान। वो पाप क्यों नहीं चढ़ाते? क्यों नहीं पाप चढ़ाते? क्योंकि वो जो शरीर रूपी वस्त्र है वो सदाकाल इस सृष्टि पर अविनाशी है या और आत्माओं की तरह उनका, जैसे और आत्माओं का शरीर रूपी वस्त्र विनाशी है, ऐसे विनाश हो जाता है? हँ? नहीं। तो जब विनाशी नहीं है, तो अविनाशी को याद करेंगे तो कैसे बनेंगे? अविनाशी बनेंगे। और विनाशी को याद करेंगे तो विनाशी बनेंगे।

 

तो पाप जो चीज़ चढ़ाती है, हँ, वो कौनसी चीज़ चढ़ाती है? पाप चढ़ाती है वो काम महाशत्रु। काम महाशत्रु माने? कामना, इच्छाएं। देह है तो इच्छा है। और देह भी तामसी, राजसी है तो इच्छाएं हैं। अगर सात्विक शरीर हो जाए, हँ, देवात्माओं जैसा, तो इच्छा रहती है? हँ? सब इच्छाएं प्रकृति पूरी करती रहती है। तो इच्छा मात्रम अविद्य़ा रहते हैं। तो वो काम महाशत्रु कहाँ से आता है? जबसे ये द्वैतवादी द्वापरयुग के धरमपिताएं आते हैं तबसे ये काम महाशत्रु बहुत शत्रुता करने के लिए, हँ, हाँ, हमारे कनेक्शन में आ जाता है। तो हम, हम उससे बच नहीं सकते? कैसे बचेंगे? आठ कलाएं तो रहती हैं नई दुनिया में। और जब पुरानी दुनिया में आते हैं द्वैतवादी द्वापरयुग में तो कलाएं कम हो जाती हैं। तो कमज़ोरी आ जाती है। किनको? जो नई दुनिया की आत्माएं हैं उनको या जो नई-नई आत्माएं उतर रही हैं उनको? जो द्वापरयुग में नई आत्माएं उतरती हैं उनको कमजोरी होती है, वो पावरफुल होती हैं कि कमज़ोर होती हैं? वो तो पावरफुल होती हैं। जो देवात्माएं हैं वो नीचे उतरते कमज़ोर हो जाती हैं सुख भोगते-भोगते ज्ञानेन्द्रियों से। तो उनके प्रभाव में आने से वो काम महाशत्रु हमको भी घेर लेता है।

 

बाकि ऐसे है कि थोड़ा-थोड़ा पाप चढ़ते हैं। हँ? हमारे में बहुत ज्यादा एकदम पाप नहीं चढ़ते हैं। हाँ, जो आत्माएं उनके ज्यादा कनेक्शन में आती हैं विधर्मियों के उनके ऊपर ज्यादा चढ़ेंगे। और हम? हँ? हम तो अपने धरम में पक्के रहते हैं देवी-देवता सनातन धर्म के जो ऊँचा जाने वाला, ऊँचाई पे जाने वाला, एक सीध में जाने वाला तना है दायीं ओर, बाईं ओर झुकता ही नहीं है। तो, तो हमपे धीरे-धीरे असर होगा कि जल्दी असर होगा? हँ? धीरे-धीरे असर पड़ता है। क्योंकि ऐसा दूसरे मनुष्य बहुत थोड़े होंगे। तुम्हारे अलावा दूसरे जो ये पाप न करते होंगे। हँ? कौनसा पाप? पाप किसे कहा जाता है? दुख देने को पाप कहा जाता है। तो बाप तो कहते हैं कि इस पुरानी दुनिया में भी, हँ, पतित तो सब होते हैं। हँ? वो तो इस पतित दुनिया का कायदा है। परन्तु हाँ एक के साथ मन-बुद्धि का लगाव-झुकाव पक्का रहना चाहिए। अनेकों के साथ अगर मन-बुद्धि का लगाव-झुकाव रहा, हँ, और पक्षपात आ गया तो फिर क्या होगा? हँ? तो फिर हाँ, ऊपर नीचे होते रहेंगे। फिर पाप करते रहेंगे। क्या पाप? एक होता है धर्मानुकूल। क्या? काम भोगना। और एक होता है धर्म के विपरीत। धर्म क्या कहता है? दुख देना? धर्म क्या कहता है? दुख नहीं देना। लेकिन जो द्वैतवादी द्वापरयुग में जो विधर्मियों के द्वारा भ्रष्ट इन्द्रियों का जो सुख लेने की परंपरा चलाई जाती है वो तो वो उनको तो पक्का है। क्या? क्या? उनके धरम में क्या पक्का है? वो तो तोड़-फोड़ करेंगे, हिंसा करेंगे। लेकिन तुमको तो हिंसा? हिंसा नहीं करनी है। एक होता है कोई को प्यार से थप्पड़ मार दो। और एक होता है गुस्से में आके जोर से थप्पड़ मार दो। तो अंतर पड़ेगा या नहीं पड़ेगा? अंतर पड़ेगा।

 

तो ये जो तुम बच्चे हो थोड़े वो पाप नहीं करते होंगे। जो छोटेपन से ब्रह्मचारी होकरके रहते हैं, फिर भी कोई न कोई पाप तो हो ही जाते हैं ना किसम-किसम के। क्योंकि; क्या बताया? हँ? काजर की कोठरी में कैसो हू सयानो जाए, एक लीक काजर की लागि है पे लागि है। तो ऐसे-ऐसे पाप क्यों हो ही जाते हैं? कारण क्या है? क्योंकि ये राज्य किसका आ जाता है? हँ? राज्य रुलाने वालों का आ जाता है या देवात्माओं का राज्य होता है? हाँ। द्वैतवादी दैत्यों का राज्य होता है। हिंसक लोगों का राज्य होता है। हिंसक कर्मेन्द्रियों से हिंसा करने वाले हैं। वो अपनी आदत से मजबूर हैं। वो तो छोड़ नहीं सकते। तो कोई न कोई पाप तुम बच्चों से भी कुछ न कुछ नंबरवार हो जाता है। किसम-किसम के हैं ना पाप। हाँ। रावण राज्य है। यथा राजा? राज्य है तो यथा राजा तथा प्रजा। तो वो पाप छोड़ता तो नहीं है। उसके राज्य में पाप बिगर तो कोई रह ही नहीं सकता। किसके राज्य में? उस रावण के राज्य में। उसमें क्या अंतर है? राम राज्य में क्या अंतर है? अरे, राम को; राम लीला देखी ना। एक मुख दिखाया जाता है। और रावण को? रावण को अनेक मुख दिखाए जाते हैं। वो सब मिलकरके बस एक जैसे, हँ, एक जैसे स्वभाव संस्कार, एक जैसी वाचा।

 

तो उनके राज्य में पाप बिगर तो कोई रह ही नहीं सकता। और उसमें भी जनम तो पाप से ही होता है ना। द्वैतवादी द्वापरयुग से, जबसे ही ये विधर्मी धरमपिताएं आते हैं, भ्रष्ट इन्द्रियों से कर्म करना सिखाते हैं, तो जन्म तो कौनसी इन्द्रियों से होता है? हँ? भ्रष्ट इन्द्रियों के भ्रष्ट कर्मों से, पाप कर्मों से होता है या वहाँ श्रेष्ठ इन्द्रियां ही काम करती हैं? हँ? श्रेष्ठ इन्द्रियां तो तब काम करें जब श्रेष्ठ ज्ञान बुद्धि में बैठा हो। क्या? कि हम ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं। वो आत्मा की स्मृति तो 21 जन्म देवताओं को रहती है। उसके बाद वो आत्मिक स्मृति तो खतम हो जाती है। तो जनम तो ज़रूर सबका द्वैतवादी द्वापरयुग से ढ़ाई हज़ार साल के बाद नई दुनिया जब पूरी होती है तो सबका जन्म पाप से ही होना है।

 

तो ये छोटी-मोटी जो बातें होती रहती हैं ना वो इस ज्ञानमार्ग में, हँ, इतनी जरूरत नहीं है। हाँ। ज्ञान मार्ग में जहाँ भी मेहनत रहती है बच्चों के ऊपर; क्या मेहनत विशेष रहती है? मेहनत रहती है अपन को, हँ, देह भूल करके आत्मा समझ और बाप को पहचानने की, पहचान करके याद करने की मेहनत रहती है। हँ? तो देखो सिर्फ ये कि अपन को आत्मा समझना और बाप को नित्य याद करना। हाँ। परन्तु ये भूल बहुत होती है। अरे? क्या? क्या भूल होती है? आत्मा को भी भूलते हैं और बाप सुप्रीम सोल, जब तक ये बुद्धि फैसला न करे कि वो सुप्रीम सोल ज्योति बिन्दु निराकार; जैसे हमारी आत्मा निराकार, लेकिन हमारी आत्मा तो हमारे शरीर में है। वो निराकार कौनसे मुकर्रर रथ में सदाकाल इस सृष्टि पर पार्ट बजाता है, सौ साल के लिए, तो वो भूल जाते हैं। घड़ी-घड़ी माया अनिश्चय में; निश्चय में लाती है कि अनिश्चय में लाती है? घड़ी-घड़ी माया अनिश्चय में ले आती है। भूल कराय देती है। तो ये घड़ी-घड़ी भुलाय देती है, भूल जाते हैं। क्योंकि यहाँ ये नई शिक्षा मिलती है बच्चों को। क्या? दुनिया में ऐसी शिक्षा कहीं भी नहीं मिलती कि अपन को ज्योति बिन्दु स्टार भृकुटि के मध्य में आत्मा समझो और उस निराकार आत्मा के बाप ज्योतिबिन्दु निराकार हैविनली गॉड फादर, जो हैविन बनाने का रास्ता बताता है, उसको प्रैक्टिकल में किस शरीर में पार्ट बजाय रहा है, परमानेन्टली पार्ट बजाय रहा है, उसे पहचान करके याद करो। ये शिक्षा कहीं दुनिया में मिलती है? नहीं मिलती है। बिल्कुल ही नई शिक्षा है।        

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Thursday, October 8, 2020

शिवबाबा की मुरली
वीसीडी 2806, दिनांक 01.03.2019
रात्रि क्लास 13.11.1967
VCD-2806-extracts-Hindi
समय- 00.01-15.25
 
आज का रात्रि क्लास है – 13.11.1967. पूछने के पहले जो देही अभिमानी होकरके नहीं बैठे थे वो हाथ उठावें। देही माने देह को धारण करने वाली आत्मा। माना जो आत्मा की स्थिति में नहीं बैठे थे वो हाथ उठावें। बैठे थे। नहीं बैठे थे? (किसी ने कुछ कहा।) एक ही है? अच्छा? बाकि सब ज्योतिबिन्दु आत्मा की याद में बैठे थे? हँ? एक ने और मना किया। सिर्फ आज की बात नहीं पूछ रहे। बैठे थे। माना आज बैठे हो या पहले कभी बैठे हों। वो ज्योतिबिन्दु आत्मा की याद में बैठे थे? पूछा। ये पक्का निश्चय हुआ कि हम देह नहीं हैं? हँ? हम देह को चलाने वाली ज्योतिबिन्दु आत्मा हैं। हँ?
 
और वो आत्मा की यादगार भारत में खास कन्याएं-माताएं आज भी लगाती हैं बिन्दी भृकुटि के मध्य में। लगाती हैं ना। हां। ऐसे तो कोई-कोई भाई लोग भी लगाते हैं। हिस्ट्री में तो ये प्रसिद्ध है – जब राजाएं या उनकी सेना, हँ, या सेना के जो भाती होते थे उनके परिवार वाले उनको युद्ध में भेजते थे तो टीका लगाते थे ना। हाँ। कहाँ? नाक के ऊपर? नहीं, भृकुटि के मध्य में टीका लगाते थे ना। हाँ। कि भई आत्मिक स्थिति में होकरके युद्ध करना। हं? हाँ। कहाँ की यादगार? ये पुरुषोत्तम संगमयुग की यादगार है जब बाप ने आकर ये बात बताई कि चाहे मन का युद्ध हो, चाहे तन का युद्ध हो, तन की इन्द्रियों का युद्ध हो, अगर युद्ध करना पड़े तो कौनसी स्थिति में रहना है? हँ? ज्योति बिन्दु आत्मा की स्थिति को चैक करना है कि ज्योति बिन्दु आत्मा याद है। हँ? कैसे याद किया जाता है? हँ? किसी को याद किया जाता है तो पहले उसका रूप याद आता है ना। तो वो स्टार, वो ज्योतिबिन्दु, वो किरण, हँ, क्योंकि सूर्य का ज्ञान है ना। तो सूर्य की किरण होगी ना। तो ये है तो चैतन्य ज्ञान सूर्य। बताया – वो उसकी जो ये किरणें हैं आत्मा रूपी बच्चे, हाँ, वो अपन को देखें कि वो किरण भृकुटि के मध्य में याद रहती है?
 
ये एक-दो को देखकरके हाथ उठाय रहे हैं। क्या? कोई तो उठा ही नहीं रहे हैं अभी तक। बताया – इससे अगर अच्छा ऐसे होता जब कोई भी क्लास कराते हैं; क्या? ऐसे नहीं बाबा क्लास कराते हैं। नहीं। कोई भी क्लास कराते हैं तो वो पहले देही अभिमानी के लिए कहकरके बैठें। क्या? क्लास शुरु होने से पहले पूछें कि आत्माभिमानी होकर बैठे हो? स्टार की, ज्योतिबिन्दु की भृकुटि के मध्य में याद है? हँ? कि भई देही अभिमानी होकरके बैठो। आत्मा अभिमानी होकर बैठो। फिर जब क्लास कराने वाला गद्दी से उतरे, हँ, तख्त से नीचे उतरे तभी भी जरूर कहना चाहिए, याद दिलाना चाहिए कि आत्मा अभिमानी स्थिति में बैठे हो? देह अभिमान में तो नहीं बैठे हो? या फिर दीदी बैठे। तभी दीदी पूछ पड़े। तो बताओ कि देही अभिमानी होकरके बैठे हो? बाबा दीदी किसको कहते थे? मनमोहिनी दीदी को दीदी कहते थे। हाँ। तो थोड़ी प्रैक्टिस अच्छी हो जाएगी। अगर जो टीचर है क्लास कराने वाला, गद्दी पे बैठने वाला वो बार-बार याद दिलाएगा स्टूडेन्ट्स को कि आत्मिक स्थिति में बैठे हो? हँ? तो आत्मा को ही तो ज्ञान सुनाना है। शिव बाप किसको ज्ञान सुनाने आए? आत्मा को या देह को? या देह अभिमानी को? नहीं।
 
तो ऐसे बार-बार पूछने से थोड़ी प्रैक्टिस अच्छी होती जाएगी। क्योंकि मूल बात है ही इसके ऊपर। किसके ऊपर? अपन को ज्योतिबिन्दु आत्मा समझ करके बैठो। और सिर्फ बैठने की भी बात नहीं है। चलते-फिरते, उठते, कर्मेन्द्रियों से कुछ भी कर्म करते आत्मिक स्थिति में हैं? हँ? चैक करो। क्योंकि जब देही अभिमानी होकरके बैठते हैं तो ये बात ज़रूर है कि आत्मा की याद आएगी तो साथ में फिर क्या होगा? हँ? हाँ। जो आत्मा का बाप है वो ज़रूर, ज़रूर याद आएगा क्योंकि आत्मा भी ज्योति बिन्दु और बाप भी ज्योतिबिन्दु। आत्मा अति सूक्ष्म, तो बाप भी अति सूक्ष्म। तो ऐसे तो नहीं समझते कि आत्मा को याद किया, स्टार को याद किया भृकुटि के मध्य में तो बाप याद नहीं आया? हँ? अरे, ये तो बुद्धि में बैठा है ना कि ज्यादा फायदा जो है वो आत्मिक स्थिति में स्थिर रहने में है, आत्मा को याद करने में ज्यादा फायदा है कि आत्मा समझकरके साथ-साथ बाप को भी याद करने में ज्यादा फायदा है? हँ? बाप को याद करेंगे तो बहुत फायदा है। कैसे? आत्मिक स्थिति में रहेंगे, कोई भी कार्य करेंगे, भ्रष्ट इन्द्रियों से, श्रेष्ठ इन्द्रियों से कर्म करेंगे, तो पाप कर्म नहीं बनेगा उस समय। आत्मिक स्थिति में रहेंगे तो पाप कर्म बनेगा? नहीं बनेगा। लेकिन पिछले जन्म के पाप और इस जनम के पाप भस्म होंगे? हँ? भस्म होंगे? आत्मिक स्थिति में सिर्फ रहेंगे, बाप को याद नहीं करेंगे तो? हाँ, आत्मिक स्थिति में रहें, अपनी भृकुटि में ज्योतिबिन्दु आत्मा को याद करें और फिर आत्मा को याद करने के बाद फिर आत्मा का जो बाप है सुप्रीम सोल ज्योतिबिन्दु वो भी याद आए या ना आए? हँ? हाँ।
 
वो ब्रह्माकुमारियां कुमार क्या कहते हैं? कि हाँ, हम तो याद करते हैं। अपनी आत्मा ज्योतिबिन्दु को भी याद करते और अपने बाप को भी याद करते। तो सही बोलती हैं क्या? क्यों? क्यों नहीं सही बोलती? हँ? झूठ कैसे बोलती? हाँ, क्योंकि वो उन्हें पता ही नहीं है कि वो ज्योतिबिन्दु सुप्रीम सोल जो सब आत्माओं का बाप है वो है कहाँ? हँ? अगर आत्मा सो परमात्मा, तो तो झूठी बात हुई, सच्ची बात हुई? हँ? चींटी, हाथी, हँ, और ये कीड़े-मकोड़े आत्माएं हैं ना। तो फिर वो सब परमात्मा हो गए? हँ? ऐसे कहेंगे आत्मा सो परमात्मा? नहीं। ये तो फिर सर्वव्यापी हो गया। तो ये तो झूठी बात है। तो सच्ची बात क्या हुई? हँ? क्या सच्ची बात हुई? हँ? अरे, कुछ सच्ची बात भी बताओ। हँ? अरे? (किसी ने कुछ कहा।) साकार में निराकार आया। ठीक है हमारी आत्मा हमारे साकार शरीर में है ना। क्या? और आत्मा निराकार है। हमारे साकार शरीर है कि नहीं? और भृकुटि के मध्य में निराकार आत्मा बैठी है ना। तो साकार में निराकार आया है तो हम उसी को तो याद कर रहे हैं। झूठी बात है? अच्छा? कैसे झूठी बात? (किसी ने कुछ कहा।) आत्मा को परमात्मा एक ही है। आत्मा को परमात्मा एक ही है? शिव बाप, क्या लिखा? शिव बाप साकार मुकर्रर रथ में आया है। हाँ।
 
ये भी तो बोला है। क्या? मुरली में ये नहीं बोला बीस बार? क्या? कि दो प्रकार के रथ हैं। एक मुकर्रर रथ और दूसरा टेम्परेरी। तो मुकर्रर रथ तो एक ही है जो सदाकाल मुकर्रर है। हँ? आदि से लेकरके जबसे ये ओम मंडली शुरू हुई या सिंध, हैदराबाद में जो भी संगठन चलता था, ज्ञान का क्लास होता था तबसे लेकरके। कबसे लेकरके? जबसे ये परिचय मिला। क्या परिचय मिला? ब्रह्मा बाबा को कि तुम्हारा पार्ट, साक्षात्कार जो तुम्हें हुए हैं, उनके आधार पर तुम्हारा पार्ट ही है इस जनम में ब्रह्मा के रूप में, सफेदफोश के रूप में और अगले जनम में कृष्ण के रूप में। और? और क्या? और दुनिया का विनाश सामने खड़ा है। एटम बम्ब इसीलिए बने हैं। क्या? ओम मंडली जब शुरू हुई थी उससे पहले एटम बमों के नाम, नाम-निशान था क्या? नहीं था। ये तो बाप है दोनों काम कराने के लिए आए हैं ना। पुरानी दुनिया, पुराने धर्म, पुरानी मान्यताएं, परंपराएं, सब खलास कर देगा। हँ? और नई दुनिया, नई मान्यताएं शुरू कर देगा।
 
तो उसके सब लिए वो बाप सुप्रीम सोल आत्माओं का बाप कहते हैं स्पष्ट बताय देते कि मैं मुकर्रर रथ में तो मुकर्रर रूप से सदाकाल रहता हूँ। कायमी रहता हूँ। क्या? कायमी रहता हूँ माने? सदाकाल मुकर्रर रथ में तो रहता ही हूँ। लेकिन बीच-बीच में ज़रूरत पड़े तो फिर मुकर्रर नहीं तो जो टेम्परेरी रथ है ना उनमें भी आता हूँ। इसलिए तो शास्त्रों में दिखाया है कि ब्रह्मा के चार मुख ज्यादा दिखाते हैं। पांचवां मुख दिखाते ही नहीं हैं। मानते हैं कि ब्रह्मा पांच मुख वाला भी था, पंचानन भी कहते हैं। तो ये फाउण्डेशन कहाँ पड़ा? हँ? ये जो मान्यता चल रही है कि ब्रह्मा के चार मुख; और जब भी चित्रों में दिखाएंगे चार ही मुख दिखाएंगे। हँ? कोई सीरियल बनाएंगे, नाटक बनाएंगे तो चार मुखों वाला ब्रह्मा दिखाएंगे। पांच मुखों वाला दिखाते हैं? दिखाते ही नहीं। तो ये शूटिंग कहाँ होती है? हाँ। यहाँ ब्राह्मणों की दुनिया में तुम बच्चे शूटिंग करते हो। क्या? क्या शूटिंग करते? कि मुकर्रर रथधारी को पक्का-पक्का बाप के रूप में पहचान नहीं पाते कि मेरा सौ परसेन्ट यही बाप है। और मैं अब इस बाप को कभी भूलने वाला नहीं हूँ। अरे? बाप की एक बार पहचान हो जाए बच्चे को; मां ही तो पहचान देती है ना। तो बच्चा कभी ये कहेगा ये मेरा बाप नहीं है या दूसरा भी हो सकता है? हँ? बाप है तो बाप है। नहीं है तो नहीं है। तो देखो ये घड़ी-घड़ी पहले याद दिलाने की बात है कि पहले तो आत्माभिमानी होकरके बैठो। फिर दूसरी बात? फिर दूसरी बात ये है कि बाप को भी याद करो।        
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